
आफ़रीन हुसैन / कोलकाता
पश्चिम बंगाल में 1 जनवरी केवल कैलेंडर का पन्ना पलटने का दिन नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक संकल्प की पुनः पुष्टि, जनभावनाओं के नवसंचार और एक जनआंदोलन के पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए स्थापना दिवस कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनसमर्थन, राजनीतिक चेतना और बंगाल की पहचान की घोषणा है।
1998 में एक प्रतिरोधी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी तृणमूल कांग्रेस आज 2026 के विधानसभा चुनावों की दहलीज़ पर बंगाल की सबसे प्रभावशाली और निर्णायक राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ी है। इस संदर्भ में स्थापना दिवस अब केवल उत्सव नहीं, बल्कि आगामी चुनावी संघर्ष की स्पष्ट शुरुआत बन गया है।
इस राजनीतिक विमर्श के केंद्र में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मूल मंत्र — “माँ, माटी, मानुष” — मौजूद है। यह नारा अब सिर्फ शब्द नहीं रहा, बल्कि बंगाल की राजनीतिक आत्मा और तृणमूल की वैचारिक नींव बन चुका है। ममता बनर्जी का संदेश साफ है: बंगाल के विकास, लोकतांत्रिक अधिकारों और पहचान की रक्षा ही तृणमूल की पहली और अंतिम प्राथमिकता है, और बंगाल का भविष्य बंगाल में ही तय होगा।
बीते वर्षों में तृणमूल का स्थापना दिवस शक्ति प्रदर्शन से आगे बढ़कर जनता के साथ सीधा राजनीतिक संवाद बन चुका है। नागरिकता कानूनों के खिलाफ प्रतिरोध, संघीय ढांचे की रक्षा और जन सुनवाई के माध्यम से जनसमस्याओं को सामने लाना—इस परिवर्तन के प्रमुख उदाहरण हैं।
इस संगठनात्मक रूपांतरण में राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की भूमिका निर्णायक रही है। बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को शक्ति का वास्तविक केंद्र मानते हुए उन्होंने संगठन को रणनीति में बदला है। डायमंड हार्बर मॉडल आज 2026 की चुनावी तैयारी का मूल आधार बन चुका है।
जैसे-जैसे 2026 नज़दीक आ रहा है, तृणमूल का स्थापना दिवस अब एक राजनीतिक वार रूम का रूप ले चुका है—जहाँ मुकाबला सत्ता का नहीं, बल्कि जनता बनाम दबाव, संघवाद बनाम केंद्रीकरण और पहचान बनाम एकरूपता का है।
तृणमूल कांग्रेस का संदेश स्पष्ट है:
यह सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि बंगाल की आवाज़ और एक जनआंदोलन है।
