Last Updated on January 10, 2026 3:55 pm by INDIAN AWAAZ
सरकारी दावा: हालात काबू में, हिंसा के पीछे विदेशी हाथ

न्यूज़ डेस्क
इंटरनेट ब्लैकआउट और सर्वोच्च नेता की सख़्त चेतावनी
ईरान में 28 दिसंबर से शुरू हुए देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुके हैं। इस बीच सरकार द्वारा लगाए गए लगभग पूर्ण इंटरनेट ब्लैकआउट ने हालात को और गंभीर बना दिया है। शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई ने प्रदर्शन शुरू होने के बाद पहली बार सार्वजनिक बयान देते हुए साफ कहा कि इस्लामी गणराज्य किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
ख़ामेनेई ने प्रदर्शनकारियों पर विदेशी ताक़तों के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया और कहा कि देश की आर्थिक समस्याओं का फायदा उठाकर अस्थिरता फैलाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी ईरान में अशांति भड़काने का आरोप लगाया।
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी (HRANA) के अनुसार, प्रदर्शनों की शुरुआत से अब तक कम से कम 62 लोगों की मौत हो चुकी है। बड़े शहरों में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती जारी है, जबकि इंटरनेट बंदी के कारण ज़मीनी हालात की स्वतंत्र पुष्टि मुश्किल बनी हुई है।
तेहरान–वॉशिंगटन के बीच तीखी बयानबाज़ी
प्रदर्शनों के साथ-साथ ईरान और अमेरिका के बीच बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शनकारियों की हत्या होती है तो ईरान को “गंभीर नतीजे” भुगतने होंगे। उन्होंने कहा कि ईरान “बड़ी मुसीबत” में फंस सकता है।
इसके जवाब में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका और इज़राइल पर सीधे तौर पर विरोध-प्रदर्शनों को प्रभावित करने और देश को अस्थिर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। लेबनान में एक कार्यक्रम के दौरान अराघची ने कहा कि वॉशिंगटन और तेल अवीव खुलेआम ईरान के आंतरिक मामलों में दखल दे रहे हैं, हालांकि उन्होंने किसी प्रत्यक्ष विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना को कम बताया।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा पर गहरी चिंता जताई और ईरान से शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा करने की अपील की। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने भी प्रदर्शनकारियों की मौत की निंदा करते हुए संयम बरतने की मांग की है।
आर्थिक फैसले से शुरू हुआ आंदोलन, सियासी चुनौती में तब्दील
वर्तमान आंदोलन की जड़ें ईरान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति में हैं। विरोध तब शुरू हुआ जब ईरान के केंद्रीय बैंक ने वह योजना समाप्त कर दी, जिसके तहत कुछ आयातकों को बाज़ार दर से सस्ते अमेरिकी डॉलर उपलब्ध कराए जाते थे। इस फैसले के बाद बाज़ारों में कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए।
इन विरोध प्रदर्शनों में बाज़ारी समुदाय की भागीदारी को अहम मोड़ माना जा रहा है। पारंपरिक रूप से बाज़ारी इस्लामी गणराज्य के समर्थक रहे हैं। इतिहास में, बाज़ारियों और धार्मिक नेतृत्व के गठजोड़ ने 1979 की इस्लामी क्रांति को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी, जब उन्होंने शाह के खिलाफ आंदोलन को आर्थिक आधार दिया था।
हालांकि समय के साथ उनकी राजनीतिक भूमिका प्रतीकात्मक होती गई, लेकिन मुद्रा में उतार-चढ़ाव और व्यापार पर पड़ते सीधे असर ने उन्हें फिर से सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया। धीरे-धीरे ये प्रदर्शन केवल महंगाई और बेरोज़गारी तक सीमित न रहकर सत्ता व्यवस्था को चुनौती देने वाले नारों में बदल गए।
रज़ा पहलवी की एंट्री, राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान
ईरान के अंतिम शाह के निर्वासित पुत्र रज़ा पहलवी भी इस आंदोलन में मुखर होकर सामने आए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो संदेश में देशभर में दो दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।
पहलवी ने खास तौर पर परिवहन, तेल-गैस और ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के कर्मचारियों से काम बंद करने की अपील की। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से राष्ट्रीय झंडों और प्रतीकों के साथ सड़कों पर उतरकर सार्वजनिक स्थानों को अपने नियंत्रण में लेने का भी आग्रह किया।
उन्होंने कहा, “शहरों के केंद्रों पर कब्ज़ा कर उन्हें बनाए रखना ही अगला लक्ष्य होना चाहिए,” और दावा किया कि हालिया प्रदर्शनों ने ईरानी नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दे दिया है।
गौरतलब है कि 1979 की क्रांति के समय रज़ा पहलवी महज़ 16 वर्ष के थे। वे अपने पिता शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के 40 वर्षीय शासन के बाद निर्वासन में चले गए थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी मौजूदगी बढ़ रही है, लेकिन ईरान के भीतर उनकी लोकप्रियता को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है।
सरकारी दावा: हालात काबू में, हिंसा के पीछे विदेशी हाथ
जहां अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठन हिंसा और दमन की बात कर रहे हैं, वहीं ईरानी सरकार और सरकारी मीडिया ने हालात सामान्य होने का दावा किया है। प्रेस टीवी और तसनीम न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, देश के कई शहरों में अब “शांति” लौट आई है।
ईरान की क़ानून प्रवर्तन कमान (FARAJA) के प्रवक्ता सईद मोंतज़र अल-महदी ने कहा कि ज़मीनी रिपोर्टों के मुताबिक देशभर में सामान्य स्थिति बहाल हो रही है। उन्होंने दावा किया कि हालिया जनसभाएं सरकार विरोधी नहीं, बल्कि “सशस्त्र और आतंकवादी तत्वों” के खिलाफ थीं।
सरकारी एजेंसियों के अनुसार, कुछ प्रांतों में सशस्त्र समूहों ने सार्वजनिक और निजी संपत्तियों पर हमले किए, जिनमें मस्जिदें, बैंक और सरकारी प्रतिष्ठान शामिल हैं। तसनीम के मुताबिक, शिराज़ में तीन पुलिसकर्मी मारे गए, जबकि तेहरान, क़ोम, खुज़ेस्तान, क़ज़वीन और उत्तर-पूर्वी प्रांतों में भी सुरक्षा बलों को जान-माल का नुकसान हुआ।
एसफ़रायेन शहर में एक स्थानीय अभियोजक और चार सुरक्षा कर्मियों की मौत की भी सूचना दी गई है। सरकारी मीडिया का दावा है कि हिंसा के पीछे विदेशी समर्थित तत्वों की साज़िश है।
अनिश्चित भविष्य और बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव
इंटरनेट बंदी के कारण ईरान से आने वाली सूचनाएं सीमित हैं, जिससे अलग-अलग दावों और प्रतिदावों के बीच सच्चाई को लेकर असमंजस बना हुआ है। एक ओर पश्चिमी देश और मानवाधिकार संगठन ईरान सरकार पर दबाव बना रहे हैं, तो दूसरी ओर तेहरान विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों के साथ सख़्त रुख अपनाए हुए है।
बढ़ती महंगाई, राजनीतिक असंतोष और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच ईरान एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा नजर आता है। मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यह संकट जल्द खत्म होने वाला नहीं है और इसके परिणाम ईरान की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ क्षेत्रीय स्थिरता पर भी गहरा असर डाल सकते हैं।
