Last Updated on August 7, 2026 4:31 pm by INDIAN AWAAZ

आफरीन हुसैन, कोलकाता

पश्चिम बंगाल में मस्जिदों के लाउडस्पीकर को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर धर्म की स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन के सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है। लाउडस्पीकरों पर कार्रवाई को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भले ही तेज हों, लेकिन इनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा नया नहीं है। पिछले कई दशकों में अदालतों के फैसलों और ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों के जरिए इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश विकसित हुए हैं।

इस विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के दौर से जुड़ी है। वर्ष 1996 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति या संस्था को, धार्मिक उद्देश्य के लिए भी, लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने का असीमित अधिकार प्राप्त नहीं है। अदालत का यह रुख सभी धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होता था। उस समय वाम मोर्चा सरकार ने इसे मुख्यतः प्रशासनिक और कानून-व्यवस्था से जुड़ा विषय माना, न कि राजनीतिक मुद्दा।

बाद के वर्षों में तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान भी ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 लागू रहे। शिकायतों या अदालत के निर्देशों के आधार पर पुलिस द्वारा अनधिकृत लाउडस्पीकरों के खिलाफ कार्रवाई के मामले सामने आते रहे। वर्ष 2020 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक बार फिर मौजूदा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख रहा है कि हर समुदाय को शांतिपूर्ण ढंग से अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने लाउडस्पीकर के मुद्दे को राजनीतिक रंग दिए जाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि इससे सांप्रदायिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।

वर्तमान विवाद में विपक्षी भाजपा ने अनधिकृत लाउडस्पीकरों के खिलाफ कार्रवाई और अदालत के निर्देशों के पालन की मांग को प्रमुखता से उठाया है। दूसरी ओर, राज्य सरकार का तर्क रहा है कि ध्वनि प्रदूषण से संबंधित नियम सभी धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों पर समान रूप से लागू होने चाहिए। सरकार के मुताबिक, कार्रवाई का उद्देश्य किसी एक धर्म को निशाना बनाना नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों को लागू करना है।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपनाया है। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम का कहना है कि यदि ध्वनि प्रदूषण के नियम लागू किए जाते हैं तो उनका पालन मस्जिदों और मंदिरों के साथ-साथ चर्चों, राजनीतिक रैलियों और धार्मिक जुलूसों पर भी समान रूप से होना चाहिए। कांग्रेस ने भी अदालत के आदेशों का सख्ती से पालन किए जाने की वकालत की है, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है कि कार्रवाई निष्पक्ष हो और उसमें राजनीतिक पक्षपात की कोई गुंजाइश न रहे।

इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने लाउडस्पीकरों के खिलाफ कार्रवाई का विरोध किया है। उनका तर्क है कि अज़ान इस्लाम की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। दूसरी ओर, विधायक नजरुल इस्लाम ने मुसलमानों से कानूनी प्रावधानों का पालन करने, टकराव से बचने और अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा संवैधानिक तरीके से करने की अपील की है।

संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। अदालतों ने समय-समय पर यह अंतर स्पष्ट किया है कि धार्मिक आस्था और पूजा का अधिकार एक बात है, जबकि उसे व्यक्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों यानी लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले नियम अलग विषय हैं।

यही वह बिंदु है जहां पश्चिम बंगाल की मौजूदा बहस केवल लाउडस्पीकर की आवाज तक सीमित नहीं रह जाती। सवाल यह है कि कानून कितना समान रूप से लागू होता है और राजनीतिक दल इस मुद्दे को किस तरह पेश करते हैं।

लाउडस्पीकर की आवाज कुछ मिनटों या घंटों तक सुनी जा सकती है, लेकिन उससे पैदा होने वाली राजनीतिक गूंज कहीं अधिक लंबी हो सकती है। पश्चिम बंगाल में असली चुनौती यही है कि कानून लागू हो तो बिना भेदभाव के, धार्मिक स्वतंत्रता कायम रहे तो संवैधानिक सीमाओं के भीतर, और राजनीतिक बहस हो तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ाए बिना।

क्योंकि बंगाल में इस समय सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लाउडस्पीकर कितना तेज बज रहा है—सवाल यह भी है कि उसके पीछे की सियासत कितनी तेज है।