Last Updated on March 13, 2026 5:55 pm by INDIAN AWAAZ

— ललित गर्ग
भारतीय समाज में लंबे समय से यह गहरी मान्यता रही है कि परिवार का कोई सदस्य जीवन के स्वाभाविक अंत तक उसकी देखभाल करता रहे। जीवन की रक्षा करना और उसकी देखभाल सुनिश्चित करना परंपरागत रूप से नैतिक जिम्मेदारी माना गया है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में किसी रोगी की सेवा केवल चिकित्सा उपचार का विषय नहीं होती, बल्कि यह भावनात्मक रिश्तों, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों से भी जुड़ी होती है। कई बार यह भी देखा गया है कि किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद भी उसके शरीर को लंबे समय तक इस उम्मीद में रखा जाता है कि शायद जीवन किसी तरह लौट आए।
लेकिन जब कोई व्यक्ति ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है जहाँ सामान्य जीवन में लौटने की कोई संभावना नहीं रहती और उसका अस्तित्व केवल कृत्रिम जीवन-रक्षक उपकरणों पर निर्भर हो जाता है, तब एक मूलभूत प्रश्न सामने आता है—क्या केवल जैविक अस्तित्व को बनाए रखना ही जीवन की रक्षा करना है? या फिर जीवन की गरिमा के अनुरूप किसी व्यक्ति को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के अधिकार को भी स्वीकार किया जाना चाहिए?
इसी जटिल और संवेदनशील प्रश्न के केंद्र में 11 मार्च 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया वह फैसला है, जिसमें गाज़ियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी गई। लगभग तेरह वर्षों तक कोमा में रहने के बाद उनके मामले में दिया गया यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन खोजने का एक गंभीर और संवेदनशील प्रयास है।
वास्तव में हरीश राणा का मामला हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि इच्छामृत्यु केवल कानूनी विषय नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय कहानी भी है। यह उस युवा की कहानी है जिसकी जिंदगी एक दुर्घटना के बाद अचानक बदल गई और जो तेरह वर्षों तक जीवन और मृत्यु के बीच एक मौन संघर्ष में पड़ा रहा। उस संघर्ष में न कोई शब्द थे, न कोई संवाद—केवल एक स्थिर और असहाय जैविक अस्तित्व था। ऐसी परिस्थितियों में परिवार, डॉक्टर और समाज एक कठिन दुविधा का सामना करते हैं—आखिर कृत्रिम रूप से जीवन को कितने समय तक बढ़ाया जाए?
इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 है, जो प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अनुच्छेद की व्याख्या को व्यापक बनाया है और स्पष्ट किया है कि जीवन का अधिकार केवल सांस लेने या जीवित रहने का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी है।
यही संवैधानिक दृष्टिकोण एक और प्रश्न को जन्म देता है—यदि किसी व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, तो क्या उसे गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए?
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर न्यायिक विमर्श धीरे-धीरे विकसित हुआ है। वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। अरुणा शानबाग एक नर्स थीं, जो दशकों तक वनस्पतिक अवस्था में रहीं। उस फैसले ने देशभर में इस विषय पर व्यापक बहस को जन्म दिया। बाद में 2018 में ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ’ के ऐतिहासिक मामले में न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को संवैधानिक मान्यता दी और “लिविंग विल” की अवधारणा को स्वीकार किया। इसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में लिखित रूप से यह घोषणा कर सकता है कि यदि वह कभी असाध्य चिकित्सा स्थिति में पहुँच जाए तो उसे कृत्रिम जीवन-रक्षक प्रणालियों पर जीवित न रखा जाए।
हरीश राणा के मामले में विशेषज्ञ चिकित्सकों के एक मेडिकल बोर्ड ने यह निष्कर्ष दिया कि उपचार जारी रखने का कोई चिकित्सीय उद्देश्य नहीं रह गया है। चिकित्सा हस्तक्षेप वास्तव में केवल जैविक अस्तित्व को बनाए रखने का साधन बन गया था। ऐसी स्थिति में अदालत की अनुमति इस कठिन सत्य को स्वीकार करती है कि जीवन की गरिमा केवल जीने में ही नहीं, बल्कि मरने में भी सुरक्षित रखी जानी चाहिए।
