
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
“शोहरत की बुलंदी भी एक पल का तमाशा है,
जिस शाख़ पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।”
— अन्दलीब अख़्तर
प्रसिद्ध उर्दू शायर, आधुनिक ग़ज़ल के उस्ताद और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का आज भोपाल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके जाने से दुनिया भर में लाखों प्रशंसक शोकाकुल हैं, क्योंकि उर्दू शायरी ने अपनी सबसे प्यारी आवाज़ों में से एक को खो दिया। उनकी शायरी ने मोहब्बत, तन्हाई, इंतज़ार और ज़िंदगी के गहरे ज़ख़्मों को शब्द दिए। उनके अशआर महज़ अल्फ़ाज़ नहीं थे, बल्कि ऐसी भावनाएँ थीं जो पीढ़ियों के दिलों में ज़िंदा रहीं। अब वे ख़ुद एक याद बन गए हैं, लेकिन उनकी अमर ग़ज़लें और अविस्मरणीय शेर हमेशा महफ़िलों, तन्हा दिलों और उर्दू ज़बान की रूह में गूंजते रहेंगे।
15 फ़रवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे डॉ. बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए., एम.ए. और पीएच.डी. की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में की और बाद में मेरठ कॉलेज में लगभग 17 वर्षों तक उर्दू विभागाध्यक्ष रहे।
उर्दू, फ़ारसी, हिंदी और अंग्रेज़ी पर उनकी गहरी पकड़ थी और उन्होंने सात से अधिक उर्दू कविता संग्रह तथा एक हिंदी में लिखा। इकाई, इमेज, आमद, आहट, आस और कुल्लियाते बशीर बद्र उनके प्रमुख संग्रह हैं। आलोचना की दुनिया में भी उन्होंने आजादी के बाद उर्दू ग़ज़लों का तनकीदी मुताला और बीसवीं सदी में ग़ज़ल जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ दीं।
उनकी ग़ज़लें देवनागरी और गुजराती लिपि में भी प्रकाशित हुईं और अंग्रेज़ी व फ़्रेंच में अनुवादित होकर अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचीं। उन्हें पद्मश्री सहित कई सम्मान मिले, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने चार बार और बिहार उर्दू अकादमी ने एक बार सम्मानित किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें Meer Academy Award और न्यूयॉर्क में Poet of the Year 1980 का पुरस्कार मिला।
उनका संग्रह आस, जिसमें 69 ग़ज़लें हैं, आधुनिक उर्दू शायरी का नगीना माना जाता है। कुल्लियाते बशीर बद्र पाकिस्तान में प्रकाशित हुआ और पूरे दक्षिण एशिया में सराहा गया। उनका मशहूर शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर है:
“शोहरत की बुलंदी भी एक पल का तमाशा है,
जिस शाख़ पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।”
मीर तकी मीर की तरह उनकी शायरी में सादगी और भावनात्मक गहराई थी। मोहब्बत, तन्हाई, दर्द और ज़िंदगी के रहस्य उनके अशआर में गहराई से बहते थे। जीवन में उन्होंने व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना किया, एक आग ने उनकी सारी संपत्ति और साहित्यिक रचनाएँ नष्ट कर दीं। इसके बाद वे भोपाल आ गए और शून्य से अपना जीवन और साहित्यिक करियर पुनः स्थापित किया। इन अनुभवों ने उनकी शायरी को और भी गहरी भावनात्मक तीव्रता दी और उनकी विनम्रता को आकार दिया।
उन्होंने अमेरिका, दुबई, क़तर और पाकिस्तान सहित कई देशों की यात्रा की और मुशायरों में भाग लिया। उनके निधन से उर्दू साहित्य ने अपनी सबसे उज्ज्वल और प्रिय आवाज़ खो दी है, लेकिन उनकी कालजयी ग़ज़लें और अविस्मरणीय शेर आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।
डॉ. बशीर बद्र के कुछ सबसे प्रसिद्ध और दिल को छू लेने वाले शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं और उनकी ग़ज़लों की पहचान बने हुए हैं। उनकी शायरी मोहब्बत, तन्हाई, दर्द और ज़िंदगी की सच्चाइयों को बेहद सरल और असरदार अंदाज़ में बयान करती है।
बशीर बद्र के मशहूर शेर
- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए - दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों - कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता - हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा - मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी - ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है,
ज़मीं पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है - बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता - कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो - हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं,
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में - ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने बस एक शख़्स को माँगा,
मुझे वही न मिला
