Last Updated on July 13, 2026 6:55 pm by INDIAN AWAAZ

असद मिर्ज़ा

दस महीने पहले जिस युवा पीढ़ी ने नेपाल में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी थी, वही आज उस सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है जिसे उसने स्वयं सत्ता तक पहुंचाया था। जबरन बेदखली अभियान, एक चालक की आत्मदाह की घटना और असहमति की आवाज़ों पर बढ़ती सख्ती ने प्रधानमंत्री बलेन्द्र शाह की तथाकथित “नई राजनीति” को कठोर परीक्षा के दौर में ला खड़ा किया है। सवाल यह है कि क्या यह नई व्यवस्था वास्तव में पुरानी राजनीति से अलग है, या फिर वही पुराने तौर-तरीके नए चेहरों के साथ दोहराए जा रहे हैं।

नेपाल एक बार फिर राजनीतिक असंतोष के दौर से गुजर रहा है। सितंबर 2025 में जेनरेशन ज़ेड के नेतृत्व वाले जनआंदोलन ने सिंहदरबार की सत्ता को झकझोरते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था। उसी जनाक्रोश की लहर पर सवार होकर रैपर से इंजीनियर और फिर काठमांडू के लोकप्रिय महापौर बने बलेन्द्र शाह ने मार्च 2026 के चुनावों में भारी जीत दर्ज की और प्रधानमंत्री बने। लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद वही युवा वर्ग अब उनके खिलाफ आंदोलन कर रहा है।

विरोध की वजह क्या है?

विरोध का मुख्य कारण भ्रष्टाचार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक नहीं, बल्कि राजधानी काठमांडू घाटी में बागमती और अन्य नदी किनारों पर बसे अनौपचारिक एवं झुग्गी बस्तियों को हटाने का सरकारी अभियान है।

अप्रैल के अंत से शुरू हुए इस अभियान में अब तक 2,600 से अधिक परिवारों के घर ढहा दिए गए हैं, जिससे लगभग 15,000 लोग प्रभावित हुए हैं। सरकार का तर्क है कि यह सार्वजनिक भूमि पर हुए अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई है। शुरुआत में इस कदम को व्यापक जनसमर्थन भी मिला क्योंकि चुनावी घोषणापत्र में वास्तविक भूमिहीन परिवारों और अवैध कब्जाधारियों की वैज्ञानिक पहचान का वादा किया गया था। इसके लिए उपग्रह मानचित्रण और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग की बात कही गई थी।

लेकिन विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ कि पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना पहले लोगों को उजाड़ दिया गया। लगभग 325 परिवारों को अस्थायी राहत केंद्रों में भेजा गया, जिनमें से कई बाद में बाढ़ की चपेट में आ गए। सबसे अधिक चर्चा कीर्तिपुर स्थित राहत केंद्र की हुई, जहां रहने की परिस्थितियां बेहद खराब बताई गईं।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब सरकार ने इन अस्थायी आश्रयों को भी खाली करने का आदेश दे दिया, जबकि वहां रह रहे कई परिवारों के पास जाने के लिए कोई वैकल्पिक स्थान नहीं था।

जनाक्रोश उस समय चरम पर पहुंच गया जब नगर पुलिस के साथ विवाद के बाद चालक गणेश नेपाली ने स्वयं को आग लगा ली। प्रदर्शनकारियों ने इस घटना को गरीबों के प्रति सरकारी असंवेदनशीलता का प्रतीक बना दिया।

इसके बाद संयुक्त राष्ट्रीय भूमिहीन मोर्चा ने “गरीबों पर अत्याचार बंद करो” जैसे नारों के साथ विरोध मार्च निकाले। जिन युवा कार्यकर्ताओं ने कभी बलेन्द्र शाह के सत्ता में आने का समर्थन किया था, वे अब उन पर भूमिहीन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सितंबर 2025 के आंदोलन का उद्देश्य जवाबदेह और समावेशी शासन स्थापित करना था, लेकिन वर्तमान सरकार उसी भावना से भटक गई है।

सरकार का पक्ष

प्रधानमंत्री बलेन्द्र शाह की सरकार का कहना है कि भूमि प्रबंधन का यह अभियान लंबे समय से लंबित था और इसमें वास्तविक भूमिहीन परिवारों तथा लाभ के लिए सार्वजनिक या निजी भूमि पर कब्जा करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा रहा है।

हालांकि सरकार की सबसे अधिक आलोचना उसकी कार्रवाई के तरीके को लेकर हो रही है।

पुलिस ने कई युवा कार्यकर्ताओं—माजिद अंसारी, सरिस्मा थापा और नेल्सन घाटानी—को उस समय हिरासत में ले लिया जब वे कीर्तिपुर राहत केंद्र में बाढ़ के बाद की स्थिति का दस्तावेजीकरण करने पहुंचे थे। कानूनी पेशे से जुड़े माजिद अंसारी ने आरोप लगाया कि उन्हें राहत केंद्र के प्रवेश द्वार पर पुलिस ने पीटा।

एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता दुर्गा प्रसाई को भी त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बातचीत की योजना बनाने के आरोप में हिरासत में लिया गया। पुलिस ने इसे “संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र” से जुड़ा मामला बताया।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अबी नारायण काफ्ले का कहना है कि कार्रवाई केवल उन लोगों के खिलाफ की जाती है जो पुलिस के काम में बाधा डालते हैं, अशांति फैलाते हैं या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं। उनका दावा है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का सरकार सम्मान करती है।

लेकिन मानवाधिकार संगठनों का दृष्टिकोण अलग है। राष्ट्रीय महिला मानवाधिकार रक्षक गठबंधन ने सरकार पर अमानवीय व्यवहार और गैरकानूनी हिरासत का आरोप लगाया है। वहीं, कई स्वतंत्र रिपोर्टों में यह कहा गया है कि पुलिस शांतिपूर्ण विरोध को भी सुरक्षा चुनौती के रूप में देख रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) दो बार सरकार को निर्देश दे चुका है कि वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना राहत केंद्रों से भूमिहीन परिवारों को न हटाया जाए। आयोग ने नेपाल के 2018 के भूमिहीन आवास कानून, संविधान के अनुच्छेद 37 में निहित आवास के अधिकार तथा नेपाल द्वारा अनुमोदित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का हवाला दिया है।

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बेदखली अभियान पर सरकार से जवाब तलब किया है। एक मंत्री ने सार्वजनिक रूप से भूमिहीन परिवारों से माफी मांगते हुए स्थिति को “देखना भी कठिन” बताया, हालांकि सरकार आधिकारिक तौर पर अब भी अपने अभियान को कानूनी और उचित बता रही है।

विपक्ष की रणनीति

मार्च 2026 के चुनाव में पराजित राजनीतिक दलों ने इस संकट को सरकार को घेरने के अवसर के रूप में देखा है।

सीपीएन-यूएमएल के नेता नीरज आचार्य का कहना है कि जनता का जनादेश सरकार को मनमानी करने का अधिकार नहीं देता। उन्होंने पहले पुनर्वास और उसके बाद विस्थापन की नीति अपनाने की मांग की है।

जनता समाजवादी पार्टी के नेता महतो ने सरकार के शुरुआती सौ दिनों को “पुराने अधिनायकवाद की गंध” वाला बताया। उनके अनुसार झुग्गियों पर बुलडोजर चलाना, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कर लगाना तथा गणेश नेपाली की आत्मदाह की घटना सरकार की असंवेदनशीलता को दर्शाती है।

नेपाली कांग्रेस के नेताओं गगन कुमार थापा और भीष्म राज आंगदेम्बे ने हिरासत में लिए गए सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि सरकार का रवैया नहीं बदला तो अशांति और बढ़ सकती है।

हालांकि इसमें एक विडंबना भी है। जिन राजनीतिक दलों ने दशकों तक भूमिहीन बस्तियों की समस्या का समाधान नहीं किया और जो स्वयं 2025 के युवा आंदोलन के निशाने पर थे, वही आज भूमिहीनों के सबसे बड़े समर्थक बनने का दावा कर रहे हैं। फिर भी उनकी आलोचना इसलिए प्रभावी लग रही है क्योंकि वही बातें स्वतंत्र मानवाधिकार संस्थाएं और युवा कार्यकर्ता भी लगातार उठा रहे हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

वर्तमान संकट का मूल कारण सरकारी मंशा से अधिक उसकी कार्यप्रणाली है।

नेपाल का संविधान, 2018 का भूमिहीन अधिकार कानून तथा सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले स्पष्ट करते हैं कि किसी भी परिवार को हटाने से पहले उसके लिए वैकल्पिक आवास और आजीविका की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सरकार को चाहिए कि वह पुनर्वास स्थलों की समुचित व्यवस्था होने तक आगे की बेदखली पर रोक लगाए। साथ ही भूमि संबंधी समस्या समाधान आयोग के माध्यम से वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से वास्तविक भूमिहीन परिवारों की पहचान पूरी करे, न कि केवल बुलडोजर अभियान के जरिए समस्या का समाधान खोजे।

इसके समानांतर सरकार को विरोध प्रदर्शनों के प्रति अपना रवैया भी नरम करना होगा। हिरासत में लिए गए सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई, पुलिस पर लगे मारपीट के आरोपों की निष्पक्ष जांच और पत्रकारों, वकीलों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सुरक्षा खतरे के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानना स्थिति को सामान्य बनाने में मदद करेगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बलेन्द्र शाह सरकार को समझना होगा कि जेनरेशन ज़ेड का आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं था। उसकी मूल मांग ऐसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना थी जो प्रत्येक नागरिक, विशेषकर समाज के सबसे कमजोर वर्गों, के साथ कानून और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार व्यवहार करें।

यदि सरकार इस कसौटी पर खरा उतरने में विफल रहती है तो नेपाल का अब तक का सबसे युवा नेतृत्व भी उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा माना जाएगा, जिसके विरुद्ध कभी उसने स्वयं संघर्ष किया था।