Last Updated on July 5, 2026 12:27 am by INDIAN AWAAZ

एस. एन. वर्मा

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्तियों में से एक है, लेकिन इस शानदार प्रगति के बीच देश के शहरी केंद्रों में एक कड़वा विरोधाभास लगातार दिखाई देता है—भीख मांगने की बढ़ती समस्या। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में इस समय लगभग 5 लाख भिखारी हैं। यह स्थिति तब है जब देश के अधिकांश राज्यों में भीख मांगना एक दंडनीय अपराध है।

हालांकि, शहरी गरीबी की इस सतह के नीचे एक बेहद जटिल और बहुस्तरीय सिंडिकेट (नेटवर्क) काम कर रहा है। यह संकट एक तरफ गंभीर सामाजिक-आर्थिक लाचारी और दूसरी तरफ संगठित आपराधिक गिरोहों के शोषण के बीच झूल रहा है। यही वजह है कि आधुनिक भारत के लिए पूरे देश को पूरी तरह से ‘भिक्षामुक्त’ बनाना सबसे कठिन नीतिगत लक्ष्यों में से एक साबित हो रहा है।

शहरी संकट का भूगोल: क्षेत्रीय और जनसांख्यिकीय हकीकत

भारत में भीख मांगने की समस्या का जनसांख्यिकीय प्रसार क्षेत्रीय असमानताओं को दर्शाता है। राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भिक्षावृत्ति से जुड़े लोगों की संख्या सबसे अधिक है। हालांकि, इन दोनों राज्यों के आंतरिक हालात काफी अलग हैं—उत्तर प्रदेश में बच्चों से भीख मंगवाने का चलन चिंताजनक रूप से अधिक है, जबकि पश्चिम बंगाल में शारीरिक रूप से अक्षम (दिव्यांग) भिखारियों की संख्या आनुपातिक रूप से बहुत ज्यादा है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, असम और ओडिशा में भी इनकी संख्या काफी अधिक है।

[ग्रामीण पलायन / बेरोजगारी] ──> [सामाजिक-आर्थिक मजबूरी] ──> वास्तविक लाचारी
[मानव तस्करी नेटवर्क]      ──> [जबरन दिव्यांग बनाना]   ──> संगठित सिंडिकेट
* रेखाचित्र: भारत में भिक्षावृत्ति के दो मुख्य पहलू

केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर भीख मांगने वाली कुल आबादी में 53.13% पुरुष और 46.87% महिलाएं हैं। हालांकि, धार्मिक और लैंगिक आधार पर आंकड़ों को देखें तो एक अनोखा ट्रेंड सामने आता है। कुल भिखारी आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 25% है, लेकिन इस समुदाय के भीतर लैंगिक अनुपात बिल्कुल उलट जाता है—यहां महिलाएं 56.38% और पुरुष 43.61% हैं। इसके विपरीत, कुल भिखारी आबादी में हिंदू 72.2% हैं (जबकि देश की कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी 79.8% है)। अन्य धार्मिक समूहों में ईसाई (0.88%), सिख (0.45%), बौद्ध (0.25%), और जैन (0.06%) की हिस्सेداری बेहद मामूली है।

संगठित सिंडिकेट: मानवीय लाचारी को बनाया करोड़ों का बिजनेस

समाजशास्त्री भारत में भीख मांगने वाली आबादी को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं:

  1. मजबूर भिखारी: वे लोग जो अत्यधिक गरीबी, विस्थापन, अचानक आई शारीरिक अक्षमता या पुरानी मानसिक बीमारी के कारण सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
  2. पेशेवर भिखारी: वे लोग जो एक सोचे-समझे, संगठित और मोटी कमाई वाले नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।

बड़े महानगरों में भीख मांगना अब केवल गरीबी का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह मानव तस्करी सिंडिकेट द्वारा नियंत्रित एक मल्टी-करोड़ (करोड़ों रुपये का) अवैध कारोबार बन चुका है। ये गिरोह शहरों के सबसे कमाऊ इलाकों—जैसे ट्रैफिक सिग्नलों, रेलवे स्टेशनों, मेट्रो स्टेशनों और बड़े धार्मिक स्थलों—को आपस में बांट लेते हैं। इन प्राइम लोकेशंस पर भीख मांगने का “अधिकार” पाने के लिए, व्यक्तिगत भिखारियों को अपनी दैनिक कमाई का एक बड़ा हिस्सा अपने स्थानीय हैंडलर या गैंग लीडर को सौंपना पड़ता है।

पब्लिक की सहानुभूति बटोरने के लिए ये सिंडिकेट बेहद क्रूर तरीके अपनाते हैं। गिरोह अक्सर गरीब परिवारों से नवजात बच्चों को दैनिक किराए पर लेते हैं। इन बच्चों को नशीली दवाएं दी जाती हैं ताकि वे दिनभर सड़कों पर महिलाओं की गोद में बीमार या बेहोश दिखाई दें।

