Last Updated on March 9, 2026 5:02 pm by INDIAN AWAAZ

— ललित गर्ग
डिजिटल युग में मानव जीवन की गति और स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। संचार, शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संबंध अब बड़ी हद तक आभासी मंचों के माध्यम से संचालित होने लगे हैं। इस परिवर्तन ने जहां जीवन को अनेक सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं कई नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं, विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानसिक, शैक्षिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के संदर्भ में।
इसी संदर्भ में तकनीकी दृष्टि से प्रगतिशील भारतीय राज्य कर्नाटक ने एक महत्वपूर्ण और अनुकरणीय पहल करते हुए 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से दूर रखने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने अपने 2026–27 के बजट सत्र में घोषणा की कि किशोरों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग को सीमित करने के लिए कड़े नियम लागू किए जाएंगे। यह निर्णय उन अभिभावकों की बढ़ती चिंताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जो अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न जोखिमों—जैसे साइबर बुलिंग और साइबर धोखाधड़ी—से परेशान हैं। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को आभासी दुनिया के दुष्प्रभावों से बचाना और उनके स्वस्थ मानसिक विकास को सुनिश्चित करना है। निस्संदेह यह एक सराहनीय कदम है और अन्य राज्यों को भी इससे प्रेरणा लेकर बचपन को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
कर्नाटक की इस पहल के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी राज्य विधानसभा में घोषणा की कि अगले 90 दिनों के भीतर ऐसा कानून लाया जाएगा, जिसके तहत 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इस निर्णय के साथ आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद इस तरह की नीति अपनाने वाला दूसरा राज्य बनने की ओर अग्रसर है।
ये पहल केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि एक तेजी से आभासी होती दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चल रही वैश्विक बहस का भी हिस्सा हैं। दुनिया के कई देश इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया पहले ही 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लागू कर चुका है, जबकि फ्रांस जैसे देशों ने भी बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कड़े नियम बनाए हैं।
पिछले कुछ वर्षों में मनोवैज्ञानिकों और बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग किशोरों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, चिंता, अवसाद, ध्यान की कमी और आक्रामक व्यवहार जैसी समस्याएं युवा उपयोगकर्ताओं में तेजी से बढ़ रही हैं।
वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर लगातार तुलना और प्रदर्शन की संस्कृति बच्चों में हीनता और असंतोष की भावना पैदा करती है। इस चिंता को भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में भी रेखांकित किया गया था, जिसमें युवाओं पर अत्यधिक स्क्रीन टाइम के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख किया गया। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार किशोरों का औसत दैनिक स्क्रीन समय लगातार बढ़ रहा है। कई सर्वेक्षण बताते हैं कि कई देशों में 13 से 18 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन तीन से छह घंटे तक आभासी मंचों पर बिताते हैं।
इस अत्यधिक डिजिटल व्यस्तता का सीधा प्रभाव उनकी पढ़ाई, नींद, पारिवारिक संवाद और शारीरिक गतिविधियों पर पड़ता है। ध्यान और एकाग्रता में कमी सीखने की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। वह स्वाभाविक बचपन, जो खेल, मित्रता और प्रकृति से जुड़ाव के माध्यम से विकसित होना चाहिए, धीरे-धीरे एक कृत्रिम आभासी दुनिया में सिमटता जा रहा है।
इसके अलावा डिजिटल मंचों के माध्यम से साइबर उत्पीड़न और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। कई बच्चे अनजाने में ऐसे जाल में फंस जाते हैं, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। अनुचित ऑनलाइन सामग्री के संपर्क में आने से भी उनके मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर पड़ता है। इन परिस्थितियों में यह स्पष्ट हो गया है कि केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है; बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत नीतिगत उपाय भी आवश्यक हैं।
