Last Updated on February 5, 2026 6:11 pm by INDIAN AWAAZ

—ललित गर्ग एवं अंदलीब अख्तर

ऑनलाइन गेमिंग की जानलेवा लत और आभासी दुनिया (वर्चुअल वर्ल्ड) में डूबने का अंजाम कितना भयावह हो सकता है, इसकी तस्दीक एक ही दिन दो अलग-अलग जगहों पर हुई हृदयविदारक घटनाओं ने कर दी है। इन त्रासदियों ने न केवल समाज को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि हमारे दौर, सामाजिक संरचना और हमारी सामूहिक लापरवाही पर भी एक गहरा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। धीरे-धीरे फैल रही यह डिजिटल बीमारी किशोरों को किस तरह अपनी चपेट में ले रही है, इसकी मिसाल बुधवार को हुई दो घटनाओं से मिलती है।

गाजियाबाद में एक रूह कंपा देने वाली घटना में तीन नाबालिग बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। 12, 14 और 16 साल की इन मासूम बच्चियों की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। बताया गया कि वे एक ऑनलाइन ‘कोरियाई गेम’ के प्रति इस कदर जुनूनी थीं कि उन्होंने कोरिया में बसने और वहां नई जिंदगी शुरू करने का ख्वाब पाल लिया था। जब परिवार ने उनके मोबाइल फोन छीन लिए, तो वे गहरे तनाव और अवसाद (डिप्रेशन) में चली गईं और अंततः मौत को गले लगा लिया।

इसी तरह की एक घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में हुई, जहाँ 10वीं कक्षा के एक छात्र ने अपने ऑनलाइन विदेशी गेमिंग पार्टनर से बिछड़ने के गम में जान दे दी। ये महज हादसे नहीं हैं, बल्कि समाज के गहरे घाव हैं। झाबुआ से लेकर भोपाल तक, देश के हर हिस्से से आ रही ऐसी खबरें इस बात का सबूत हैं कि आभासी दुनिया अब हकीकत पर हावी हो रही है और हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ भावनाएं और संवाद स्क्रीन के पीछे दम तोड़ रहे हैं।


धीमा जहर: गेमिंग का नशा

तकनीक अपने आप में दुश्मन नहीं है, लेकिन जब यह लत बन जाए तो यह ‘धीमा जहर’ साबित होती है। यह जहर युवाओं की सोच, उनके स्वभाव और निर्णय लेने की क्षमता को विकृत कर देता है। गेमिंग की दुनिया क्षणिक रोमांच और काल्पनिक पहचान तो देती है, लेकिन बच्चे को वास्तविक जीवन, परिवार, शिक्षा और प्रकृति से पूरी तरह काट देती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक गेमिंग से बच्चों के मस्तिष्क में ‘आवेग नियंत्रण’ (Impulse Control) कमजोर हो जाता है, जिससे वे हार या फोन न मिलने की स्थिति में आत्महत्या जैसे चरम कदम को “गेम ओवर” की तरह देखने लगते हैं।

परिवार और संवाद की जिम्मेदारी

आज के दौर में एकल परिवार (Nuclear Family) और माता-पिता की व्यस्तता ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। अक्सर रोते हुए या जिद्दी बच्चे को चुप कराने के लिए स्मार्टफोन थमाना सबसे आसान समाधान मान लिया जाता है, जो बाद में सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। एक कड़वा सच यह भी है कि कई माता-पिता स्वयं ‘डिजिटल एडिक्शन’ के शिकार हैं। जब अभिभावक खुद हर समय फोन से चिपके रहेंगे, तो वे बच्चों को किस नैतिक आधार पर रोकेंगे? यह दोहरा मापदंड बच्चों में विद्रोह पैदा करता है।

सरकार, स्कूल और समाज की भूमिका

ऑनलाइन गेमिंग उद्योग तेजी से फैल रहा है, फिर भी इसके सामाजिक प्रभाव पर पर्याप्त नियमन और निगरानी का अभाव है। कई गेम हिंसा, आक्रामकता और जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य और रोमांचक बताते हैं। उम्र के अनुरूप सामग्री, समय सीमा और चेतावनी तंत्र का सख्ती से लागू होना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गया है।

शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और जीवन कौशल (Life Skills) को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना होगा। बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि तकनीक का उपयोग कैसे करें, न कि इसके गुलाम कैसे बनें। मनोवैज्ञानिक मदद से जुड़े सामाजिक कलंक (stigma) को भी खत्म करना होगा। यदि बच्चे में अवसाद, अत्यधिक अलगाव, आक्रामकता या आत्मघाती विचारों के लक्षण दिखाई दें, तो समय पर पेशेवर मदद लेना महत्वपूर्ण है। हिंसा और आक्रामकता को बढ़ावा देने वाले खेलों पर अंकुश लगाना अब विकल्प नहीं, अनिवार्य जरूरत है। स्कूलों में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि ‘डिजिटल साक्षरता’ और ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों, जैसे अकेलेपन या चिड़चिड़ेपन को गंभीरता से लेना होगा।


वक्त है संभलने का

समाजशास्त्रियों का मानना है कि आत्महत्या एक जटिल घटना है। हालांकि, समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव—विशेष रूप से जब इसे वास्तविक जीवन से अलगाव और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ जोड़ा जाता है—संवेदनशील युवा दिमागों में संकट को काफी बढ़ा सकता है। गाजियाबाद की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया बना रहे हैं? क्या हमने उन्हें संवाद दिया या सिर्फ उपकरण (devices)? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए या केवल सुविधाएं?

