Last Updated on June 4, 2026 10:25 pm by INDIAN AWAAZ

एस. एन. वर्मा
भारत में बेहद सख्त और मजबूत पर्यावरण कानूनों की मौजूदगी के बावजूद, देश की प्रमुख नदियां आज भी प्रशासनिक ढुलमुलपन, विभागों के बीच तालमेल की कमी और बुनियादी ढांचे की सुस्त रफ्तार के त्रिकोण में फंसी हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों में पानी की बढ़ती मांग ने गंगा जैसी महत्वपूर्ण जीवनदायिनियों की सेहत को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है—एक ऐसा संकट जिसे जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव और भी खतरनाक बना रहा है।
इस पारिस्थितिक आपातकाल (Ecological Emergency) के जवाब में, भारत सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014-15 में ‘नमामी गंगे कार्यक्रम’ की शुरुआत की थी। एक व्यापक और एकीकृत संरक्षण मिशन के रूप में तैयार किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य गंगा और उसकी सहायक नदियों के पूरे तंत्र को साफ और पुनर्जीवित करना था। हालांकि इसका प्रारंभिक पांच साल का कार्यकाल मार्च 2021 में समाप्त हो गया था, लेकिन सरकार ने इस अभियान को लगातार आगे बढ़ाया है। अब रणनीति को बहुआयामी बनाते हुए इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP), नदी तटों का प्रबंधन, ग्रामीण स्वच्छता, जैव विविधता संरक्षण और जनभागीदारी को शामिल किया गया है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा हाल ही में संसद में प्रस्तुत किए गए आंकड़े इस मिशन के विशाल वित्तीय पैमाने को दर्शाते हैं। सरकार ने नमामी गंगे के तहत ₹43,030 करोड़ की अनुमानित लागत से 524 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनमें से 355 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इसके समानांतर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP) ने अपना दायरा बढ़ाते हुए 17 राज्यों के 100 शहरों में 58 नदियों को लक्षित किया है, जिसके तहत प्रतिदिन 3,019 मिलियन लीटर सीवेज को साफ करने की क्षमता विकसित की गई है।
इस मिशन से देश का भविष्य जुड़ा हुआ है। गंगा बेसिन भारतीय सभ्यता का मुख्य आधार है, जो 11 राज्यों में फैला है, देश के 27 प्रतिशत भूभाग को कवर करता है और लगभग आधी आबादी का पेट भरता है। ऐसा ही संकट दक्षिण भारत में भी देखा जा रहा है, जहाँ मूसी, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, कावेरी, महानदी और पेरियार जैसी महत्वपूर्ण नदी घाटियों में प्रदूषण कम करने के प्रयास जारी हैं।
परंतु, बुनियादी ढांचे पर इतने बड़े खर्च के बावजूद, जमीन पर इसके परिणाम एक जटिल और असमान तस्वीर पेश करते हैं। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 112 स्थानों पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा की जाने वाली नियमित निगरानी से पता चलता है कि नदी कुछ हिस्सों में तो सांस ले पा रही है, लेकिन इसके मुख्य औद्योगिक क्षेत्र आज भी बेहद जहरीले बने हुए हैं।
राहत की बात यह है कि एक दशक पहले की तुलना में गंगा की मुख्य धारा में सुधार दर्ज किया गया है। सीपीसीबी की रिपोर्ट बताती है कि सभी परीक्षण स्थलों पर घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen – DO) और पीएच (pH) का स्तर अब बाहरी स्नान (Bathing Criteria) के निर्धारित मानकों को पूरा करता है। इसके अलावा, गंगा और यमुना की सहायक नदियों के जैविक जल गुणवत्ता (BWQ) की निगरानी में पानी की स्थिति को मुख्य रूप से “अच्छी से मध्यम” श्रेणी में रखा गया है।
