Last Updated on January 1, 2026 11:52 pm by INDIAN AWAAZ


Staff Reporter
भारत में वर्ष 2025 के दौरान सांप्रदायिक दंगों के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, लेकिन इसके बावजूद मॉब लिंचिंग, नफरत आधारित अपराध और पहचान से जुड़ी हिंसा की घटनाएं अब भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। यह खुलासा सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म (CSSS) की ताज़ा मॉनिटरिंग रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में देशभर में सांप्रदायिक दंगों के कुल 28 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2024 में यह संख्या 59 थी। इस तरह एक वर्ष में दंगों की घटनाओं में लगभग 52 प्रतिशत की कमी आई। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दंगों में कमी के बावजूद सामाजिक स्तर पर सांप्रदायिक तनाव और सौहार्द में ठोस सुधार के संकेत नहीं मिलते।
CSSS के मुताबिक, 2025 में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में मामूली बढ़ोतरी हुई। साल के दौरान ऐसे 14 मामले सामने आए, जिनमें कम से कम आठ लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट का कहना है कि भले ही बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा में कमी आई हो, लेकिन धर्म और पहचान के आधार पर नफरत ने नए और कम दिखाई देने वाले रूप अपना लिए हैं।
रिपोर्ट में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के खिलाफ संस्थागत भेदभाव पर गंभीर चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि नफरत फैलाने वाले भाषणों में बढ़ोतरी हुई है और सार्वजनिक स्थानों से मुस्लिम और ईसाई संस्कृतियों को जानबूझकर हाशिए पर धकेला जा रहा है। साथ ही, हिंदू दक्षिणपंथी निगरानी समूहों (विजिलांटे ग्रुप्स) के खिलाफ कार्रवाई की कमी और उन्हें मिल रही कथित छूट को भी एक बड़ी समस्या बताया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक स्थानों पर हिंदू त्योहारों, धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं की बढ़ती और आक्रामक उपस्थिति देखी जा रही है, जिससे बहुसंख्यक सांस्कृतिक वर्चस्व को बल मिलता है और सामाजिक ध्रुवीकरण गहराता है।
CSSS ने निष्कर्ष में कहा है कि भले ही आंकड़े सांप्रदायिक दंगों में कमी दर्शाते हों, लेकिन नफरत, भेदभाव और जवाबदेही की कमी जैसी जड़ समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इन मुद्दों का समाधान किए बिना केवल दंगों में कमी को स्थायी सामाजिक सौहार्द की गारंटी नहीं माना जा सकता।
