
AMN / बेंगलुरु
विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले देश के प्रमुख कैंसर विशेषज्ञों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत में तंबाकू से जुड़े कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब किशोरों और युवाओं में भी आक्रामक कैंसर के मामले सामने आने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू अब केवल फेफड़ों के कैंसर तक सीमित खतरा नहीं रह गया है, बल्कि यह शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर रहा है।
बेंगलुरु के सम्मप्रदा अस्पताल के विशेषज्ञों ने बताया कि तंबाकू का सेवन अब लगभग 25 से 30 प्रकार के कैंसर से जुड़ा हुआ है। इनमें गले, भोजन नली (इसोफेगस), पेट, अग्न्याशय (पैंक्रियास), किडनी, मूत्राशय, लीवर तथा सिर और गर्दन के कैंसर प्रमुख हैं। डॉक्टरों के अनुसार भारत में धूम्रपान के साथ-साथ गुटखा, खैनी और अन्य बिना धुएं वाले तंबाकू उत्पादों का व्यापक उपयोग इस खतरे को और गंभीर बना रहा है।
विशेषज्ञों ने बताया कि फेफड़ों के कैंसर के बाद अब सिर और गर्दन के कैंसर भारत में सबसे अधिक पाए जाने वाले तंबाकू-जनित कैंसर बन चुके हैं। इन कैंसरों के मामले तेजी से युवाओं में बढ़ रहे हैं क्योंकि कम उम्र में तंबाकू सेवन की शुरुआत हो रही है।
सम्मप्रदा अस्पताल के संस्थापक और मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. राधेश्याम नाइक ने कहा कि डॉक्टर अब ऐसे मरीजों को भी देख रहे हैं जिनकी उम्र बेहद कम है। उन्होंने हाल ही में एक 16 वर्षीय किशोर का उपचार किया, जिसे तंबाकू सेवन से जुड़ा सिर और गर्दन का कैंसर था।
उन्होंने कहा, “यह केवल एक चिकित्सा मामला नहीं, बल्कि समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। परिवारों, स्कूलों और नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि किशोरों में तंबाकू की लत भविष्य में कैंसर महामारी का रूप ले सकती है।”
डॉ. नाइक ने कहा कि तंबाकू से जुड़े कैंसर अक्सर अधिक आक्रामक होते हैं और उनका पता देर से चलता है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है। “हम इसोफेगस, पैंक्रियास, ब्लैडर, लीवर और पेट के कैंसर के ऐसे मामलों में बढ़ोतरी देख रहे हैं, जिनका सीधा संबंध तंबाकू सेवन से है,” उन्होंने कहा।
विशेषज्ञों के अनुसार तंबाकू सेवन केवल कैंसर ही नहीं, बल्कि शरीर की उपचार क्षमता को भी प्रभावित करता है। सम्मप्रदा अस्पताल के कैंसर रोकथाम विशेषज्ञ डॉ. विनोद रमानी ने कहा कि तंबाकू उपयोग करने वाले मरीजों में इलाज के दौरान जटिलताएं अधिक होती हैं।
उन्होंने कहा, “धूम्रपान से सर्जरी के बाद घाव भरने में देरी होती है, संक्रमण का खतरा बढ़ता है और कैंसर उपचार की प्रभावशीलता कम हो जाती है। ऐसे मरीजों में कैंसर दोबारा लौटने या दूसरा कैंसर होने का खतरा भी अधिक रहता है।”
विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि तंबाकू शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है। राजीव गांधी स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी के पूर्व निदेशक डॉ. पी.एस. प्रभाकरण ने कहा कि तंबाकू हृदय और रक्त वाहिकाओं को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा, “तंबाकू सेवन से हार्ट अटैक, स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। जब ऐसे कमजोर शरीर पर कैंसर का इलाज किया जाता है, तो मरीज के लिए जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।”
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी कि “थोड़ी मात्रा में तंबाकू सुरक्षित है” जैसी गलत धारणाएं युवाओं को भ्रमित कर रही हैं। तंबाकू नियंत्रण विशेषज्ञ डॉ. के. प्रभाकरा राव ने कहा कि तंबाकू सेवन का कोई सुरक्षित स्तर नहीं होता।
उन्होंने कहा, “जो लोग कम उम्र में धूम्रपान या तंबाकू चबाना शुरू करते हैं, उनमें जीवनभर कैंसर का खतरा कहीं अधिक रहता है। यह जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि तंबाकू सेवन कितनी जल्दी शुरू हुआ, कितने समय तक चला और उसकी मात्रा कितनी थी।”
डॉक्टरों ने बताया कि भारत में कई ऐसे तंबाकू-जनित कैंसर तेजी से बढ़ रहे हैं जिन पर पर्याप्त सार्वजनिक चर्चा नहीं होती। इनमें भोजन नली का कैंसर, पेट का कैंसर, अग्न्याशय कैंसर, किडनी कैंसर, ब्लैडर कैंसर, लीवर कैंसर और Acute Myeloid Leukemia जैसे गंभीर रोग शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों से अपील की कि जागरूकता अभियान केवल फेफड़ों के कैंसर तक सीमित न रखे जाएं। उन्होंने युवाओं को केंद्र में रखकर सख्त तंबाकू नियंत्रण नीतियां लागू करने, स्कूल स्तर पर जागरूकता बढ़ाने और कैंसर की शुरुआती जांच को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. राधेश्याम नाइक ने कहा, “अब भी बहुत से लोग मानते हैं कि यदि फेफड़ों की बीमारी नहीं हुई तो तंबाकू उतना खतरनाक नहीं है। यह बेहद गलत सोच है। तंबाकू शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित करता है और दर्जनों कैंसर से जुड़ा हुआ है। रोकथाम ही सबसे बड़ा बचाव है।”
