Last Updated on June 17, 2026 5:17 pm by INDIAN AWAAZ


– ललित गर्ग

भारत एक विकसित राष्ट्र बनने के सपने की ओर लगातार आगे बढ़ रहा है। “विकसित भारत 2047” का विज़न बार-बार दोहराया जा रहा है। विशाल बुनियादी ढाँचे की वृद्धि, डिजिटल परिवर्तन, अंतरिक्ष क्षेत्र की उपलब्धियाँ और आर्थिक प्रगति के दावों के बीच एक मूलभूत प्रश्न बार-बार उठता है: क्या कोई राष्ट्र वास्तव में विकसित कहलाया जा सकता है यदि उसके आम नागरिक बीमारी के कारण कर्ज़ में डूबने को मजबूर हों? यदि दवाओं और इलाज की बढ़ती लागत जीवन और मृत्यु के बीच की पतली रेखा तय करने लगे? यदि स्वास्थ्य सेवा आर्थिक क्षमता का विशेषाधिकार बन जाए, न कि एक बुनियादी अधिकार? ऐसे समय में जब महँगाई पहले से ही घर-घर पर बोझ बनी हुई है, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा कुछ जीवनरक्षक दवाओं और टीकों की कीमतों में भारी वृद्धि की अनुमति गंभीर चिंता का विषय बन गई है। बताया जा रहा है कि कुछ कैंसर की दवाओं, एंटी-टिटनस सीरम और बच्चों के आवश्यक टीकों की कीमतें लगभग पचास प्रतिशत तक बढ़ाई गई हैं। यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय करुणा और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर गहरे प्रश्न खड़े करता है।

भारत में स्वास्थ्य सेवा की वास्तविकता सबको ज्ञात है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में नागरिक अब भी अपनी जेब से इलाज का खर्च उठाते हैं। बीमारी अब केवल स्वास्थ्य संकट नहीं रह गई है, बल्कि अक्सर आर्थिक तबाही में बदल जाती है। पहले लोग शादी-ब्याह के खर्चों के कारण कर्ज़ में डूबते थे, आज गंभीर बीमारी पूरे परिवार को आर्थिक रूप से बर्बाद कर सकती है। कैंसर, हृदय रोग, गुर्दे की बीमारियाँ और अन्य जटिल रोगों का इलाज लाखों रुपये माँगता है। यदि जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा और भी दूर होती जाएगी। NPPA ने इन संशोधनों को उत्पादन लागत बढ़ने और बाज़ार में कमी की आशंका के आधार पर उचित ठहराया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं को सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है? क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में उचित लाभ और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन नहीं होना चाहिए?

स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी सभ्य समाज के दो सबसे बुनियादी स्तंभ हैं। दुर्भाग्य से भारत में दोनों क्षेत्रों में वर्षों से व्यावसायीकरण बढ़ता जा रहा है। अस्पतालों के बढ़ते शुल्क, महँगे परीक्षण, अनावश्यक जाँचें, उपकरणों की ऊँची लागत और अब दवाओं की बढ़ती कीमतें मिलकर आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवा को असुलभ बना रही हैं। चिकित्सा सेवा अब उद्योग का रूप लेती दिख रही है। अस्पताल अक्सर उपचार केंद्रों से अधिक कॉर्पोरेट उद्यम जैसे लगते हैं। मरीजों को देखभाल चाहने वाले व्यक्ति की बजाय ग्राहक समझा जाने लगा है। यह प्रवृत्ति आर्थिक असमानता को और चौड़ा करती है। आज भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मुख्यतः उन्हीं को उपलब्ध है जिनके पास मजबूत आर्थिक संसाधन हैं। गरीब नागरिक सीमित संसाधनों वाले भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं, जबकि सम्पन्न लोग अत्याधुनिक निजी सुविधाओं में इलाज करा सकते हैं। क्या यही वह सामाजिक न्याय है जिसकी कल्पना हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने की थी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कई कल्याणकारी योजनाएँ शुरू की गई हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने लाखों लोगों को राहत दी है, जन औषधि केंद्रों ने सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई है। फिर भी स्वास्थ्य प्रणाली में संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यदि दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं और निजी स्वास्थ्य सेवा अनियंत्रित रही तो इन योजनाओं का लाभ काफी हद तक कम हो जाएगा। असली चुनौती है स्वास्थ्य को सार्वजनिक कल्याण के केंद्र में रखना, न कि पूरी तरह बाज़ार की ताकतों पर छोड़ देना। सरकार की जिम्मेदारी केवल योजनाएँ घोषित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि हर नागरिक को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मिले। जीवनरक्षक दवाओं पर सख्त मूल्य नियंत्रण आवश्यक है। सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की पर्याप्त आपूर्ति होनी चाहिए। खरीद प्रणाली पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए। सरकार उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए लक्षित सब्सिडी और समर्थन भी दे सकती है ताकि बढ़ती लागत का बोझ पूरी तरह मरीजों पर न पड़े।

साथ ही, स्वास्थ्य बीमा कवरेज को व्यापक रूप से बढ़ाना होगा। लाखों गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय परिवार किसी सार्थक बीमा ढाँचे से बाहर हैं। एक बड़ी बीमारी उनकी जीवनभर की बचत मिटा सकती है। बीमा केवल अस्पताल खर्च तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आवश्यक दवाओं और दीर्घकालिक उपचार को भी शामिल करना चाहिए। सरकार को समय-समय पर दवा मूल्य निर्धारण और लागत संरचना की स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। यदि उत्पादन लागत वास्तव में बढ़ी है तो इसका प्रमाण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अधिक पारदर्शिता से जनता का विश्वास मजबूत होगा और अनुचित मूल्य वृद्धि रोकी जा सकेगी। स्वास्थ्य नीति का मुख्य उद्देश्य कॉर्पोरेट लाभ और नागरिकों के अधिकारों के बीच उचित संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। 2047 में विकसित भारत का सपना केवल गगनचुंबी इमारतों, एक्सप्रेसवे, डिजिटल नेटवर्क या GDP वृद्धि से नहीं मापा जाएगा। इसकी असली सफलता सबसे कमजोर नागरिकों के कल्याण से आँकी जाएगी।

आज आवश्यकता केवल दवा कीमतों पर बहस की नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के पुनर्मूल्यांकन की है। स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि मौलिक मानव अधिकार है। जिस राष्ट्र में नागरिकों को स्वस्थ जीवन जीने का अवसर नहीं मिलता, वहाँ आर्थिक प्रगति की चमक फीकी पड़ जाती है। अब समय है कि सरकारें, नीति-निर्माता, चिकित्सक, औषधि कंपनियाँ और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि स्वास्थ्य सेवा लाभ का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम बने। अन्यथा विकसित भारत का सपना आँकड़ों में तो चमकेगा, लेकिन लाखों लोग बीमारी, कर्ज़ और बेबसी के अंधकार में संघर्ष करते रहेंगे। स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ते भारत के सामने यह सबसे बड़ी नैतिक और मानवीय चुनौती है—जिसका समाधान आज ही ढूँढना होगा।