Last Updated on November 3, 2026 10:13 pm by INDIAN AWAAZ

संतोष कुमार पाठक

देश के कई अन्य राज्यों की तरह अब जम्मू कश्मीर में भी राजनीतिक उठापटक शुरू हो गई है। राज्य की उमर अब्दुल्ला की सरकार गहरे संकट में फंस गई है क्योंकि उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद, विधायक और कई अन्य दिग्गज नेता उनके खिलाफ हो गए हैं। 

बडगाम से तीन बार विधायक रह चुके और 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर से सांसद चुने गए नेशनल कॉन्फ्रेंस के आगा रूहुल्लाह मेहंदी ने सांसदी छोड़ने का ऐलान करते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उमर अब्दुल्ला को लेकर उनकी अपनी ही पार्टी में नाराजगी इस हद तक बढ़ चुकी है कि रूहुल्लाह ने मंगलवार को बडगाम में अपने पिता की पुण्यतिथि पर आयोजित की गई जनसभा में ही पार्टी और सांसदी, दोनों छोड़ने का ऐलान कर दिया। 

अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू कश्मीर की पार्टी है और खासतौर से इसका प्रभाव कश्मीर घाटी में ही ज्यादा माना जाता है। कश्मीरियों के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा वापस हासिल करना एक भावनात्मक मुद्दा है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला हो या वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, दोनों ही राज्य को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने के साथ-साथ अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाते रहे हैं। ऐसे में आगा रूहुल्लाह मेहंदी के आरोपों ने पार्टी की बुनियाद को ही हिला दिया है। पार्टी छोड़ने का ऐलान करते समय उन्होंने आरोप लगाया कि उमर अब्दुल्ला बीजेपी के दबाव में 370 पर अपना रुख बदल चुके हैं।

वैसे पार्टी में बगावत की शुरुआत विधायकों का एक गुट पहले ही कर चुका है। पार्टी के 25 विधायकों ने रविवार को ही फारूक और उमर अब्दुल्ला को 14 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी थी कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुई तो वे सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं।

आपको याद दिला दें कि, 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद – 370 को हटाने के साथ ही इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया था।जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग कर, दोनों ही इलाके को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। इसके लगभग 5 वर्ष बाद सितंबर-अक्टूबर 2024 में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए गए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। गठबंधन में हुए समझौते के मुताबिक, एनसी के हिस्से में 51 और कांग्रेस के हिस्से में 32 सीटें आईं और 5 सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों के बीच दोस्ताना मुकाबला हुआ। 

विधानसभा चुनाव में एनसी-कांग्रेस और अन्य पार्टियों के गठबंधन को जीत हासिल हुई। उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में एनसी ने 42, बीजेपी ने 29 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन मुख्यमंत्री की कमान संभालने के साथ ही उमर अब्दुल्ला के सामने कई मुश्किलें भी आने लगी। सबसे पहले झटका तो यही लगा कि कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से इनकार करते हुए बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर दिया। 

इससे पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं को पूर्ण राज्य और अनुच्छेद 370 के जमाने की सरकार चलाने की आदत थी लेकिन इस सरकार में उन्हें कदम-कदम पर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का सामना करना पड़ रहा था और दिल्ली की तरह जम्मू कश्मीर की पुलिस भी उनके अधीन नहीं थी। 

रही-सही कसर पार्टी नेताओं में उभरे असंतोष ने पूरी कर दी। नाराज़ विधायकों का अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ 4 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल बनाकर मांगों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त रख देना अपने आप में एक बड़ा इशारा करता है कि हालात हाथ से निकल चुके हैं।

नाराज विधायक उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी, सलाहकार पद से नासिर सोगामी के साथ ही ऐसे मंत्रियों को भी हटाने की मांग कर रहे हैं जो 2 साल से उमर अब्दुल्ला की सरकार में मंत्री है। 

वैसे तो इसे एक केन्द्र शासित प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर मचे घमासान की ख़बर कहकर टाला जा सकता है। लेकिन हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि भारत के सिर के इस ताज जम्मू कश्मीर पर नापाक पाक की बुरी नज़र हमेशा लगी रहती है। पाकिस्तान में लगातार खराब होते राजनीतिक हालात, बिगड़ती अर्थव्यवस्था, बेलगाम होती जा रही महंगाई और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के हिस्से में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच पाकिस्तान लंबे समय से राज्य के हालात को खराब करने का मंसूबा बना रहा है। 

ऐसे हालात में जम्मू कश्मीर में राजनीतिक स्थिरता बहुत जरूरी है और इसके लिए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को तुरंत कुछ बड़े कदम उठाने होंगे। पाकिस्तान इस हालात का फायदा उठाकर कोई बड़ी हरकत करने में कामयाब ना हो जाए, इससे बचने के लिए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को भी फौरन सेना, सुरक्षा बलों, पुलिस और इंटेलिजेंस के साथ मिलकर बड़ी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए राज्य में राजनीतिक स्थिरता और शांति कायम रखने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अब्दुल्ला सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।