हालांकि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल सराहनीय है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आती हैं। आज के समय में स्मार्टफोन और डिजिटल एप्लिकेशन शिक्षा और दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। कई स्कूल असाइनमेंट, संचार और सूचना के आदान-प्रदान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। ऐसे में यह तय करना कठिन हो सकता है कि बच्चे की ऑनलाइन गतिविधि शैक्षिक उद्देश्य के लिए है या सोशल नेटवर्किंग के लिए।
एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती आयु सत्यापन की प्रक्रिया से जुड़ी है। यह सुनिश्चित करना तकनीकी रूप से जटिल है कि कोई उपयोगकर्ता वास्तव में 13 या 16 वर्ष से कम आयु का है। यदि तकनीकी कंपनियां इस दिशा में सहयोग नहीं करतीं, तो ऐसे नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करना मुश्किल हो सकता है। कई परिवारों में एक ही मोबाइल फोन कई सदस्यों द्वारा साझा किया जाता है, जिससे बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को पूरी तरह सीमित करना और कठिन हो जाता है। इन चुनौतियों के बावजूद यह पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समाज का ध्यान एक गंभीर और बढ़ती समस्या की ओर आकर्षित करती है।
वास्तव में बच्चों को आभासी मंचों के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए संतुलित दृष्टिकोण और व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है। सरकार, स्कूल, तकनीकी मंच और अभिभावक—सभी की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है।
सरकारों को बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए स्पष्ट नीतियां बनानी चाहिए और तकनीकी कंपनियों के साथ मिलकर आयु सत्यापन की प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। स्कूलों को विद्यार्थियों को डिजिटल अनुशासन और तकनीक के जिम्मेदार उपयोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अभिभावकों की है, क्योंकि बच्चों की आदतें और व्यवहार सबसे पहले परिवार में ही आकार लेते हैं। यदि माता-पिता स्वयं डिजिटल संयम का उदाहरण प्रस्तुत करें और बच्चों के साथ खुला संवाद बनाए रखें, तो वर्चुअल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
साथ ही बच्चों को रचनात्मक और सकारात्मक वातावरण उपलब्ध कराना भी अत्यंत आवश्यक है। खेल, पठन-पाठन, संगीत, कला और प्रकृति के साथ संवाद जैसी गतिविधियां बच्चे के व्यक्तित्व के संतुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब बचपन से ही ऐसी सकारात्मक आदतों को प्रोत्साहित किया जाता है, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से तकनीक के साथ एक स्वस्थ संबंध विकसित करते हैं और आभासी मंचों पर उनकी निर्भरता कम हो जाती है। समाज को भी बच्चों के लिए स्वस्थ और प्रेरणादायक वातावरण बनाने की दिशा में सक्रिय कदम उठाने चाहिए।
अब यह स्पष्ट हो गया है कि डिजिटल क्रांति के साथ-साथ डिजिटल अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है। तकनीक मानव जीवन को समृद्ध बनाने का माध्यम होनी चाहिए, न कि उसे मानसिक और सामाजिक संकटों की ओर धकेलने का कारण।
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की पहल इस दिशा में एक चेतावनी भी है और प्रेरणा भी। यदि अन्य राज्य भी इन कदमों से प्रेरणा लेकर बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस उपाय करें और केंद्र सरकार भी इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने पर विचार करे, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
तेजी से बिगड़ती परिस्थितियों को देखते हुए संभव है कि केंद्र सरकार को भविष्य में पूरे देश में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाना पड़े। ऐसे किसी भी कानून को बनाने से पहले विशेषज्ञों और समाज के विभिन्न वर्गों से व्यापक परामर्श करना भी आवश्यक होगा।
आज जब बच्चों का स्क्रीन टाइम लत का रूप लेता जा रहा है और उनकी घटती एकाग्रता शिक्षा को प्रभावित कर रही है, तब इस चुनौती से निपटना केंद्र और राज्य सरकारों दोनों की प्राथमिकता होना चाहिए।
आखिरकार बचपन का अर्थ आभासी दुनिया में खो जाना नहीं है। वह कल्पना, खेल, सीखने और रचनात्मकता से भरा होना चाहिए। यदि समाज और शासन मिलकर यह सुनिश्चित कर सकें कि बच्चे सुरक्षित, संतुलित और रचनात्मक वातावरण में बड़े हों, तभी हम वास्तव में एक स्वस्थ, संवेदनशील और सशक्त भविष्य की कल्पना कर सकते हैं।
