Last Updated on March 7, 2026 12:58 am by INDIAN AWAAZ

कानूनी और व्यावहारिक चुनौतियों पर बहस तेज

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नई दिल्ली/बेंगलुरु/अमरावती: भारत में बच्चों के बीच बढ़ती स्मार्टफोन और सोशल मीडिया लत को लेकर चिंता के बीच दो राज्यों—Karnataka और Andhra Pradesh—ने नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कर्नाटक सरकार ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है, जबकि आंध्र प्रदेश सरकार 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए इसी तरह की पाबंदी लागू करने पर विचार कर रही है।

यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो भारत में पहली बार किसी राज्य स्तर पर बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने का व्यापक प्रयास होगा। इस प्रस्ताव का असर YouTube, Facebook, Instagram, Threads, X और Roblox जैसे लोकप्रिय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पड़ सकता है।

नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े बढ़ते मुद्दों को देखते हुए उठाया जा रहा है।


कर्नाटक के बजट में आया प्रस्ताव

यह घोषणा Siddaramaiah ने राज्य का 2026–27 का बजट पेश करते समय की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग से रोकने के लिए नीति बनाने की दिशा में काम करेगी।

यह प्रस्ताव राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग से संबंधित योजनाओं के तहत रखा गया है। सरकार का कहना है कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं।

मुख्यमंत्री के अनुसार इस नीति के मुख्य उद्देश्य हैं:

  • बच्चों में बढ़ता अत्यधिक स्क्रीन टाइम कम करना
  • सोशल मीडिया से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को नियंत्रित करना
  • बच्चों को ऑनलाइन हानिकारक सामग्री से बचाना
  • पढ़ाई और शैक्षणिक प्रदर्शन पर डिजिटल व्याकुलता के प्रभाव को कम करना

सरकारी अधिकारियों के अनुसार फिलहाल बजट में केवल नीति की मंशा व्यक्त की गई है। इसके बाद सरकार एक विशेषज्ञ समिति या नियामक बोर्ड गठित कर सकती है जो इस प्रतिबंध को लागू करने के लिए विस्तृत ढांचा तैयार करेगा।

हालांकि अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया है कि इस तरह की पाबंदी को लागू करना आसान नहीं होगा और इसमें अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।


आंध्र प्रदेश भी कर रहा है समान नीति पर विचार

इसी दिशा में Amaravati में N. Chandrababu Naidu ने राज्य विधानसभा में घोषणा की कि सरकार 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है।

मुख्यमंत्री ने बताया कि इस विषय पर तकनीकी विशेषज्ञों, शिक्षा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं से चर्चा चल रही है और अगले तीन महीनों में इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार इस योजना के तहत कई “गेट-कीपिंग मॉडल” पर विचार किया जा रहा है, जिनमें शामिल हैं:

  • स्कूल प्रशासन की निगरानी
  • इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की भूमिका
  • सोशल मीडिया कंपनियों के साथ तकनीकी सहयोग
  • अभिभावकों की सहमति और निगरानी

इसके अलावा राज्य सरकार यह भी देख रही है कि कहीं इस तरह की नीति लागू करने में कानूनी जटिलताएं तो नहीं आएंगी। इसलिए केंद्र सरकार के साथ समन्वय कर कानून बनाने की संभावना भी तलाश की जा रही है।


दुनिया भर में बढ़ रही है ऐसी पहल

भारत के इन प्रस्तावों को वैश्विक स्तर पर चल रही बहस का हिस्सा माना जा रहा है। कई देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के प्रयास शुरू हो चुके हैं।

हाल ही में Australia ने किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लाकर दुनिया का पहला ऐसा देश बनने का दावा किया। इसके बाद अन्य देशों ने भी इसी तरह की नीतियों पर विचार शुरू किया है।

इसी क्रम में Indonesia ने घोषणा की है कि वह 28 मार्च से 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए कई “उच्च जोखिम वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म” पर प्रतिबंध लगाएगा।

इन कदमों के पीछे मुख्य कारण बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं।


कानूनी चुनौतियाँ भी कम नहीं

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इस तरह का प्रतिबंध लागू करना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सबसे पहले यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या ऐसा प्रतिबंध Constitution of India में दिए गए मौलिक अधिकारों के अनुरूप होगा। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।

हालांकि सरकार सार्वजनिक हित में “उचित प्रतिबंध” लगा सकती है, लेकिन अदालत यह जांच कर सकती है कि क्या बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध उचित और संतुलित उपाय है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल गोपनीयता से जुड़ा है। Digital Personal Data Protection Act, 2023 के तहत कंपनियों को 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले अभिभावकों की अनुमति लेना अनिवार्य है।

यदि राज्य सरकारें इससे आगे जाकर प्रतिबंध लगाती हैं तो यह सवाल भी उठ सकता है कि इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के नियमन का अधिकार मुख्यतः केंद्र सरकार के पास है।


लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ

नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही कानून बना दिया जाए, लेकिन इसे लागू करना बेहद कठिन होगा।

मुख्य चुनौतियाँ इस प्रकार हैं:

उम्र की पुष्टि:
अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र की पुष्टि केवल स्वयं द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित होती है, जिसे आसानी से बदला जा सकता है।

तकनीकी रास्ते:
बच्चे वीपीएन या वैकल्पिक अकाउंट बनाकर प्रतिबंध से बच सकते हैं।

अभिभावकों की भूमिका:
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के डिजिटल व्यवहार को नियंत्रित करने में अभिभावकों की निगरानी सबसे प्रभावी उपाय है।

टेक कंपनियों का सहयोग:
नीति को सफल बनाने के लिए Meta Platforms जैसी कंपनियों सहित अन्य सोशल मीडिया कंपनियों का सहयोग आवश्यक होगा।


शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

शिक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि बच्चों में बढ़ती स्मार्टफोन निर्भरता उनकी पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर रही है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिद्म आधारित सामग्री बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखती है, जिससे नींद की कमी, तनाव और आत्मविश्वास में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आती हैं।

साइबर बुलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न के मामले भी किशोरों में तेजी से बढ़े हैं।


आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल भारत में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकती है।

जहां समर्थकों का कहना है कि बच्चों के मानसिक और शैक्षणिक हितों की रक्षा के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं, वहीं आलोचकों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय डिजिटल शिक्षा, अभिभावक जागरूकता और बेहतर प्लेटफॉर्म नियम अधिक प्रभावी उपाय हो सकते हैं।

फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन राज्यों की नीतियां किस रूप में सामने आती हैं और क्या भविष्य में इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई व्यापक कानून बनाया जाता है।