Last Updated on March 14, 2026 3:47 pm by INDIAN AWAAZ

प्रवीण कुमार

उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे बड़ा मंच है। यहां की सत्ता न सिर्फ राज्य की सरकार बनाती है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करती है। यही वजह है कि भाजपा और आरएसएस दोनों के लिए उत्तर प्रदेश रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। पिछले चुनावों में भाजपा को मिली बड़ी जीत के पीछे जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता एक प्रमुख कारक रही, वहीं संघ के व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क ने भी जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत किया है।

ऐसी खबर आ रही है कि आरएसएस ने खासतौर से उत्तर प्रदेश भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट संकेत दिया है कि चुनावी सफलता सिर्फ नेतृत्व की लोकप्रियता से नहीं बल्कि संगठन की गहराई से भी तय होती है। संघ का मानना है कि पार्टी को बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखना होगा और कार्यकर्ताओं की भूमिका को प्राथमिकता देनी होगी। पिछले कुछ समय से भाजपा के भीतर यह चर्चा रही है कि सत्ता में आने के बाद कई स्थानों पर संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ी है। संघ इस दूरी को कम करने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।

आरएसएस का एक प्रमुख संदेश सामाजिक संतुलन को लेकर भी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। भाजपा ने 2014 के बाद से इन समीकरणों को नए तरीके से साधने की कोशिश की है और गैर-यादव पिछड़ा वर्ग तथा गैर-जाटव दलित समुदायों में अपना आधार मजबूत किया है। संघ का मानना है कि आगामी चुनावों में इस सामाजिक गठजोड़ को और मजबूत करना जरूरी होगा। लेकिन आरएसएस का जो ताजा संदेश आया है वह शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद को लेकर है जिसमें कहा गया है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में “सनातन नैरेटिव” को लेकर भाजपा और संघ दोनों को बेहद सतर्क हो जाना चाहिए।

संघ की ओर से भाजपा नेतृत्व को साफ संदेश दिया गया है कि शंकराचार्य विवाद से सनातन एकता की मुहिम को चोट पहुंच रही है। संघ का साफ मानना है कि यह विषय सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। इसलिए सरकार और पार्टी को हर स्तर पर इस विवाद से पैदा हो रही निगेटिविटी को काउंटर करना होगा, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि सरकार संत-समाज और सनातन परंपरा के साथ खड़ी है।

कानपुर में बीते 6 मार्च को हुई इस समन्वय बैठक को राजनीतिक हलकों में भाजपा के “ट्रिपल-एस मॉडल” (सरकार, संगठन और संघ) की रणनीतिक बैठक के रूप में देखा जा रहा है। बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल के साथ संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद थे। कई घंटे तक चली इस बैठक में न सिर्फ शंकराचार्य विवाद बल्कि संगठन में अनुशासन, लोकसभा चुनाव के बाद पैदा हुए असंतोष और 2027 की चुनावी तैयारी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।

दरअसल, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद पिछले कुछ समय से राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। विपक्षी दल इसे भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों का प्रयास है कि इस विवाद के जरिए भाजपा के हिंदुत्व वाले नैरेटिव में दरार पैदा की जाए। यही वजह है कि पार्टी के भीतर भी इसको लेकर चिंता देखी जा रही है। संघ का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर स्पष्ट और मजबूत संदेश नहीं दिया गया तो यह भाजपा के वैचारिक आधार को नष्ट कर सकता है।

संघ के भीतर की समझ यह भी है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका वैचारिक आधार और हिंदुत्व का व्यापक सामाजिक समर्थन है। यदि संत समाज या धार्मिक नेतृत्व से जुड़े विवादों को सही तरीके से नहीं संभाला गया तो विपक्ष इसे राजनीतिक हथियार बना सकता है। इसलिए संघ ने साफ संकेत दिया है कि शंकराचार्य विवाद को सिर्फ एक व्यक्ति या बयान के स्तर पर नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

 संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ योगी आदित्यनाथ की हाल की मुलाकातों और कानपुर की बैठक में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था। राजनीतिक के जानकारों का मानना है कि संघ ने इस बात का संकेत भी दे दिया है कि 2027 के चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा योगी आदित्यनाथ ही होंगे। ऐसे में उनके खिलाफ किसी भी तरह की नकारात्मक मुहिम का जवाब देने के लिए पार्टी और संगठन दोनों सक्रिय रहेंगे।

दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी रणनीति केवल विकास या प्रशासनिक मुद्दों पर आधारित नहीं होती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद भाजपा के लिए यह नैरेटिव और मजबूत हुआ है। लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने यह चुनौती भी है कि वह संत-समाज और धार्मिक संस्थाओं के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखे।

संघ और भाजपा के रिश्तों को समझने के लिए हाल के कुछ मुद्दों पर संघ के रुख को देखना भी जरूरी है। मसलन वक्फ संशोधन विधेयक के मामले में संघ ने केंद्र सरकार का खुलकर समर्थन किया था। संघ का तर्क था कि वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता जरूरी है और इसे सुधार के रूप में पेश किया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर संघ ने अपने स्वयंसेवकों को यह जिम्मेदारी भी दी कि वे पसमांदा मुस्लिम समुदाय और गरीब तबकों के बीच जाकर इस कानून के उद्देश्य को समझाएं।

इसी तरह से जनवरी 2026 में नए यूजीसी नियमों को लेकर जब आरक्षण पर विवाद खड़ा हुआ, तब भी संघ ने सरकार को सामाजिक संतुलन बनाए रखने की सलाह दी थी। विशेष रूप से दलित समुदायों में फैल रही नाराजगी को देखते हुए संत रविदास की जयंती को बड़े स्तर पर मनाने और सामाजिक समरसता अभियान चलाने की रणनीति बनाई गई। इसका उद्देश्य यह संदेश देना था कि भाजपा आरक्षण व्यवस्था के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई के इलाकों में धर्मांतरण और अवैध मजारों के मुद्दे पर भी संघ ने योगी सरकार के कदमों का समर्थन किया। संघ का मानना रहा है कि इन मामलों में सरकार की सख्ती से भाजपा के समर्थक वर्ग को मजबूत संदेश जाता है। यही वजह है कि धर्मांतरण विरोधी कानून और अवैध ढांचों पर कार्रवाई जैसे कदमों को संघ ने वैचारिक रूप से उचित ठहराया।

इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति सिर्फ चुनावी गणित तक सीमित नहीं है। यहां वैचारिक विमर्श, सामाजिक समीकरण और धार्मिक प्रतीकों की राजनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शंकराचार्य विवाद इसी व्यापक संदर्भ का हिस्सा बन गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा कितना असर डालेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना तय है कि भाजपा और संघ दोनों इसे हल्के में लेने के मूड में नहीं हैं। संघ का स्पष्ट संदेश है कि यदि सनातन और संत-समाज से जुड़े मुद्दों पर भ्रम या नकारात्मकता फैलती है तो उसे समय रहते दूर करना होगा।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह केवल एक विवाद का प्रबंधन नहीं बल्कि भाजपा के वैचारिक नैरेटिव की रक्षा का प्रयास भी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की लगातार चुनावी सफलताओं के पीछे जो सामाजिक और वैचारिक गठजोड़ बना है, उसे बनाए रखना पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती है। शंकराचार्य विवाद ने यह याद दिला दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक नेतृत्व, संत-समाज और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रभाव अब भी गहरा है। भाजपा और संघ के लिए यह सिर्फ राजनीतिक प्रश्न नहीं बल्कि अपने समर्थकों में भरोसा बनाए रखने का भी मामला है।

बहरहाल, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और संगठन इस विवाद को किस तरह से संभालते हैं और क्या यह वास्तव में 2027 के चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करेगा? क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जीत सिर्फ राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होती, बल्कि संगठन की ताकत, नेतृत्व की विश्वसनीयता और जनता के साथ निरंतर संवाद की भूमिका भी अहम होती है। आरएसएस के संदेश इसी मूलभूत राजनीतिक सच की याद दिलाते हैं। भाजपा के लिए चुनौती यह होगी कि वह इन संकेतों को चुनावी रणनीति में किस तरह रूपांतरित करती है और किस हद तक संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ती है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)