समाज, सरकार और हर परिवार को मिलकर कड़े और संवेदनशील कदम उठाने होंगे। तकनीक को नकारना समाधान नहीं है, लेकिन बिना नियंत्रण के इसे स्वीकार करना आत्मघाती है। संतुलन, संवाद और भागीदारी ही बच्चों की सुरक्षा की असली नींव है। यह जागने, विचार करने और ठोस कार्रवाई करने का समय है—क्योंकि यह केवल तकनीक का सवाल नहीं, बल्कि जीवन का सवाल है।

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक संकोच (Stigma) को खत्म करना होगा। यदि कोई बच्चा अवसाद के लक्षण दिखाता है, तो समय पर पेशेवर मदद लेना जान बचा सकता है। यह त्रासदी केवल संबंधित परिवारों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है।

तकनीक को अपनाना मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे बिना नियंत्रण के स्वीकार करना आत्मघाती है। संतुलन, संवाद और परिवार के साथ बिताया गया समय ही हमारे बच्चों की सुरक्षा की असली बुनियाद है। गाजियाबाद की उन तीन बहनों और कुल्लू के उस मासूम की मौत हमें याद दिलाती है कि यदि हम आज नहीं जागे, तो यह इलेक्ट्रॉनिक खतरा हमारे घरों और भविष्य को निगलना जारी रखेगा।


1. ‘डिजिटल फास्टिंग’ और ‘नो-टेक जोन’ बनाएँ

घर में कुछ समय और स्थान ऐसे तय करें जहाँ मोबाइल का उपयोग पूरी तरह वर्जित हो।

  • भोजन का समय: डाइनिंग टेबल पर फोन का उपयोग न करें। यह समय आपस में बातचीत के लिए सुरक्षित रखें।
  • बेडरूम नियम: सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल बंद कर दें। मोबाइल को बेडरूम के बाहर चार्ज करने की आदत डालें।
  • वीकेंड एक्टिविटी: सप्ताह में एक दिन कुछ घंटों के लिए पूरा परिवार ‘डिजिटल उपवास’ रखे और बोर्ड गेम्स या आउटडोर खेल खेले।

2. ‘गेटवे’ नहीं, ‘पार्टनर’ बनें

सिर्फ फोन छीन लेना समाधान नहीं है, बल्कि यह बच्चों में विद्रोह पैदा करता है।

  • उनकी दुनिया को समझें: वे कौन से गेम खेलते हैं या क्या देखते हैं, इसमें दिलचस्पी दिखाएँ। उनके साथ कभी-कभी गेम खेलें ताकि आप समझ सकें कि वे किस तरह की सामग्री (Content) के संपर्क में हैं।
  • विकल्प दें: यदि आप मोबाइल छीन रहे हैं, तो उन्हें कुछ बेहतर विकल्प भी दें, जैसे पेंटिंग, संगीत, कोई खेल या कहानी की किताबें।

3. ‘स्क्रीन टाइम’ के बजाय ‘क्वालिटी टाइम’

बच्चे अक्सर अकेलापन महसूस करने पर आभासी दुनिया की ओर भागते हैं।

  • सक्रिय श्रवण (Active Listening): जब बच्चा आपसे बात करे, तो अपना फोन एक तरफ रख दें और उनकी पूरी बात सुनें। उन्हें महसूस होना चाहिए कि वे आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं।
  • भावनात्मक जुड़ाव: उनसे उनके डर, उनके सपनों और उनके दोस्तों के बारे में बात करें।

4. तकनीक का स्मार्ट उपयोग (Parental Controls)

तकनीक का उपयोग सुरक्षा के लिए करें:

  • फिल्टर और लिमिट: यूट्यूब किड्स (YouTube Kids) या गूगल फैमिली लिंक (Google Family Link) जैसे ऐप्स का उपयोग करें ताकि आप देख सकें कि बच्चा क्या देख रहा है और उसकी समय सीमा तय कर सकें।
  • प्राइवेसी सेटिंग: बच्चों को ऑनलाइन अजनबियों से बात करने के खतरों के बारे में समझाएँ और उनकी प्रोफाइल को प्राइवेट रखें।

5. रोल मॉडल बनें (Be a Role Model)

बच्चे वह नहीं करते जो आप कहते हैं, वे वह करते हैं जो आप करते हैं।

  • यदि आप खुद हर समय सोशल मीडिया पर रहते हैं, तो बच्चा आपकी बात नहीं मानेगा। बच्चों के सामने खुद को एक संतुलित डिजिटल नागरिक के रूप में पेश करें।

6. चेतावनी संकेतों (Warning Signs) को पहचानें

अगर आपको बच्चे में नीचे दिए गए बदलाव दिखें, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ:

  • नींद की कमी या हर समय थकान रहना।
  • पढ़ाई में अचानक गिरावट आना।
  • मोबाइल न मिलने पर बहुत अधिक गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाना।
  • दोस्तों या परिवार से कटकर अकेले रहना।