Last Updated on March 10, 2026 6:26 pm by INDIAN AWAAZ


नई दिल्ली (स्टाफ रिपोर्टर)

Supreme Court of India ने कहा है कि देश में अब यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू करने के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय पर कानून बनाना न्यायपालिका के बजाय संसद का काम है।

यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 की कुछ धाराओं को मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताते हुए उन्हें निरस्त करने की मांग की गई थी।

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति R. Mahadevan की पीठ ने कहा कि यदि अदालत शरिया आधारित उत्तराधिकार कानून को रद्द कर देती है तो इससे कानूनी शून्य (लीगल वैक्यूम) पैदा हो सकता है, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून मौजूद नहीं है।

संसद को निर्णय लेने देना बेहतर

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि केवल व्यक्तिगत कानूनों को निरस्त कर देना समाधान नहीं है, क्योंकि इससे कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर संसद द्वारा एक व्यापक कानून बनाना अधिक उचित होगा।

उन्होंने कहा कि यदि अदालत व्यक्तिगत कानूनों को अमान्य घोषित कर दे तो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे पारिवारिक मामलों में बड़ी उलझन पैदा हो सकती है। इसलिए इस मामले को विधायिका की समझदारी पर छोड़ना ही बेहतर होगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी इस विचार से सहमति जताते हुए कहा कि इस समस्या का व्यावहारिक समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड हो सकता है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ को दी गई चुनौती

अदालत में दाखिल याचिका में Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 की उन धाराओं को चुनौती दी गई है जो भारत में मुसलमानों के बीच विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों को नियंत्रित करती हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों के कारण विशेष रूप से उत्तराधिकार के मामलों में मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan ने अदालत को बताया कि शरिया आधारित उत्तराधिकार नियमों के तहत कई मामलों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि 1937 के कानून को असंवैधानिक घोषित किया जाए तो उत्तराधिकार के मामलों को Indian Succession Act, 1925 के तहत संचालित किया जा सकता है, जो महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देता है।

कानूनी शून्य को लेकर चिंता

हालांकि पीठ ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि 1937 का कानून रद्द कर दिया जाए तो उसकी जगह कौन सा कानून लागू होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चेतावनी दी कि न्यायिक हस्तक्षेप से अनजाने में मुस्लिम महिलाओं को उपलब्ध मौजूदा अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।

पीठ ने कहा कि किसी वैकल्पिक कानून के बिना मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करने से विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में कानूनी अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि भारत के संविधान के Article 372 of the Constitution of India के तहत पहले से लागू कानून तब तक प्रभावी रहते हैं जब तक उन्हें औपचारिक रूप से निरस्त न कर दिया जाए।

यूनिफॉर्म सिविल कोड पर फिर तेज हुई बहस

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। संविधान के Article 44 of the Constitution of India में इस सिद्धांत का उल्लेख है, जिसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करने की बात कही गई है।

समर्थकों का मानना है कि इससे लैंगिक समानता और कानूनी एकरूपता को बढ़ावा मिलेगा, जबकि आलोचकों का कहना है कि इसे लागू करते समय भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना आवश्यक है।