सच्चिदानंद वर्मा

21 जून 2026 को सम्पूर्ण विश्व 12वाँ अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है। यह तिथि कोई संयोग मात्र नहीं है; उत्तरी गोलार्ध में यह वर्ष का सबसे लंबा दिन (ग्रीष्म संक्रांति) होता है, जो प्रकृति में ऊर्जा और प्रकाश की पराकाष्ठा का प्रतीक है। ठीक इसी प्रकार, योग भी मानव जीवन को दीर्घायु, आरोग्यता और चेतना के प्रकाश से आलोकित करता है। इसके आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व को देखें तो इसी पावन दिन भगवान शिव ने ‘आदि योगी’ के रूप में अपने शिष्यों को योग का प्रथम उपदेश देना प्रारंभ किया था। वैश्विक पटल पर इस अमूल्य धरोहर को स्थापित करने का श्रेय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है, जिन्होंने सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इसके आयोजन का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को वैश्विक मंच पर ऐतिहासिक समर्थन मिला और रिकॉर्ड 177 सदस्य देशों की सहमति से दिसंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में घोषित किया। इसके पश्चात 21 जून 2015 को प्रथम योग दिवस नई दिल्ली में दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के साथ धूमधाम से मनाया गया। इस वर्ष का मुख्य विषय (थीम) ‘कल्याण, विवेक एवं विश्व-शान्ति के लिए योग’ निर्धारित किया गया है, जो आज के अशांत युग में बेहद प्रासंगिक है।

भारत के प्राचीन मनीषियों और ऋषियों द्वारा अन्वेषित यह योग विज्ञान किसी एक धर्म या संप्रदाय का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की साझी विरासत है। आधुनिक विश्व अब यह भली-भांति स्वीकार कर चुका है कि योग महज़ शारीरिक कसरतों या आसनों का समूह नहीं है। वास्तव में, यह शरीर, मन और आत्मा की अनंत क्षमताओं के क्रमिक विकास का एक संपूर्ण विज्ञान है, जिसका अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलन, यानी ईश्वर-प्राप्ति है। योग शब्द की उत्पत्ति भी ‘युज’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है जोड़ना। जब हम नियमित योग साधना करते हैं, तो हमारी सीमित और संकुचित मानवीय चेतना उस अनंत ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन हो जाती है। यह प्रक्रिया हमें ईश्वर के मूल स्वभाव से जोड़ती है, जो कि शाश्वत शांति और असीम आनंद का स्वरूप है।

अक्सर लोग बाह्य परिस्थितियों में खुशी तलाशते हैं, परंतु परमहंस योगानन्द जी के अनुसार, सच्ची शांति खरीदी नहीं जा सकती; इसे केवल योग-साधना की आंतरिक तकनीकों के माध्यम से ही अर्जित किया जा सकता है। हमारे मन और प्राणशक्ति की चंचलता ही आत्मा के प्रकाश को ढके रहती है। प्राणायाम और ध्यान के अनवरत अभ्यास से जब यह चंचलता शांत होती है, तब आत्मा स्वतः प्रकाशित हो उठती है। एक सच्चा योगी वही है जो बाहर से पूरी तरह सक्रिय रहते हुए भी भीतर से पूर्णतः शांत और स्थिर रहता है। योग हमें परिस्थितियों के चक्रव्यूह से मुक्त कर आनंद के केंद्र में स्थापित कर देता है, जिससे न केवल साधक का अपना कल्याण होता है, बल्कि वह संपूर्ण समाज के लिए भी सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत बन जाता है।

इस महान आध्यात्मिक यात्रा में ‘क्रियायोग’ की प्राचीन प्रविधि अत्यंत प्रभावशाली और वैज्ञानिक मानी गई है। जैसा कि परमहंस योगानन्द जी ने स्पष्ट किया है, क्रियायोग सीधे मनुष्य की प्राण-शक्ति पर कार्य करता है। यह शारीरिक क्षय और वृद्धावस्था की प्रक्रिया को धीमा करता है तथा साधक की आध्यात्मिक उन्नति की गति को तीव्र कर देता है। योगदा सत्संग आश्रम के संन्यासी स्वामी ईश्वरानन्द गिरि जी के शब्दों में, योग एक निरंतर चलने वाली जीवन शैली है, जो धर्म की सीमाओं से परे एक शुद्ध विज्ञान है। ध्यान का स्तर जैसे-जैसे गहरा होता जाता है, मनुष्य ईश्वर के उतना ही निकट पहुँच जाता है।

इस दिव्य विज्ञान को आधुनिक युग में जन-जन तक पहुँचाने की पृष्ठभूमि भी अलौकिक है। परमहंस योगानन्द जी ने अपनी कालजयी कृति ‘योगी कथामृत’ (ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी) में उल्लेख किया है कि हिमालय के अमर गुरु महावतार बाबाजी ने अपने परम शिष्य योगावतार लाहिड़ी महाशय से कहा था कि पाश्चात्य जगत के अनेक मुमुक्षुओं और संतों की ज्ञान-पिपासा उनकी ओर बाढ़ की तरह खिंची चली आ रही है। पाश्चात्य देशों को इस योग विज्ञान की महती आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से महावतार बाबाजी ने संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए लाहिड़ी महाशय के माध्यम से क्रियायोग की गुप्त विधा को पुनः प्रकट किया।

इस वैश्विक अभियान को आगे बढ़ाने के लिए महावतार बाबाजी ने परमहंस योगानन्द जी का चयन किया और उन्हें प्रशिक्षित करने का दायित्व ज्ञानावतार स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी को सौंपा। गुरु-शिष्य की इस महान परंपरा का निर्वहन करते हुए परमहंस योगानन्द जी ने वर्ष 1917 में भारत में ‘योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया’ (YSS) की स्थापना की, ताकि लाहिड़ी महाशय द्वारा सिखाए गए क्रियायोग के शुद्ध स्वरूप का प्रचार-प्रसार हो सके। वर्तमान में भारत भर में इसके 5 भव्य आश्रम, 200 से अधिक ध्यान केंद्र और अनेक रिट्रीट केंद्र कार्य कर रहे हैं, जो जिज्ञासुओं को ध्यान के दैनिक अभ्यास द्वारा आत्मसाक्षात्कार का मार्ग दिखा रहे हैं।

इसके साथ ही, योगानन्द जी ने वर्ष 1920 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स में ‘सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप’ (SRF) की नींव रखी। उनके इन्हीं भगीरथ प्रयासों के कारण आज संपूर्ण विश्व आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भारत की ओर श्रद्धा से देख रहा है। पाश्चात्य जगत में योग के इस अभूतपूर्व बीजारोपण के कारण ही परमहंस योगानन्द जी को ‘पश्चिम में योग के जनक’ के रूप में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है। अंततः, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस हमें इसी शाश्वत मार्ग पर चलने और ध्यान के माध्यम से जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य, यानी ईश्वरानुभूति को प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं)