Last Updated on June 3, 2026 5:04 pm by INDIAN AWAAZ


— विवेक शुक्ला

मालवीय नगर के एक होटल में लगी भीषण आग के वीडियो देखकर मन विचलित हो जाता है। यह सोचकर ही सिहरन होती है कि आग और धुएं के बीच फंसे लोगों ने बचने की कितनी कोशिशें की होंगी। कुछ लोग बाहर निकल पाए, लेकिन कई जिंदगी की लड़ाई हार गए। ऐसे हर हादसे के बाद शोक, बयान, जांच और मुआवजों की घोषणा होती है—लेकिन कुछ समय बाद सब सामान्य मान लिया जाता है। यही सबसे बड़ा संकट है।

दिल्ली में आग की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। फ्लैटों, अपार्टमेंट्स, होटलों, बाजारों, व्यावसायिक परिसरों और झुग्गी बस्तियों में बार-बार लगने वाली आग केवल तकनीकी दुर्घटनाएं नहीं हैं। इनके पीछे अक्सर लापरवाही, कमजोर निगरानी, नियमों की अनदेखी और हमारी सामूहिक भूलने की आदत छिपी होती है।

दिल्ली ने पहले भी ऐसे कई दर्दनाक हादसे देखे हैं।

1983 का गोपाला टावर हादसा आज भी पुरानी दिल्ली की स्मृति में दर्ज है। राजेंद्र प्लेस स्थित इस ऊंची इमारत में ट्रांसफार्मर में लगी आग ने सैकड़ों लोगों को घंटों तक फंसा दिया था। लोग छतों पर मदद का इंतजार करते रहे। तब भी सवाल फायर सेफ्टी पर उठे थे।

फिर 1997 में उपहार सिनेमा त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर दिया। फिल्म देखने आए 59 लोगों की जान चली गई, जिनमें 23 बच्चे थे। धुएं, बंद निकास मार्गों, खराब सुरक्षा व्यवस्था और असफल आपात तंत्र ने इस हादसे को राष्ट्रीय चेतावनी बना दिया था।

दिल्ली में आग की घटनाएं केवल इतिहास नहीं, वर्तमान की चेतावनी भी हैं। पालम में चार मंजिला इमारत में लगी आग ने नौ लोगों की जान ले ली। कई लोग जान बचाने के लिए ऊंचाई से कूदने को मजबूर हुए। पिछले महीने पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार इलाके में एक चार मंजिला आवासीय इमारत में लगी आग में नौ लोगों की मौत हो गई थी। शुरुआती जांच में एसी विस्फोट या शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई गई। बंद दरवाजे, ग्रिल लगी बालकनियां और सीमित निकासी रास्ते कई लोगों के लिए जानलेवा साबित हुए।

अब मालवीय नगर का हादसा हमारे सामने है।

सवाल है—दिल्ली बार-बार वही गलती क्यों दोहराती है? इसके कारण सतही नहीं हैं। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, अनियोजित निर्माण, सस्ती सामग्री का इस्तेमाल, अवैध निर्माण, पुरानी वायरिंग, बढ़ता बिजली लोड और फायर सुरक्षा मानकों की अनदेखी—ये सब मिलकर खतरे को बढ़ाते हैं। कई इमारतों में अग्नि सुरक्षा उपकरण केवल निरीक्षण के दिन तक सक्रिय रहते हैं।

दिल्ली जैसे महानगर में गर्मियों के दौरान एयर कंडीशनर, ओवरलोडेड बिजली व्यवस्था और सीमित निकासी मार्ग आग को कुछ ही मिनटों में जानलेवा बना देते हैं।

हर हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय दिखता है। जांच समितियां बनती हैं, जिम्मेदारी तय करने की बातें होती हैं, लेकिन क्या इन रिपोर्टों का असर जमीन पर दिखाई देता है? यही वह प्रश्न है जिससे बचा नहीं जा सकता।

यह आग सिर्फ इमारतों को नहीं जलाती—यह हमारी सार्वजनिक व्यवस्था, जवाबदेही और संवेदनशीलता की परीक्षा लेती है। हर मौत के पीछे एक परिवार, एक सपना और एक अधूरी कहानी होती है।

अब समय केवल दुख जताने का नहीं, व्यवस्था बदलने का है। नियमित फायर ऑडिट, पारदर्शी निरीक्षण, पुरानी इमारतों की अनिवार्य सुरक्षा जांच, सख्त जवाबदेही और नागरिक जागरूकता को प्राथमिकता बनाना होगा।

वरना गोपाला टावर, उपहार, पालम और मालवीय नगर—ये सिर्फ हादसों के नाम नहीं रह जाएंगे, बल्कि हमारी असफलताओं के स्थायी स्मारक बन जाएंगे।

जब तक हम सबक नहीं लेंगे, दिल्ली में आग लगती रहेगी और जिंदगियां बुझती रहेंगी।