
अंदलीब अख्तर
संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त को हंगामे, राजनीतिक टकराव और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के बीच समाप्त हो गया। जिस सत्र से देश के महत्वपूर्ण और ज्वलंत मुद्दों पर गंभीर चर्चा की उम्मीद थी, वह लगातार विरोध-प्रदर्शन, नारेबाजी, स्थगन और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच घिरा रहा।
यह मॉनसून सत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती के रूप में सामने आया। विपक्ष ने 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर पूरे सत्र में सरकार पर दबाव बनाए रखा और गृह मंत्री से संसद के भीतर जवाब देने की मांग की।
राजनीतिक टकराव के कारण संसद की कार्यवाही प्रभावित
मॉनसून सत्र के पहले ही दिन संसद और जंतर-मंतर के आसपास का राजनीतिक माहौल गरमा गया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़े छात्रों ने संसद की ओर मार्च का आयोजन किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया गया और लाठीचार्ज, आंसू गैस तथा पैलेट गन के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आईं।
विपक्ष की मांग थी कि गृह मंत्री अमित शाह संसद में आकर स्पष्ट करें कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश किसने दिया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी।
हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि 20 जुलाई की घटना का आकलन आधिकारिक रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए तथा पूरे मामले को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।
पूरे सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बना रहा। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार गृह मंत्री से छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई पर सदन में बयान देने की मांग करते रहे।
घायल छात्र को लेकर राहुल गांधी का सरकार पर हमला
विपक्ष ने दावा किया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों को गंभीर चोटें आईं। राहुल गांधी ने 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचब को मीडिया के सामने पेश किया और आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था।
राहुल गांधी के मुताबिक, साहिल की दाईं आंख में छर्रा लगने से उसकी आंख को नुकसान पहुंचा। बाद में राहुल गांधी ने अपने आवास पर साहिल के साथ हुई बातचीत का वीडियो भी जारी किया।
विपक्षी दलों ने दावा किया कि पैलेट गन के कथित इस्तेमाल से कई लोग घायल हुए। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने आरटीआई से प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए दावा किया कि पैलेट गन से 10 बच्चे घायल हुए थे।
दूसरी ओर, सरकार ने विपक्ष से इन आरोपों के समर्थन में तथ्य और आधिकारिक प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा। सरकार का कहना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच के तथ्यों को देखा जाना चाहिए।
राम मंदिर चढ़ावा मामले पर भी विपक्ष का दबाव
छात्र आंदोलन के अलावा विपक्ष ने राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी या अनियमितताओं के मामले को भी संसद में उठाने की मांग की।
विपक्ष का तर्क था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विपक्ष ने कहा कि मंदिर के शिलान्यास से लेकर उद्घाटन और राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन तक प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख रही है। ऐसे में मंदिर से जुड़े चढ़ावे के कथित मामले में भी प्रधानमंत्री की जवाबदेही बनती है।
विपक्षी दलों ने मांग की कि सरकार संसद में इस मामले पर स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि कथित अनियमितता या कमी कहां हुई।
इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और इंडिया ब्लॉक के अन्य दलों ने दोनों सदनों में लगातार विरोध प्रदर्शन किया और कई मौकों पर कार्यवाही बाधित हुई।
सीमित मुद्दों पर ही हुई विस्तृत चर्चा
मॉनसून सत्र के दौरान नीट पेपर लीक जैसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत विस्तृत चर्चा हुई। यह चर्चा दो दिनों तक चली, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों ने अपने-अपने विचार रखे।
इसके अलावा कई विधेयक हंगामे के बीच पारित किए गए। सरकार ने जहां विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया, वहीं विपक्ष ने सरकार पर पर्याप्त चर्चा के बिना विधेयक पारित कराने का आरोप लगाया।
इस गतिरोध ने संसद की उस मूल भूमिका पर भी सवाल खड़े किए, जिसके तहत देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक बहस और विचार-विमर्श के बाद समाधान तलाशा जाना चाहिए।
अमित शाह ने सत्र खत्म होने से पहले दिया चर्चा का प्रस्ताव
मॉनसून सत्र के समापन से एक दिन पहले बुधवार को राजनीतिक गतिरोध में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। गृह मंत्री अमित शाह ने छात्र आंदोलन के मुद्दे पर चर्चा की पेशकश की।
अमित शाह ने कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने विपक्ष को प्रस्ताव दिया कि बुधवार दोपहर 3 बजे से इस विषय पर चर्चा शुरू की जाए और वह गुरुवार दोपहर 3 बजे सदन में मौजूद रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब देंगे।
