अंदलीब अख्तर

सत्ता के गलियारों में उठने वाले शोर के पीछे भागने वाले पत्रकार बहुत हैं, लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे भी होते हैं जो उस शोर के पीछे छिपे तथ्यों और दस्तावेजों की परतें खोलने में अपना समय लगाते हैं। ऋतिका चोपड़ा इसी दूसरी परंपरा की पत्रकार हैं। द इंडियन एक्सप्रेस में चुनाव आयोग की भूमिका और उसके कामकाज से जुड़ी उनकी हालिया रिपोर्ट ने राजनीतिक और मीडिया हलकों में व्यापक चर्चा पैदा की है। इस रिपोर्ट ने एक बार फिर उस पत्रकार को केंद्र में ला दिया है, जिसने करीब दो दशक से देश की राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं को करीब से कवर किया है।

जो लोग वर्षों से ऋतिका चोपड़ा के काम को देखते रहे हैं, उनके लिए इस रिपोर्ट को लेकर पैदा हुआ ध्यान शायद कोई आश्चर्य नहीं है। राजनीति, शासन, शिक्षा और सार्वजनिक नीति से जुड़े मुद्दों पर उनकी रिपोर्टिंग में संस्थागत कामकाज और नीतिगत फैसलों के दूरगामी प्रभावों को समझने की कोशिश लगातार दिखाई देती रही है।

शांत स्वभाव, गहरी पड़ताल

करीब 2015-16 के दौर में जब ऋतिका चोपड़ा शिक्षा मंत्रालय और चुनाव आयोग की नियमित रिपोर्टिंग करती थीं, तब उन्हें दिल्ली के नेशनल मीडिया सेंटर में अक्सर देखा जा सकता था। वहां पत्रकारों की लगातार आवाजाही रहती थी। सूचनाओं का आदान-प्रदान, फोन कॉल, प्रेस ब्रीफिंग और दिनभर की राजनीतिक हलचल के बीच ऋतिका का काम करने का अंदाज कुछ अलग था।

जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती थी, वह थी उनकी असाधारण शांति और एकाग्रता। वह अक्सर अपने नोट्स और दस्तावेजों में डूबी रहतीं और जिस खबर पर काम कर रही होतीं, उसे पूरा करने में लगी रहतीं।

पत्रकारिता की दुनिया में जहां खबर सबसे पहले देने की होड़ अक्सर हावी रहती है, ऋतिका की प्राथमिकता अलग दिखाई देती थी। वह खबर सबसे पहले देने से अधिक उसके तथ्यों को सही ढंग से स्थापित करने पर ध्यान देती थीं। दस्तावेजों को देखना, सूचनाओं की पुष्टि करना और किसी संस्थागत फैसले के पीछे की प्रक्रिया को समझना उनके काम का अहम हिस्सा रहा है।

कोलकाता से सत्ता के गलियारों तक

कोलकाता में जन्मी ऋतिका ने 2006 में हिंदुस्तान टाइम्स से इंटर्न के तौर पर पत्रकारिता की शुरुआत की। 2007 में वह दिल्ली आ गईं और धीरे-धीरे राजनीति, शासन, सामाजिक क्षेत्र और सार्वजनिक नीति की रिपोर्टिंग में अपनी पहचान बनाई।

द इंडियन एक्सप्रेस से 2015 में जुड़ने से पहले उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स सहित कुछ अन्य अखबारों में काम किया। इन संस्थानों में काम करने के दौरान उन्हें राजनीति के साथ-साथ सरकार की नीतियों के आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं को समझने का भी अवसर मिला।

समय के साथ उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। वह नेशनल एजुकेशन एडिटर और बाद में नेशनल ब्यूरो (गवर्नमेंट) की प्रमुख जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर रहीं। इन भूमिकाओं ने उन्हें केंद्र सरकार, उसके मंत्रालयों और महत्वपूर्ण संस्थानों से जुड़ी रिपोर्टिंग के केंद्र में ला खड़ा किया।

