Last Updated on August 1, 2026 10:45 pm by INDIAN AWAAZ

AMN / नई दिल्ली

संसद द्वारा राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किए जाने के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह कानून संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के विपरीत है।

मौलाना मदनी ने कहा कि जमीयत को किसी व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से वंदे मातरम् का पाठ या गायन करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन किसी नागरिक को इसे गाने के लिए बाध्य करना संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता की भावना के खिलाफ होगा।

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के कुछ अंश, विशेषकर वे चार अंतरे जिनमें मातृभूमि को ‘दुर्गा माता’ के रूप में संबोधित कर उसकी वंदना और उपासना का उल्लेख है, इस्लाम की एकेश्वरवाद (तौहीद) की मूल अवधारणा से मेल नहीं खाते। इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य की इबादत या उसके सामने सिर झुकाना स्वीकार्य नहीं है।

मौलाना मदनी ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि इन संवैधानिक अधिकारों के तहत किसी भी व्यक्ति को उसके धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध कोई गीत, नारा या विचार स्वीकार करने अथवा गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

उन्होंने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बिजो एमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) का उल्लेख करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी अभिव्यक्ति में भाग लेने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी माना था कि चुप रहने का अधिकार भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और सम्मानपूर्वक किसी कार्यक्रम में भाग न लेना, राष्ट्र या राष्ट्रीय सम्मान का अपमान नहीं माना जा सकता।

मौलाना मदनी ने कहा कि देशभक्ति और मातृभूमि की पूजा दो अलग-अलग विषय हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों तथा जमीयत उलमा-ए-हिंद के नेताओं के योगदान, देश के विभाजन का विरोध तथा आज़ादी के बाद राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा में उनकी भूमिका इतिहास का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि सच्ची देशभक्ति नारों या गीतों के अनिवार्य उच्चारण से नहीं, बल्कि देश के प्रति निष्ठा, जिम्मेदारी और कर्म से सिद्ध होती है।

मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि ऐसे समय में जब देश बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक सुस्ती, कृषि संकट और युवाओं के भविष्य जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब धार्मिक रूप से संवेदनशील और विवादास्पद विषयों को प्राथमिकता देना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने संसद से आग्रह किया कि वह जनता से जुड़े वास्तविक और तात्कालिक मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करे।