Last Updated on June 18, 2026 1:07 pm by INDIAN AWAAZ

डॉ. गंगी रेड्डी टी. के.
पिछले एक दशक से सार्वजनिक स्वास्थ्य जगत में एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है— “बैठना अब नया धूम्रपान बन गया है।” पहली नज़र में यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन इसके पीछे मौजूद वैज्ञानिक शोध कुछ और ही कहानी बताते हैं। लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना अब कई ऐसी पुरानी बीमारियों से जुड़ा पाया गया है जिन्हें पहले बढ़ती उम्र का स्वाभाविक परिणाम माना जाता था। आज उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि ये समस्याएँ हमेशा उम्र की वजह से नहीं होतीं, बल्कि कई मामलों में हमारी रोज़मर्रा की जीवनशैली उनका कारण बनती है।
भारत के लिए यह चर्चा अब टाली नहीं जा सकती। तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, लंबे समय तक डेस्क पर काम, स्क्रीन के सामने बढ़ते घंटे और रोज़मर्रा की शारीरिक गतिविधियों में कमी ने भारतीय समाज को पहले की पीढ़ियों की तुलना में कहीं अधिक निष्क्रिय बना दिया है। स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े भी इसी बदलाव की ओर संकेत कर रहे हैं।
1. हृदय स्वास्थ्य पर तेज़ असर
लंबे समय तक बैठे रहने से शरीर में रक्त संचार धीमा हो जाता है, हृदय की कार्यक्षमता प्रभावित होती है और रक्त में वसा अम्ल जमा होने लगते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग दिन में आठ घंटे से अधिक समय बैठे रहते हैं, उनमें हृदय रोगों का खतरा काफी बढ़ जाता है, भले ही वे बाद में व्यायाम करते हों।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि लंबे समय तक बैठे रहने से होने वाले नुकसान की पूरी भरपाई केवल एक घंटे जिम जाकर नहीं की जा सकती। शरीर को दिनभर नियमित अंतराल पर गतिविधि की आवश्यकता होती है।
2. शरीर की चयापचय (मेटाबॉलिक) प्रणाली प्रभावित होती है
शारीरिक निष्क्रियता शरीर की रक्त शर्करा नियंत्रित करने और वसा को संसाधित करने की क्षमता को कमजोर करती है। चलते-फिरते या खड़े रहने जैसी छोटी गतिविधियाँ भी ग्लूकोज नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जब शरीर की मांसपेशियाँ लंबे समय तक निष्क्रिय रहती हैं तो इंसुलिन संवेदनशीलता कम होने लगती है। समय के साथ यह स्थिति टाइप-2 मधुमेह का कारण बन सकती है। भारत में यह बीमारी अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि 30 और 40 वर्ष की आयु वाले कामकाजी लोगों में भी तेजी से बढ़ रही है।
3. मांसपेशियाँ और हड्डियाँ उम्र से पहले कमजोर होने लगती हैं
आमतौर पर 35 वर्ष की उम्र के बाद मांसपेशियों का क्षय शुरू होता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में सार्कोपेनिया कहा जाता है। लेकिन निष्क्रिय जीवनशैली इस प्रक्रिया को और तेज़ कर देती है।
इसी तरह पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने पर हड्डियों का घनत्व भी तेजी से कम होने लगता है, जिससे फ्रैक्चर और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। भारतीयों में आनुवंशिक रूप से भी अपेक्षाकृत कम हड्डी घनत्व देखा जाता है, ऐसे में निष्क्रिय जीवनशैली यह जोखिम और बढ़ा देती है।
4. दिमाग पर भी पड़ता है असर
शारीरिक गतिविधि और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है। नियमित व्यायाम मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बढ़ाता है और नई तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संबंध बनने में मदद करता है।
इसके विपरीत लंबे समय तक निष्क्रिय रहने से याददाश्त तेजी से कमजोर हो सकती है। अवसाद, चिंता और आगे चलकर डिमेंशिया जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। शरीर की तरह मस्तिष्क को भी सक्रिय बने रहने के लिए नियमित गतिविधि की आवश्यकता होती है।
5. केवल जीवनकाल नहीं, स्वस्थ जीवन के वर्ष भी घटते हैं
निष्क्रिय जीवनशैली की सबसे बड़ी चिंता केवल कम उम्र तक जीना नहीं है, बल्कि जीवन के अधिक वर्षों को बीमारियों और सीमित क्षमता के साथ बिताना है।
कम गतिशीलता, लगातार दर्द, चयापचय संबंधी रोग और मानसिक क्षमताओं में गिरावट ऐसे लोगों में जल्दी दिखाई देने लगती है जो वर्षों तक कम सक्रिय जीवन जीते हैं। स्वस्थ वृद्धावस्था का लक्ष्य केवल लंबी उम्र नहीं, बल्कि लंबे समय तक बेहतर स्वास्थ्य के साथ जीवन जीना होना चाहिए।
इस समस्या का समाधान किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी दैनिक आदतों से शुरू होता है। हर 45 मिनट बाद उठकर थोड़ा चलना, फोन पर बात करते समय टहलना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियाँ चुनना और शाम को थोड़ी देर की सैर को दिनचर्या में शामिल करना— ये फिटनेस लक्ष्य नहीं बल्कि शरीर की सामान्य देखभाल के तरीके हैं।
भारत तेजी से वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में हमारा स्वास्थ्य कैसा होगा, इसका निर्णय आज हमारे कार्यालयों, घरों और सोफों पर बैठकर लिए जा रहे छोटे-छोटे फैसले तय करेंगे।
डॉ. गंगी रेड्डी टी. के. वरिष्ठ सलाहकार – इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी, फेफड़ा प्रत्यारोपण एवं स्लीप मेडिसिन, KIMS हॉस्पिटल्स, महादेवपुरा, बेंगलुरु
