Last Updated on March 20, 2026 2:01 am by INDIAN AWAAZ


ललित गर्ग —

कभी सुबह की शुरुआत आंगन में चहकती गौरैया की मधुर आवाज़ से होती थी। यह नन्ही चिड़िया केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं थी, बल्कि हमारे जीवन, हमारी संस्कृति और हमारी भावनाओं से गहराई से जुड़ी हुई थी। बचपन की साथी, घरों की रौनक और प्रकृति की जीवंतता का प्रतीक—गौरैया हमारे साथ ही फलती-फूलती थी।

लेकिन आज यह चिड़िया चुपचाप हमारे आसपास से गायब होती जा रही है। यह केवल एक पक्षी के लुप्त होने की कहानी नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच बिगड़ते संतुलन की गंभीर चेतावनी है। हर साल 20 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व गौरैया दिवस हमें इसी खतरे के प्रति सचेत करता है। वर्ष 2026 की थीम “मनुष्य और प्रकृति के सह-अस्तित्व” हमें याद दिलाती है कि यदि यह संतुलन बिगड़ा, तो केवल गौरैया ही नहीं, बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संकट में पड़ सकता है।

गौरैया हमेशा इंसानों के करीब रही है। वह हमारे घरों की छतों, रोशनदानों, खिड़कियों और पेड़ों पर घोंसले बनाती थी और हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाती थी। लेकिन आधुनिकता की तेज रफ्तार ने उसके लिए जगह धीरे-धीरे खत्म कर दी। आज कंक्रीट के जंगलों में न तो घोंसला बनाने की जगह बची है और न ही प्राकृतिक भोजन के स्रोत। पहले के घरों में खुले आंगन, मिट्टी के फर्श और छतों पर सूखते अनाज होते थे, जो गौरैया के लिए भोजन और आश्रय का काम करते थे। अब बंद और चमकदार इमारतों में उसके लिए कोई स्थान नहीं बचा है।

इसके साथ ही कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता उपयोग भी उसकी संख्या घटने का बड़ा कारण है। गौरैया के बच्चे शुरुआती दिनों में कीड़ों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन आधुनिक खेती ने इन कीड़ों को लगभग खत्म कर दिया है। परिणामस्वरूप, उनके बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। मोबाइल टावरों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण को भी एक संभावित खतरे के रूप में देखा जा रहा है, जो उनकी दिशा-ज्ञान और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन—अनियमित मौसम, असमय बारिश और बढ़ता तापमान—उनके जीवन चक्र को असंतुलित कर रहा है।

गौरैया का संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता का भी दर्पण है। जैसे-जैसे हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारे भीतर अन्य जीवों के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी कम होती जा रही है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि जब इंसान प्रकृति से अलग होता है, तो अंततः उसका अपना अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है।

गौरैया को बचाना केवल एक पक्षी को बचाना नहीं, बल्कि अपने पर्यावरण, अपनी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित करना है। इसके लिए बड़े प्रयासों की नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कदमों की जरूरत है। अपने घरों में या आसपास ऐसी जगह बनाना जहां गौरैया घोंसला बना सके, बालकनी या पेड़ों पर कृत्रिम घोंसले लगाना, नियमित रूप से दाना और पानी रखना—ये सभी सरल उपाय हैं, जो बड़ा बदलाव ला सकते हैं। बाग-बगीचों में स्थानीय पौधे लगाने से कीड़ों की संख्या बढ़ेगी, जिससे गौरैया के लिए प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होगा।

जैविक खेती को बढ़ावा देना और रासायनिक पदार्थों का उपयोग कम करना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना जरूरी है, ताकि वे समझ सकें कि पक्षी केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे सह-अस्तित्व का हिस्सा हैं। सरकार और समाज को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी—पक्षी संरक्षण की नीतियां, जागरूकता अभियान और शोध को बढ़ावा देना समय की मांग है।

गौरैया हमें सादगी, संतुलन और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाती है। जब इतनी साधारण और शांत जीव भी संकट में है, तो यह इस बात का संकेत है कि हम कहीं न कहीं प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे हैं। यह धरती केवल मनुष्यों की नहीं, बल्कि सभी जीवों की साझी धरोहर है। यदि हम इसका दोहन करते रहेंगे, तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।

विश्व गौरैया दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यदि हर घर एक छोटा आश्रय बन जाए, हर आंगन में पानी और दाना रखा जाए और हर दिल में संवेदना जागे, तो गौरैया फिर लौट सकती है। उसकी चहचहाहट एक बार फिर हमारे जीवन में खुशी और संतुलन का संदेश लेकर आएगी। अंततः, गौरैया को बचाना दरअसल खुद को बचाना है—और यह छोटा सा प्रयास हमें प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन की ओर ले जा सकता है।