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया जब विपक्ष कई दिनों से गृह मंत्री से संसद में बयान देने की मांग कर रहा था।
हालांकि, विपक्ष की मांग केवल चर्चा तक सीमित नहीं थी। विपक्षी नेताओं ने पुलिस कार्रवाई को लेकर जवाबदेही तय करने और प्रदर्शनकारियों के साथ कथित व्यवहार पर गृह मंत्री से स्पष्ट जवाब मांगा।
इस दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि गृह मंत्री द्वारा सदन में पेश किए जाने वाले कुछ विधेयकों को मंत्रियों ने आगे बढ़ाया और पारित कराया।
मोदी सरकार के लिए राजनीतिक परीक्षा
मॉनसून सत्र अब केवल एक सामान्य संसदीय सत्र नहीं रह गया है। विपक्ष के लिए छात्र आंदोलन सरकार को जवाबदेही, प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के मुद्दों पर घेरने का अवसर बन गया।
वहीं, सरकार के लिए यह सत्र लगातार विरोध के बीच संसदीय कामकाज संचालित करने की चुनौती लेकर आया।
छात्र आंदोलन का प्रभाव संसद से बाहर भी दिखाई देने लगा है। आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि छात्रों और आम लोगों में सरकार के खिलाफ सवाल उठाने का साहस बढ़ा है और मोदी-शाह नेतृत्व को लेकर लोगों में पहले जैसा भय नहीं रहा।
हालांकि, यह राजनीतिक आकलन है और इसे व्यापक जनमत का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी, छात्र आंदोलन को लेकर हुआ टकराव इसे संसद के बाहर भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बना चुका है।
सीजेपी ने ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान का ऐलान किया
मॉनसून सत्र की समाप्ति से एक दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी की कोर कमेटी ने दिल्ली के एक पार्क में बैठक कर अपनी आगामी रणनीति की घोषणा की।
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बैठक के बाद कहा कि भारत की 80वीं स्वतंत्रता वर्षगांठ के अवसर पर 15 अगस्त से देशव्यापी ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान शुरू किया जाएगा।
पार्टी के मुताबिक, इस अभियान के तहत उसके कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर सरकारी स्कूलों की स्थिति को उजागर करेंगे। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के खिलाफ जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा तथा सुधार की मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरने और प्रदर्शन किए जाएंगे।
अभिजीत दीपके ने कहा कि जब तक गांवों के स्कूलों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तब तक सीजेपी कार्यकर्ता उनकी स्थिति की निगरानी करते रहेंगे।
इस घोषणा से संकेत मिलता है कि आंदोलन अब संसद से जुड़े मुद्दों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर के सवालों, विशेषकर शिक्षा और सरकारी बुनियादी ढांचे, को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाने की तैयारी कर रहा है।
संसद के बाद सड़क पर उतरने की तैयारी
इंडिया ब्लॉक के घटक दल भी पहले ही संकेत दे चुके हैं कि संसद के भीतर की लड़ाई को अब जनता के बीच ले जाया जाएगा। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इन मुद्दों को लेकर रैलियों, विरोध प्रदर्शनों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए सरकार को घेरने की तैयारी में हैं।
ऐसे में छात्र आंदोलन, संसदीय जवाबदेही और राम मंदिर चढ़ावे से जुड़ा विवाद आने वाले समय में व्यापक राजनीतिक मुद्दों का रूप ले सकता है।
इन मुद्दों का असर 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। पंजाब को छोड़कर कई चुनावी राज्यों में इस समय बीजेपी या बीजेपी के नेतृत्व वाली ‘डबल इंजन’ सरकारें सत्ता में हैं।
ऐसे राजनीतिक माहौल में बीजेपी के सामने आगामी विधानसभा चुनावों में कड़ी चुनौती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
2027 में उत्तर प्रदेश पर नजर
बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी परीक्षाओं में उत्तर प्रदेश प्रमुख होगा। 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में राम मंदिर, शासन, बेरोजगारी, शिक्षा और अन्य स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के कथित मामले को लेकर जारी राजनीतिक विवाद भी उत्तर प्रदेश में विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का एक मुद्दा बन सकता है।
मॉनसून सत्र के समाप्त होने के साथ अब राजनीतिक लड़ाई संसद से निकलकर सड़कों और जनता के बीच पहुंचने की संभावना है।
सत्ता पक्ष विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाएगा, जबकि विपक्ष सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगाता रहेगा।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि छात्र आंदोलन और मॉनसून सत्र के दौरान उठाए गए अन्य मुद्दे व्यापक जनआंदोलन का रूप लेते हैं या फिर राजनीतिक दलों के अभियानों तक सीमित रहते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए मॉनसून सत्र निश्चित रूप से एक चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर रहा है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह केवल एक अस्थायी संसदीय गतिरोध है या देश की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की शुरुआत। इसका वास्तविक असर आने वाले चुनावों और जनता के बीच इन मुद्दों की स्वीकार्यता से ही स्पष्ट होगा।
