Last Updated on February 20, 2026 8:31 pm by INDIAN AWAAZ


इंदर वशिष्ठ

उत्तर प्रदेश के बांदा स्थित विशेष न्यायाधीश (POCSO) की अदालत ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों, रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती, को फांसी की सजा सुनाई है। इन दोनों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया गया, जिनमें अप्राकृतिक अपराध, गंभीर यौन हमला, बच्चों का अश्लील फिल्मों के लिए उपयोग, अश्लील सामग्री का भंडारण, उकसाना और आपराधिक साजिश शामिल है।

पीड़ितों के लिए मुआवज़ा और राहत

विद्वान ट्रायल कोर्ट ने सरकार को प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपियों के घर से जब्त की गई नकदी को भी सभी पीड़ितों के बीच समान रूप से वितरित किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि और सीबीआई जांच

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने 31 अक्टूबर 2020 को रामभवन और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इन पर बच्चों के यौन शोषण, उन्हें अश्लील सामग्री बनाने के लिए इस्तेमाल करने और इंटरनेट पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) फैलाने के आरोप थे।

जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए वे रूह कंपा देने वाले थे:

  • आरोपियों ने 33 मासूम लड़कों के साथ दरिंदगी की थी, जिनमें से कुछ की उम्र मात्र तीन वर्ष थी।
  • यौन हमले के कारण कई बच्चों के निजी अंगों में गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
  • गंभीर प्रताड़ना के कारण कुछ बच्चों में भेंगापन (Squint Eye) की समस्या विकसित हो गई।
  • पीड़ित बच्चे आज भी उस मानसिक सदमे (ट्रॉमा) से जूझ रहे हैं।

कार्यप्रणाली (Modus Operandi)

रामभवन उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत था। यह गिरोह 2010 से 2020 के बीच बांदा और चित्रकूट के क्षेत्रों में सक्रिय था। वह बच्चों को लुभाने के लिए उन्हें ऑनलाइन वीडियो गेम खिलाने, पैसे और उपहार देने का लालच देता था।

सीबीआई की कार्रवाई

सीबीआई ने इस मामले में बेहद सूक्ष्म और संवेदनशीलता के साथ जांच की। बच्चों की काउंसलिंग सुनिश्चित की गई और फॉरेंसिक विशेषज्ञों व बाल संरक्षण अधिकारियों के साथ समन्वय बिठाकर डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखा गया। जांच पूरी होने के बाद, सीबीआई ने 10 फरवरी 2021 को आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल किया और 26 मई 2023 को आरोप तय किए गए।

“दुर्लभतम से दुर्लभ” (Rarest of Rare) मामला

अदालत ने इसे “दुर्लभतम से दुर्लभ” मामला करार देते हुए कहा कि आरोपियों की क्रूरता और 33 बच्चों का व्यवस्थित शोषण समाज के नैतिक पतन की पराकाष्ठा है। अपराध की भयावहता और व्यापकता को देखते हुए अदालत ने माना कि अपराधियों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है और न्याय के लिए मृत्युदंड ही एकमात्र विकल्प है।

सीबीआई ने इस फैसले का स्वागत करते हुए बाल यौन शोषण के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।