ललित गर्ग

मानव नेत्र केवल देखने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारी चेतना, भावनाओं, ज्ञान और जीवन की सुंदरता के द्वार हैं। इन्हीं के माध्यम से हम प्रकृति के अद्भुत दृश्य देखते हैं, परिवार का स्नेह अनुभव करते हैं, समाज की जीवंतता महसूस करते हैं और दुनिया की अनंत संभावनाओं को पहचानते हैं। दृष्टि का खो जाना केवल शारीरिक अक्षमता नहीं है, बल्कि जीवन के अनेक आयामों से वंचित होना है। इसी कारण नेत्रदान केवल चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक महान मानवीय और आध्यात्मिक कार्य है, जो अंधकार में डूबे जीवन में प्रकाश भर देता है।

हर वर्ष 10 जून को विश्व नेत्रदान दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मृत्यु के बाद भी हम किसी और का जीवन रोशन कर सकते हैं। यह केवल जागरूकता का अवसर नहीं, बल्कि करुणा, सामाजिक जिम्मेदारी और परोपकार को मजबूत करने वाला आंदोलन है।

नेत्रदान की आवश्यकता

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, करोड़ों लोग दृष्टिहीनता से पीड़ित हैं। भारत में भी बड़ी संख्या में लोग कॉर्नियल रोगों के कारण अपनी दृष्टि खो चुके हैं। दुखद यह है कि इनमें से अधिकांश मामलों का इलाज संभव है, लेकिन दान किए गए कॉर्निया की कमी के कारण अनेक मरीज वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहते हैं। कॉर्नियल प्रत्यारोपण आधुनिक चिकित्सा की सबसे सफल प्रक्रियाओं में से एक है, जिसकी सफलता दर 95–98 प्रतिशत तक है। समस्या चिकित्सा क्षमता में नहीं, बल्कि जन-जागरूकता और सामूहिक संकल्प में है।

दान का सर्वोच्च रूप

भारतीय संस्कृति में दान को धर्म का आधार माना गया है। भोजन का दान भूख मिटाता है, वस्त्र का दान सम्मान देता है, धन का दान सहारा देता है—लेकिन नेत्रदान दृष्टि का अमूल्य उपहार देता है। मृत्यु के बाद नेत्रदान करने वाला व्यक्ति केवल अंग नहीं देता, बल्कि किसी को दुनिया देखने का अवसर देता है। यह बच्चे को शिक्षा, युवा को करियर और बुजुर्ग को आत्मनिर्भरता प्रदान करता है। यह ऐसा दान है जिसमें दाता को कोई हानि नहीं होती, लेकिन प्राप्तकर्ता का जीवन पूरी तरह बदल जाता है।

ऋषि दधीचि की कथा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गहराई से जुड़ी है, जिन्होंने मानवता के कल्याण के लिए अपना शरीर अर्पित किया। नेत्रदान उसी भावना का आधुनिक रूप है—मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा जारी रखने का अवसर।

चिकित्सा विज्ञान की प्रगति

आज आधुनिक तकनीक के कारण एक दाता के कॉर्निया से कई लोगों को दृष्टि मिल सकती है। उम्र कोई बाधा नहीं है—80 या 90 वर्ष के लोग भी नेत्रदाता बन सकते हैं। चश्मा पहनने वाले, मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोग भी अक्सर नेत्रदान के योग्य होते हैं। मृत्यु के 4–6 घंटे के भीतर कॉर्निया सुरक्षित तरीके से निकाला जा सकता है, जिससे चेहरे का स्वरूप बिगड़ता नहीं और अंतिम संस्कार में कोई विलंब नहीं होता।

भ्रांतियों का निवारण

नेत्रदान में सबसे बड़ी बाधा मिथक और अंधविश्वास हैं। कुछ लोग मानते हैं कि नेत्रदान से शरीर विकृत हो जाएगा या अगले जन्म पर असर पड़ेगा। अन्य सोचते हैं कि वृद्ध या चश्मा पहनने वाले लोग दान नहीं कर सकते। ये सभी भ्रांतियाँ गलत हैं। विज्ञान ने इन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया है। समाज को अंधविश्वास से मुक्त होकर इस महान कार्य को अपनाना होगा।

दृष्टिहीनता केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। यह शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता को प्रभावित करती है, परिवारों पर आर्थिक बोझ डालती है और समाज की उत्पादकता घटाती है। समय पर प्रत्यारोपण मिलने पर लोग फिर से सक्रिय जीवन जी सकते हैं। इस प्रकार नेत्रदान करुणा का कार्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में निवेश भी है।

सेवा का सार्वभौमिक संदेश

हर धर्म मानव सेवा को सर्वोच्च पूजा मानता है। कोई भी धर्म नेत्रदान या अंगदान का विरोध नहीं करता। इसके विपरीत, करुणा और निःस्वार्थ सेवा को आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग माना गया है। मृत्यु के बाद नेत्रदान यह संदेश देता है कि जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी है।

नेत्रदान को केवल स्वास्थ्य पहल नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक आंदोलन के रूप में देखना चाहिए। परिवारों को इस पर चर्चा करनी चाहिए, युवाओं को प्रेरित करना चाहिए और हर नागरिक को मृत्यु के बाद नेत्रदान का संकल्प लेना चाहिए। यदि समाज का बड़ा हिस्सा इसे अपनाए, तो भारत में कॉर्नियल अंधत्व को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सामाजिक संगठनों की भूमिका

नेत्रदान को जन-आंदोलन बनाने में सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा और लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 A-1 ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। दशकों से ये संगठन जागरूकता अभियान चला रहे हैं, नेत्रदान संकल्प को प्रोत्साहित कर रहे हैं, नेत्र-चिकित्सा शिविर आयोजित कर रहे हैं और नेत्र बैंकों के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। लायंस इंटरनेशनल का वैश्विक SightFirst कार्यक्रम दृष्टि संरक्षण और अंधत्व निवारण के लिए दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक प्रयास माना जाता है। इसके माध्यम से लाखों लोग नेत्र-चिकित्सा सेवाओं, मोतियाबिंद शल्यक्रिया, दृष्टि परीक्षण और नेत्रदान जागरूकता से लाभान्वित हुए हैं।

जीवन का सबसे सुंदर प्रतीक

नेत्रदान शायद जीवन के मृत्यु के बाद भी जारी रहने का सबसे सुंदर प्रतीक है। यह केवल दृष्टि ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सम्मान, अवसर और आशा भी देता है। यह विज्ञान, करुणा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है।

विश्व नेत्रदान दिवस हमें याद दिलाता है कि किसी व्यक्ति का असली मूल्य उसकी संपत्ति में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए अच्छे कार्यों में है। यदि हमारी आँखें मृत्यु के बाद किसी और का संसार रोशन कर सकती हैं, तो इससे बड़ा दान, इससे महान सेवा और इससे श्रेष्ठ मानवता का कोई उदाहरण नहीं हो सकता।

आइए संकल्प लें कि हमारी अंतिम यात्रा के बाद भी हमारी आँखें किसी और के सपनों को देखने में मदद करेंगी। हमारा नेत्रदान किसी और के अंधकार में सूर्योदय बने। यही विश्व नेत्रदान दिवस का सच्चा अर्थ है, यही वास्तविक आध्यात्मिकता है और यही मानवता को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने का मार्ग है।