चुनाव आयोग पर हमलावार राहुल विपक्ष के साथ संसद से आयोग तक मार्च पर

अरुण श्रीवास्तव

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ समय से विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव का स्वर लगातार तीखा हुआ है। इस टकराव के केंद्र में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी के आक्रामक तेवरों से वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी राजनीतिक रूप से बैकफुट पर हैं, या यह केवल विपक्ष की रणनीतिक बढ़त का केवल एक चरण है?

6 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘इंडिया’ ब्लॉक के सांसदों ने निर्वाचन आयोग तक मार्च किया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया। राहुल ने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में बदलाव लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर निर्वाचन आयोग और बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को वैध प्रक्रिया बताते हैं।

इस घटनाक्रम में राहुल गांधी का राजनीतिक तेवर पहले की तुलना में काफी ज्यादा टकरावपूर्ण दिखाई दिया। उन्होंने सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जवाबदेही तय की जाएगी। ‘इंडिया’ ब्लॉक के करीब 300 सांसदों के मार्च का उल्लेख भी उन्होंने किया।

क्या बीजेपी सचमुच दबाव में है?

हाल के घटनाक्रम में कुछ संकेत विपक्ष के पक्ष में जरूर दिखाई देते हैं। संसद के पिछले मानसून सत्र के बाद संवाददाता से वार्ता में तमाम विपक्षी दलों ने दावा किया था कि लगातार विरोध और दबाव के कारण सरकार का विधायी एजेंडा प्रभावित हुआ। अंग्रेजी समाचार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार विपक्षी नेताओं का मानना था कि उन्होंने सरकार को कई मुद्दों पर रक्षात्मक स्थिति में ला दिया।

अपनी नई रणनीति में राहुल गांधी ने अब विरोध की राजनीति को केवल संसद तक सीमित रखने के बजाय सड़क पर भी सक्रिय किया है। चुनाव आयोग, मतदाता सूची, सामाजिक न्याय, आर्थिक मुद्दों और सरकारी नीतियों पर लगातार हमले उनकी रणनीति का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं। हाल में उन्होंने मध्य प्रदेश में आदिवासी बच्चों की मौत के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा और इसे संसद में उठाने की बात कही।

लेकिन जानकार मानते हैं कि इसे सीधे-सीधे “बीजेपी सरकार बैकफुट पर है” कहना जल्दबाजी होगी। बीजेपी भी राहुल गांधी के आरोपों का लगातार जवाब दे रही है और उनके विरोध-प्रदर्शनों को राजनीतिक तथा संस्थागत टकराव के रूप में पेश कर रही है। बीजेपी नेताओं ने उनके संसद और सड़क पर किए जा रहे विरोधों की आलोचना की है।

असली मुकाबला नैरेटिव का है

देश में चल रही वर्तमान राजनीतिक संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है। राहुल गांधी विपक्ष के लिए एक ऐसा नैरेटिव बनाने का प्रयास कर रहे हैं जिसमें चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, लोकतंत्र और आम मतदाता के अधिकार प्रमुख मुद्दे बनें। दूसरी ओर बीजेपी का जोर सरकार के विकास कार्यों और विपक्ष पर संस्थाओं को राजनीतिक विवाद में घसीटने के आरोप पर है।

इसलिए फिलहाल तस्वीर को सरकार की निर्णायक राजनीतिक हार या विपक्ष की निर्णायक जीत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इतना दावे के साथ कहा जा सकता है कि राहुल गांधी अब रक्षात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय अधिक आक्रामक राजनीतिक संघर्ष की राह पर हैं।

आने वाले महीनों में इस रणनीति की वास्तविक राजनीतिक प्रभावशीलता इस बात से तय होगी कि क्या ये मुद्दे संसद और राजनीतिक गलियारों से निकलकर व्यापक जनचर्चा का स्थायी हिस्सा बनते हैं। अभी इतना स्पष्ट है कि राहुल गांधी का राजनीतिक प्रतिरोध पहले की तुलना में अधिक मुखर और प्रत्यक्ष हो गया है, और बीजेपी को उसका लगातार जवाब देना पड़ रहा है।