इससे भी ज्यादा भयानक पहलू बाल तस्करी का है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अनुसार, भारत में हर साल 40,000 तक बच्चों का अपहरण कर लिया जाता है। इन लापता बच्चों का एक बड़ा हिस्सा सीधे भीख मांगने वाले माफिया के हवाले कर दिया जाता है, जहां लोगों से ज्यादा से ज्यादा पैसे ऐंठने के लिए उनके हाथ-पैर काट दिए जाते हैं या उन्हें अंधा और अपाहिज बना दिया जाता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियां (पुलिस) अक्सर इन गिरोहों को पकड़ने में नाकाम रहती हैं, क्योंकि वे मौके पर त्वरित सत्यापन (वेरिफिकेशन) के अभाव में इन बच्चों को उन वयस्कों का असली परिवार मान लेती हैं।

अपराधी मानने के बजाय पुनर्वास: बदलता हुआ सरकारी मॉडल

दशकों से भारत का कानूनी दृष्टिकोण भिक्षावृत्ति के प्रति केवल दंडात्मक रहा है। किसी केंद्रीय कानून के अभाव में, राज्य ‘बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959’ जैसे क्षेत्रीय कानूनों पर निर्भर रहे हैं। ये कानून गरीबी और लाचारी को एक सामाजिक समस्या मानने के बजाय एक अपराध या कानून-व्यवस्था के उल्लंघन के रूप में देखते हैं।

इस दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव साल 2021 में आया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सार्वजनिक स्थानों से भिखारियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि भीख मांगना बुनियादी रूप से राज्य और समाज की विफलता से पैदा हुआ एक सामाजिक-आर्थिक लक्षण है। संस्थागत विकल्प दिए बिना किसी व्यक्ति के जीवित रहने के प्रयास को अपराध घोषित करना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है।

पुरानी दंडात्मक व्यवस्था (जैसे: बॉम्बे एक्ट)  ──> जेल और अपराधीकरण
     ▼
नया कल्याणकारी मॉडल (SMILE योजना)         ──> पहचान ──> पुनर्वास ──> कौशल विकास

इस आधुनिक सोच के तहत, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने SMILE (Support for Marginalised Individuals for Livelihood and Enterprise) योजना की शुरुआत की है। इसके उप-नियम ‘भिक्षावृत्ति में लिप्त व्यक्तियों का व्यापक पुनर्वास’ के तहत सरकार ने जेल भेजने के बजाय उनके संपूर्ण पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित किया है।

यह नया ढांचा पूरी तरह डेटा और तकनीक पर आधारित है:

  • स्माइल-बागरी (SMILE-Bagri) ऐप: चंडीगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय चिंतन शिविर में लॉन्च किया गया यह मोबाइल ऐप फील्ड वर्कर्स को सड़क पर रहने वाले कमजोर लोगों की पहचान करने, उनका डेटा लॉग करने और वास्तविक समय (Real-time) में उन्हें ट्रैक करने की सुविधा देता है।
  • धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर फोकस: केंद्र सरकार ने अयोध्या, उज्जैन जैसे देश के 30 प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों को भिक्षामुक्त बनाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, ताकि इन क्षेत्रों से लोगों को सम्मानजनक तरीके से हटाकर पुनर्वासित किया जा सके।
  • सकारात्मक परिणाम: संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत देश भर में चिन्हित किए गए 31,055 लोगों में से हजारों लोगों (जिनमें लगभग 2,500 बच्चे शामिल हैं) को सरकारी पुनर्वास केंद्रों में भेजा जा चुका है, जहां उन्हें चिकित्सा सहायता, बुनियादी शिक्षा और व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

आगे की राह: लाचारी के इस चक्रव्यूह को तोड़ना

मध्य प्रदेश के इंदौर (देश का पहला भिक्षामुक्त शहर) और सांची जैसे नगरों की सफलता यह साबित करती है कि यदि स्थानीय प्रशासन मानव तस्करी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र को एक साथ मिला दे, तो पूर्ण पुनर्वास संभव है।

हालांकि, इस सफलता को पूरे देश में लागू करने के लिए समस्या की जड़ पर वार करना होगा—जैसे ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर होने वाले अनियंत्रित पलायन को रोकना, रोजगार के अवसर बढ़ाना और मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को सुधारना। जब तक सरकार इंसानी लाचारी से मुनाफा कमाने वाले मल्टी-करोड़ आपराधिक नेटवर्कों को पूरी तरह नेस्तनाबूत नहीं करती और वास्तव में बेसहारा लोगों को सम्मानजनक आजीविका नहीं देती, तब तक ‘भिक्षामुक्त भारत’ का सपना अधूरा ही रहेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और स्तंभकार हैं)