Last Updated on September 29, 2025 11:28 pm by INDIAN AWAAZ

आर. सूर्यमोर्ती

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) की एक शोध टीम ने ऐसा सिफ़ोन-संचालित थर्मल डीसैलीनेशन सिस्टम विकसित किया है, जो समुद्री पानी को तेज़ और सस्ता तरीके से मीठे पानी में बदल सकता है। यह उपलब्धि जर्नल ऑफ़ डीसैलीनेशन में प्रकाशित हुई है और इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का समर्थन मिला है। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह तकनीक सौर डीसैलीनेशन से जुड़ी दो पुरानी समस्याओं – नमक की परत जमना और कैपिलरी सिस्टम की सीमित क्षमता – को हल कर सकती है।


कैसे काम करता है यह सिस्टम?

इस प्रणाली का केंद्र है एक कंपोज़िट सिफ़ोन, जो कपड़े और नालीदार धातु (grooved metal) से बना है। यह लगातार जलाशय से समुद्री पानी खींचता रहता है।

  • पानी गुरुत्वाकर्षण के कारण बहता है और साथ ही नमक के क्रिस्टल बनने से पहले ही बहाव में बह जाते हैं।
  • पानी गर्म सतह पर वाष्पित होता है और एक दो मिलीमीटर चौड़े एयर गैप में संघनित होकर मीठा पानी बनाता है।

यह तकनीक धूप में प्रति वर्ग मीटर 6 लीटर से अधिक मीठा पानी प्रति घंटा उपलब्ध करा सकती है, जो पारंपरिक सौर डीसैलीनेशन प्रणालियों से कई गुना अधिक है।


नमक और खारे पानी से निपटने की क्षमता

टीम का कहना है कि यह उपकरण 20% तक के ब्राइन (खारा अपशिष्ट पानी) को भी बिना जाम हुए शुद्ध कर सकता है। इसके निर्माण में एल्यूमीनियम शीट्स और कपड़े जैसे कम लागत वाले पदार्थों का इस्तेमाल हुआ है। इसे सौर ऊर्जा या औद्योगिक अपशिष्ट ऊष्मा दोनों से चलाया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने इसे “सरलता, टिकाऊपन और स्केलेबिलिटी” का उदाहरण बताया है। उनका मानना है कि यह तकनीक पानी की किल्लत झेल रहे तटीय गांवों, द्वीप समुदायों और आपदा-प्रभावित क्षेत्रों में बहुत उपयोगी हो सकती है।


विशेषज्ञों की सावधानियाँ

हालाँकि, जल प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रयोगशाला की सफलता हमेशा वास्तविक दुनिया में लागू नहीं होती

चेन्नई स्थित एक स्वतंत्र जल तकनीक सलाहकार ने कहा :
“प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के आँकड़े अक्सर आकर्षक लगते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर इन्हें लागू करने में टिकाऊपन, रखरखाव और लागत वसूली जैसी चुनौतियाँ आती हैं। लंबे समय तक धूप, नमक और नमी के संपर्क में आने से सामग्री खराब हो सकती है।”

एक वैश्विक जल नीति शोध संगठन के वैज्ञानिक ने ऊर्जा संबंधी पहलुओं पर चेतावनी दी :
“भले ही सौर ऊर्जा का इस्तेमाल हो, डीसैलीनेशन के लिए पर्याप्त ऊष्मा चाहिए। बादल छाए रहने या मौसम में बदलाव होने पर प्रदर्शन स्थिर रखना कठिन हो सकता है।”


affordability पर सवाल

हालाँकि यह तकनीक सस्ते घटकों पर आधारित है, लेकिन इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि –

  • बड़े पैमाने पर उत्पादन कितना किफ़ायती होगा,
  • वितरण और रखरखाव कैसे किया जाएगा,
  • और ग्रामीण तथा निम्न आय वाले समुदायों के लिए यह कितना सुलभ रहेगा।

दक्षिण एशिया में सुरक्षित जल उपलब्ध कराने वाले एक गैर-लाभकारी संगठन के अधिकारी ने कहा :
“लैब में बना एक प्रोटोटाइप उस प्रणाली जैसा नहीं है, जिसे आम लोग खरीद सकें, चला सकें और मरम्मत कर सकें।”


वैश्विक परिप्रेक्ष्य

आज भी बड़े पैमाने के डीसैलीनेशन संयंत्र मुख्यतः फॉसिल फ्यूल्स पर चलते हैं और अत्यधिक ऊर्जा खपत करते हैं। भारत का ज़ोर विकेंद्रीकृत और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित सिस्टम पर है, जो पानी की कमी से जूझ रहे समुदायों की मदद कर सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि नई तकनीकों को वास्तविक परिस्थितियों में कठोर परीक्षण से गुजरना चाहिए, ताकि उनकी व्यवहार्यता सिद्ध हो सके।


आईआईएससी का यह नवाचार दिखाता है कि भारत कम लागत वाली जल प्रौद्योगिकी में अपनी भूमिका को मज़बूत कर रहा है। यदि यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर ज़मीनी स्तर पर सफल होती है, तो यह समुद्र को लाखों लोगों के लिए एक भरोसेमंद पेयजल स्रोत में बदल सकती है।