फिर भी इच्छामृत्यु एक अत्यंत जटिल और विवादास्पद विषय है। दुनिया भर में कई देश इस मुद्दे पर गंभीर नैतिक और कानूनी बहस कर रहे हैं। कुछ देशों ने सीमित परिस्थितियों में इसे कानूनी मान्यता दी है, जबकि अन्य देशों ने संभावित दुरुपयोग की आशंका के कारण इससे दूरी बनाए रखी है। भारत में यह विषय विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि यहाँ पारिवारिक संबंध, धार्मिक विश्वास और सामाजिक भावनाएँ गहराई से जुड़ी हुई हैं।
इसी संदर्भ में जैन धर्म की परंपरा संथारा (सल्लेखना) का भी अक्सर उल्लेख किया जाता है। जैन दर्शन में इसे जीवन के पवित्र समापन—एक प्रकार के “मृत्यु उत्सव” के रूप में देखा जाता है। संथारा का अर्थ है जीवन के अंतिम चरण में स्वेच्छा से भोजन और शारीरिक आसक्तियों का त्याग कर शांत और ध्यानमय भाव से मृत्यु को स्वीकार करना। जैन विचारधारा में इसे आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का सर्वोच्च रूप माना जाता है।
संथारा और आधुनिक इच्छामृत्यु के बीच कुछ समानताएँ और कुछ अंतर भी हैं। संथारा आध्यात्मिक विरक्ति और तपस्या पर आधारित है, जबकि आधुनिक इच्छामृत्यु चिकित्सा विज्ञान और असहनीय पीड़ा से मुक्ति की भावना पर आधारित है। फिर भी दोनों में एक साझा तत्व है—जीवन के अंतिम चरण में गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान।
हालाँकि इस परंपरा को लेकर भी अदालतों में बहस हुई है कि इसे धार्मिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति माना जाए या आत्महत्या का रूप। यह बहस इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न केवल कानूनी तर्कों से नहीं सुलझाए जा सकते; इनमें नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयाम भी शामिल होते हैं।
प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक विनोबा भावे इस परंपरा से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने कई अवसरों पर यह इच्छा व्यक्त की थी कि यदि संभव हो तो जीवन के अंत में उन्हें भी ऐसा शांत, अनुशासित और जागरूक प्रस्थान अनुभव करने का अवसर मिले।
इस दृष्टि से हरीश राणा का मामला हमें यह भी याद दिलाता है कि संविधान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवीय व्याख्या में निहित है। जब न्यायपालिका जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए मानवीय गरिमा और करुणा को केंद्र में रखती है, तो वह केवल कानून लागू नहीं करती, बल्कि समाज को अधिक संवेदनशील और मानवीय दिशा भी दिखाती है।
फिर भी यह सच है कि भारत में इच्छामृत्यु पर अभी तक कोई व्यापक और स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है। न्यायिक दिशानिर्देशों के बावजूद परिवारों और चिकित्सकों को अक्सर जटिल प्रक्रियाओं और कानूनी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर एक व्यापक कानूनी ढाँचा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
ऐसे कानून का निर्माण करते समय दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। पहला, असाध्य रोगों से पीड़ित मरीजों को अनावश्यक पीड़ा से मुक्ति मिल सके। दूसरा, किसी भी व्यक्ति को बाहरी दबाव, निजी स्वार्थ या आर्थिक कारणों से इच्छामृत्यु के लिए मजबूर न किया जाए। स्पष्ट प्रक्रियाएँ, पारदर्शी चिकित्सीय मूल्यांकन और रोगी की स्वायत्त इच्छा का सम्मान इस व्यवस्था के अनिवार्य तत्व होने चाहिए।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि हरीश राणा के मामले में दिया गया निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि संवैधानिक करुणा का उदाहरण है। यह न्याय, संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
अंततः यह फैसला हमें यह याद दिलाता है कि जीवन के प्रति सम्मान केवल उसे अनंत काल तक बढ़ाते रहने में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा को सुरक्षित रखने में निहित है। जब उपचार असंभव हो जाता है और चिकित्सा हस्तक्षेप केवल पीड़ा को लंबा करता है, तब एक सम्मानजनक विदाई भी मानवता का ही विस्तार बन सकती है।
इसी दृष्टि से यह आवश्यक है कि भारत में इच्छामृत्यु के प्रश्न पर व्यापक सामाजिक संवाद हो और एक ऐसा संवेदनशील तथा संतुलित कानूनी ढाँचा विकसित किया जाए, जो प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने के साथ-साथ गरिमा के साथ मरने का भी अधिकार सुनिश्चित कर सके।
