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मुख्यमंत्री के रूप में दसवीं बार शपथ लेने के ठीक एक दिन बाद नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव करते हुए गृह विभाग जैसे सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय को सहयोगी दल बीजेपी को सौंप दिया। यह निर्णय न सिर्फ नई एनडीए सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है, बल्कि राज्य की राजनीतिक शक्ति-संतुलन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत भी देता है।
2005 के बाद यह पहला अवसर है जब नीतीश कुमार स्वयं गृह विभाग नहीं संभालेंगे।
गृह मंत्रालय अब उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता सम्राट चौधरी के पास होगा—यह कदम बीजेपी को पुलिस, आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सीधी भूमिका देता है।
नीतीश कुमार ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD), कैबिनेट सचिवालय, सतर्कता, चुनाव और वे सभी विभाग अपने पास रखे हैं जिन्हें किसी मंत्री को आवंटित नहीं किया गया है। लेकिन गृह विभाग छोड़ना राजनीतिक रूप से एक बड़ा संदेश माना जा रहा है — बीजेपी अब बिहार सरकार में निर्णायक शक्ति केंद्र बनकर उभरी है, क्योंकि विधानसभा में उसके 89 विधायक हैं।
बीजेपी के अन्य प्रमुख मंत्रालय इस प्रकार हैं:
— विजय कुमार सिन्हा को भूमि, राजस्व और खान-भूविज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिले।
— मंगल पांडेय के पास स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ कानून विभाग भी आया।
— प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप जायसवाल को उद्योग विभाग मिला।
— नीतिन नवीन, श्रेयान्शी सिंह, नारायण प्रसाद, संजय सिंह ‘टाइगर’ सहित कई नेताओं को अहम जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं।
कुल 14 बीजेपी मंत्री नई कैबिनेट में शामिल किए गए—जिनमें कई नए चेहरे भी हैं—यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार में बीजेपी की पकड़ पहले से कहीं अधिक मजबूत है।
सहयोगी दलों—जेडीयू, एलजेपी (राम विलास), हम(से) और आरएलएम—को ग्रामीण कार्य, शिक्षा, सिंचाई, पंचायती राज और पेयजल जैसे विभाग मिले, लेकिन कोई भी मंत्रालय राजनीतिक दृष्टि से शीर्ष श्रेणी का नहीं माना जाता।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार गृह मंत्रालय बीजेपी को देना नीतीश कुमार की एक रणनीतिक चाल है—एक ओर गठबंधन को स्थिर करने की कोशिश, दूसरी ओर सत्ता-विरासत और नेतृत्व के सवालों को संतुलित करने की तैयारी। यदि एनडीए सरकार कार्यकाल पूरा करती है तो 74 वर्षीय नीतीश कुमार भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु के रिकॉर्ड को भी पार कर सकते हैं।


