Last Updated on February 9, 2026 7:19 pm by INDIAN AWAAZ
BNP आगे, लेकिन मुकाबला कड़ा: बांग्लादेश का चुनावी संग्राम

ढाका से ज़ाकिर हुसैन,
बांग्लादेश में 12 फ़रवरी को आम चुनाव होने जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह पिछले दस वर्षों से अधिक समय में देश का पहला ऐसा चुनाव होगा जिसमें वास्तविक और खुली प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। यह चुनाव पिछले साल हुए उस जनआंदोलन के बाद हो रहा है, जिसकी अगुवाई मुख्य रूप से युवा वर्ग, खासकर जनरेशन Z, ने की थी और जिसके परिणामस्वरूप पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को सत्ता से हटना पड़ा।
शेख़ हसीना के 15 वर्षों के शासनकाल में विपक्षी दलों के लिए राजनीति करना बेहद मुश्किल हो गया था। कुछ दलों ने चुनावों का बहिष्कार किया, जबकि कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया। अब हालात बदल चुके हैं। 2024 की अशांति के बाद शेख़ हसीना भारत चली गईं, उनकी पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और विपक्षी दल एक बार फिर खुले तौर पर चुनाव प्रचार कर रहे हैं।
इस समय बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को सबसे मज़बूत दावेदार माना जा रहा है। पार्टी 300 में से 292 संसदीय सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बीएनपी प्रमुख तारिक़ रहमान का कहना है कि उनकी पार्टी को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें मिलने का पूरा भरोसा है।
हालांकि मुकाबला आसान नहीं है। इस्लामी दल जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में बना एक गठबंधन भी मज़बूती से मैदान में है। इस गठबंधन को एक नई जनरेशन Z आधारित पार्टी का समर्थन प्राप्त है, जिसके अधिकांश सदस्य 30 वर्ष से कम उम्र के हैं। यह युवा समूह पहले शेख़ हसीना के खिलाफ सड़कों पर सक्रिय था, लेकिन चुनावी सफलता न मिलने पर उसने जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन कर लिया।

देश भर में चुनावी माहौल साफ दिखाई दे रहा है। बीएनपी के “धान की बालियाँ” और जमात-ए-इस्लामी के “तराज़ू” चुनाव चिन्ह वाले पोस्टर पेड़ों, बिजली के खंभों और दीवारों पर लगे हुए हैं। जगह-जगह चुनावी शिविरों में पार्टी गीत बज रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार यह दृश्य पिछले चुनावों से बिल्कुल अलग है, जब हर तरफ अवामी लीग का “नाव” चिन्ह छाया रहता था।
करीब 17 करोड़ 50 लाख आबादी वाले बांग्लादेश में शेख़ हसीना की सत्ता से विदाई के बाद से कई महीनों तक राजनीतिक अस्थिरता बनी रही है। इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है, खासकर परिधान उद्योग पर, जिसमें बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम स्पष्ट नहीं रहे तो अस्थिरता और बढ़ सकती है।
ढाका स्थित सेंटर फॉर गवर्नेंस स्टडीज़ के कार्यकारी निदेशक परवेज़ करीम अब्बासी के अनुसार,
“जनमत सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त दिखाई दे रही है, लेकिन मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अभी भी असमंजस में है। नतीजों पर कई कारक असर डालेंगे, जिनमें जनरेशन Z का वोट बेहद अहम है, जो कुल मतदाताओं का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।”
आर्थिक मुद्दे भी चुनाव में केंद्र में हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार भ्रष्टाचार मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता है, जबकि महंगाई दूसरे स्थान पर है। बढ़ती कीमतों, विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट और निवेश की धीमी रफ्तार के कारण बांग्लादेश को 2022 से आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे संस्थानों से अरबों डॉलर की वित्तीय मदद लेनी पड़ी है।
21 वर्षीय अब्दुल्ला अल साद, जो पहली बार मतदान करने जा रहे हैं, कहते हैं,
“लोग अवामी लीग से थक चुके थे। राष्ट्रीय चुनावों में सही मायने में वोट डालने का मौका नहीं मिलता था। मुझे उम्मीद है कि आने वाली सरकार, चाहे कोई भी बने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करेगी।”
ये चुनाव बांग्लादेश की विदेश नीति को भी नया मोड़ दे सकते हैं। शेख़ हसीना के शासनकाल में देश को भारत के क़रीब माना जाता था, जबकि उनके हटने के बाद चीन का प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी भारत के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखेगी, जबकि जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाली सरकार पाकिस्तान की ओर झुक सकती है।
जमात-ए-इस्लामी के जनरेशन Z सहयोगी दल ने बांग्लादेश में “नई दिल्ली के वर्चस्व” की आलोचना की है और रिपोर्टों के मुताबिक उसने चीनी राजनयिकों से भी मुलाकात की है। जमात-ए-इस्लामी का कहना है कि वह किसी एक देश के साथ विशेष रूप से जुड़ी नहीं है। वहीं, तारिक़ रहमान ने कहा कि बीएनपी की सरकार हर उस देश से अच्छे संबंध रखेगी जो बांग्लादेश और उसके लोगों के हित में हो।
सोमवार को चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में पहुंच गया। ढाका में बड़े नेताओं की रैलियों के कारण भारी ट्रैफिक जाम देखने को मिला। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, प्रचार मंगलवार सुबह 7:30 बजे समाप्त हो जाएगा।