लेकिन, जैसे ही बात बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD)—जो पानी में मौजूद जैविक प्रदूषण का मुख्य पैमाना है—पर आती है, पूरी व्यवस्था की कमियां उजागर हो जाती हैं। उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में तो गंगा का पूरा प्रवाह बीओडी मानकों पर खरा उतरता है, लेकिन उत्तर प्रदेश का औद्योगिक बेल्ट इस पूरी मेहनत पर पानी फेर देता है। फर्रुखाबाद से लेकर कानपुर के ओल्ड राजापुर तक, और रायबरेली के डलमऊ से लेकर मिर्जापुर और गाजीपुर के तारीघाट तक के घनी आबादी और कारखानों वाले हिस्सों में गंगा नदी पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही है।
यह स्थानीय विफलता एक गहरी कड़वी सच्चाई को रेखांकित करती है: नदियों की सफाई एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसे पूरी तरह से नई दिल्ली में बैठकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार भले ही वित्तीय रीढ़ की हड्डी प्रदान करती है, लेकिन प्रदूषण को नियंत्रित करने और सीवेज व औद्योगिक कचरे को नदी में गिरने से पहले साफ करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों, शहरी स्थानीय निकायों और खुद उद्योगों की है।
इस नागरिक और प्रशासनिक अंतर को पाटने के लिए, नमामी गंगे ने अब जन आंदोलन का रूप लेने की कोशिश की है। ‘स्वच्छता पखवाड़ा’ और ‘गंगा उत्सव’ से लेकर राफ्टिंग अभियानों, वृक्षारोपण और घाटों पर योग जैसे बड़े अभियानों के जरिए जनता में जिम्मेदारी का अहसास कराने का प्रयास किया जा रहा है। ‘घाट में हाट’ जैसे अभिनव प्रयोगों के माध्यम से नदी संरक्षण को स्थानीय आजीविका से जोड़ने की कोशिश भी की गई है।
भारतीय न्यायपालिका ने भी हमेशा वहां हस्तक्षेप किया है जहां सरकारें पीछे छूटी हैं। 1987 के ऐतिहासिक एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक ‘जीने के अधिकार’ का एक अभिन्न हिस्सा है। इस मुकदमे के तहत अदालत ने उद्योगों पर तब तक गंगा में कचरा डालने पर रोक लगा दी थी जब तक कि वे ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित नहीं कर लेते। हालांकि, एक बड़े प्रक्रियात्मक बदलाव के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने अब अपनी स्वतः संज्ञान (Suo Motu) निगरानी कार्यवाही को बंद कर दिया है और प्राथमिक निगरानी की जिम्मेदारी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को सौंप दी है, क्योंकि एनजीटी जैसे विशेष न्यायाधिकरण इन तकनीकी स्थितियों की निरंतर निगरानी करने में अधिक सक्षम हैं।
इन सबके बावजूद, नदी आज भी मैली क्यों है? इसका जवाब छिपे हुए प्रशासनिक गतिरोधों में है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में कर्मचारियों की भारी कमी और लचर निगरानी के कारण प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती। उदाहरण के लिए, यमुना के किनारों पर स्थित कारखाने बिना किसी डर के लगातार अनुपचारित कचरा नदी में बहा रहे हैं क्योंकि चौबीसों घंटे की निगरानी व्यवस्था गायब है। देश का 60 प्रतिशत से अधिक शहरी सीवेज आज भी बिना किसी उपचार के सीधे जल निकायों में बह रहा है, जो नए ट्रीटमेंट प्लांटों की निर्माण गति से कहीं अधिक तेज है।
इस समस्या को और गंभीर बनाता है लालफीताशाही का पुराना ढर्रा। कई एजेंसियों के शामिल होने से काम का दोहराव होता है; राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अक्सर स्थानीय नगर निकायों के साथ समन्वय करने में विफल रहते हैं, जिससे अवैध कचरा डंपिंग पर कार्रवाई सुस्त पड़ जाती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को मंजूरी देने में होने वाली देरी ने फंड की उपयोगिता को सीमित कर दिया है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि वित्तीय वर्ष तक नमामी गंगे कार्यक्रम के लिए आवंटित कुल धन का केवल 69 प्रतिशत ही वास्तव में उपयोग किया जा सका। नतीजतन, जहां एक तरफ अरबों रुपये फाइलों और खातों में बंद पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत की सबसे पवित्र नदी आज भी अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है।