शिक्षा उनकी प्रमुख रिपोर्टिंग बीट में रही। लेकिन उनकी रिपोर्टिंग महज सरकारी घोषणाओं या प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं रही। उन्होंने नीतियों के क्रियान्वयन और उनके वास्तविक प्रभावों को समझने और सामने लाने पर भी ध्यान दिया।

चुनाव आयोग की रिपोर्टिंग बनी पहचान

चुनाव आयोग की रिपोर्टिंग उनके पत्रकारिता करियर की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी। उन्होंने वर्षों तक चुनावी प्रशासन और आयोग के कामकाज से जुड़े मुद्दों को करीब से कवर किया। उनकी रिपोर्टिंग में संस्थान के भीतर की प्रक्रियाओं और चुनाव व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर विशेष ध्यान दिखाई देता रहा।

चुनाव आयोग के कामकाज पर उनकी रिपोर्टिंग की इसी निरंतरता को 2021 में प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड से भी मान्यता मिली। उन्हें यह सम्मान चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज की पड़ताल करने वाली उनकी श्रृंखला के लिए मिला।

2018 में उन्हें UNFPA-Laadli Media Award भी मिला। यह सम्मान सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर उनकी रिपोर्टिंग के लिए था, जिसमें हरियाणा के उस कानून को बरकरार रखा गया था, जिसके तहत अशिक्षित उम्मीदवारों के पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई थी।

2019 के लोकसभा चुनावों की उनकी कवरेज को भी व्यापक पहचान मिली। इसके लिए उन्हें 2022 में इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट (IPI) का इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म प्रदान किया गया।

इसके बाद 2024 में उन्हें प्रतिष्ठित चमेली देवी जैन अवॉर्ड फॉर आउटस्टैंडिंग वुमन मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी खोजी पत्रकारिता और सरकारी नीतियों में खामियों, स्वतंत्र संस्थाओं से जुड़े सवालों तथा इतिहास के पुनर्लेखन से संबंधित मुद्दों की रिपोर्टिंग के लिए दिया गया।

नई रिपोर्ट, वही पुराना पत्रकारिता तेवर

चुनाव आयोग को लेकर उनकी हालिया रिपोर्ट को भी इसी लंबे पत्रकारिता सफर के संदर्भ में देखा जा सकता है। रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की भूमिका और कामकाज से जुड़े एक जटिल और संवेदनशील संस्थागत मुद्दे को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

ऐसे विषयों पर रिपोर्टिंग आसान नहीं होती। इसमें दस्तावेजों, तथ्यों और विभिन्न पक्षों की सूचनाओं को सावधानी से परखने की जरूरत होती है। ऋतिका चोपड़ा की पत्रकारिता की पहचान भी इसी तरह की विस्तृत पड़ताल और संस्थागत मुद्दों पर लंबे समय तक काम करने से बनी है।

नेशनल मीडिया सेंटर में खबरों और दस्तावेजों के बीच चुपचाप काम करने वाली पत्रकार से लेकर राष्ट्रीय ब्यूरो की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक और फिर मुंबई में संपादकीय भूमिका तक का उनका सफर पत्रकारिता में निरंतरता की कहानी भी है।

उनकी हालिया रिपोर्ट पर पैदा हुई बहस ने यह जरूर दिखाया है कि किसी संस्थान से जुड़े संवेदनशील सवालों पर तथ्य आधारित खोजी पत्रकारिता आज भी सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकती है।

और इस पूरे सफर को देखते हुए ऋतिका चोपड़ा की पत्रकारिता की सबसे उल्लेखनीय विशेषता शायद यही है—शोर से दूर रहकर तथ्यों के पीछे लगातार काम करते रहना।

इसी संदर्भ में द इंडियन एक्सप्रेस की भूमिका भी उल्लेखनीय है। अखबार का ‘Journalism of Courage’ का घोषित सिद्धांत उन रिपोर्टों को जगह देने की उसकी परंपरा को रेखांकित करता है, जो महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्थानों और उनके कामकाज से जुड़े सवालों को सामने लाती हैं।