Last Updated on April 17, 2026 7:59 pm by INDIAN AWAAZ

— एस. एन. वर्मा
पहली नज़र में राजमार्ग और मधुमक्खियाँ दो बिल्कुल अलग दुनिया लगती हैं—एक तेज़ रफ्तार और कंक्रीट की, दूसरी प्रकृति की शांत लय में चलने वाली। लेकिन National Highways Authority of India (NHAI) की नई पहल इन दोनों को जोड़ने की कोशिश कर रही है—और यह प्रयास भारत में विकास की सोच को एक नई दिशा दे सकता है।
राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे “बी कॉरिडोर” विकसित करने की योजना महज़ एक वृक्षारोपण अभियान नहीं है, बल्कि सोच में बदलाव का संकेत है। अब सड़क किनारे हरियाली को केवल सजावट नहीं, बल्कि एक उपयोगी पारिस्थितिक तंत्र के रूप में विकसित करने की बात हो रही है। इसकी शुरुआत Jharkhand के कई मार्गों—बरही-रांची-जमशेदपुर, हज़ारीबाग-कोडरमा, गोविंदपुर-साहिबगंज और देवघर-बासुकीनाथ—से की जा रही है। यहाँ नीम, करंज, महुआ, पलाश, जामुन और सिरिस जैसे देशी, मकरंद-समृद्ध पेड़ लगाए जाएंगे, ताकि मधुमक्खियों को पूरे साल भोजन मिल सके।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परागण करने वाले जीव, खासकर मधुमक्खियाँ, कृषि और पारिस्थितिकी दोनों के लिए बेहद आवश्यक हैं। अनुमान है कि वैश्विक खाद्य उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा परागण पर निर्भर करता है। लेकिन आज मधुमक्खियों की संख्या लगातार घट रही है—जिसके पीछे आवास का नष्ट होना, कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण हैं। ऐसे समय में राजमार्गों को परागण-अनुकूल बनाने की पहल दूरदर्शी कदम है।
इस योजना की खासियत इसका पैमाना और संरचना है। NHAI लाखों पेड़ लगाने की तैयारी में है, जिनमें बड़ी संख्या मधुमक्खी-अनुकूल प्रजातियों की होगी। ये केवल अलग-अलग स्थानों पर लगाए गए पेड़ नहीं होंगे, बल्कि एक सतत हरित गलियारा (ग्रीन कॉरिडोर) बनाएंगे, जो स्थानीय जलवायु के अनुसार अलग-अलग अंतराल पर विकसित किया जाएगा। इससे मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले जीवों को सुरक्षित मार्ग और निरंतर भोजन उपलब्ध होगा।
यह पहल भारत में बुनियादी ढांचा विकास की पारंपरिक सोच से अलग है, जहाँ पर्यावरण अक्सर पीछे छूट जाता है। बी कॉरिडोर यह दिखाता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। बेहतर परागण से कृषि उत्पादन बढ़ेगा, ग्रामीण क्षेत्रों में शहद उत्पादन और रोजगार के नए अवसर बनेंगे, और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा।
इसमें देशी प्रजातियों पर दिया गया जोर भी सराहनीय है। अक्सर वृक्षारोपण में सजावटी या विदेशी पौधों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनका पारिस्थितिक महत्व सीमित होता है। लेकिन यहाँ ऐसे पेड़-पौधों का चयन किया गया है, जो न केवल स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं, बल्कि मधुमक्खियों के लिए पोषक भी हैं। पेड़ों के साथ-साथ झाड़ियाँ, घास और जड़ी-बूटियाँ भी लगाई जाएंगी, जिससे साल भर फूलों का चक्र बना रहे और परागण करने वाले जीवों को निरंतर संसाधन मिलते रहें।
यह पहल हमें भविष्य के बुनियादी ढांचे पर भी सोचने को मजबूर करती है। जैसे-जैसे भारत का सड़क नेटवर्क बढ़ रहा है, उसका पर्यावरण पर प्रभाव भी बढ़ रहा है। ऐसे में बी कॉरिडोर जैसे प्रयास यह दिखाते हैं कि अगर योजना सही हो, तो विकास परियोजनाओं में ही पर्यावरण संरक्षण को शामिल किया जा सकता है।
हालाँकि, इस योजना की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। भारत में कई बार वृक्षारोपण योजनाएँ रखरखाव और निगरानी के अभाव में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं। यह सुनिश्चित करना होगा कि ये कॉरिडोर केवल पौधारोपण तक सीमित न रहें, बल्कि वास्तव में जीवंत पारिस्थितिक तंत्र बनें। इसके लिए वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक होगी।
फिर भी, यह विचार अपने आप में प्रेरणादायक है। जलवायु संकट और पारिस्थितिक असंतुलन के इस दौर में समाधान हमेशा जटिल नहीं होते—कभी-कभी वे हमारे आसपास की जगहों को नए नजरिए से देखने से भी मिल जाते हैं।
अगर सही ढंग से लागू किया जाए, तो भारत के ये ‘बी कॉरिडोर’ यह साबित कर सकते हैं कि विकास और प्रकृति साथ-साथ चल सकते हैं—और राजमार्ग केवल गाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि जैव विविधता के लिए भी जीवनरेखा बन सकते हैं।
