प्रवीण कुमार

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7 अक्टूबर 2023 की तारीख. इजराइल की नींद रॉकेट के भयानक धमाके, गोलियों की तड़तड़ाहट और सायरन की डराने वाली आवाजों से खुली. 20 मिनट में करीब 5 हजार रॉकेट गाजा पट्टी से इजराइली शहरों की तरफ दागे गए। रॉकेटों का हमला ऐसा कि इसे रोकने के लिए बना इजराइल का आयरन डोम भी पुत्तू साबित हुआ.

यहां तक कि इजराइल की मशहूर खुफिया एजेंसी मोसाद को भी इस हमले की कोई भनक तक नहीं लगी. कहते हैं कि गाजा और इजराइल के बीच की सीमा पर जबरदस्त बाड़बंदी है, जहां दीवारों के ऊपर कंटीले तार, कैमरे और ग्राउंड मोशन सेंसर तक लगे हैं और सेना की लगातार गश्त भी होती है, लेकिन 7 अक्टूबर की सुबह इस बाड़बंदी को भी बुलडोजर से कैसे ढहा दिया गया और तारों को काट दिया गया, कोई बता पाने की स्थिति में नहीं है. जमीन के रास्ते पिक-अप ट्रक, कार और बाइक से, समंदर के रास्ते स्पीड बोट से और आसमान के रास्ते पैराग्लाइडर के सहारे हमासी लड़ाके इजराइल में घुस गए. इजराइली सैनिकों को मारा, आम नागरिकों का कत्लेआम किया, महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाया और कई लोगों को पकड़कर गाजा ले गए. और ये सब कट्टरपंथी संगठन हमास के लड़ाकों ने किया. वही हमास जिसे कभी इजराइल ने पाल पोस कर बड़ा और खड़ा किया था. तो फिर ऐसा क्या हो गया कि हमास अब इजराइल का नामोनिशान मिटा देना चाहता है? हमास को बलि का बकरा बनाकर आखिर कौन अपना हित साध रहा है? आखिर आगे का रास्ता किस ओर जा रहा है?

100 साल का है विवादों का सफर

मौजूदा कहानी की शुरूआत 20वीं सदी से होती है जब यूरोप में यहूदियों को निशाना बनाया जा रहा था. भूमध्यसागर और जॉर्डन नदी के बीच एक इलाका था फिलिस्तीन. ये मुसलमान, यहूदी और ईसाई तीनों धर्मों के लिए पवित्र जगह मानी जाती थी. यूरोप के सताए यहूदी यहां बड़ी संख्या में आकर बसने लगे. उस वक्त फिलिस्तीन की स्थानीय मुस्लिम आबादी ने इसका विरोध शुरू किया. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर यहूदियों का नरसंहार हुआ जिससे यहूदियों के लिए अलग देश की मांग जोर पकड़ने लगी. उस वक्त फिलिस्तीन के इलाके पर ब्रिटेन का नियंत्रण था. तय हुआ कि इस इलाके को फिलिस्तीनियों और यहूदियों में बांट दिया जाए. 14 मई 1948 को फिलिस्तीन में मौजूद यहूदी नेताओं ने एक नए देश इजराइल की घोषणा कर दी. बस फिर क्या था. इजराइल बनने के अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और इराक ने इजराइल पर हमला कर दिया. इसे यहूदियों का स्वतंत्रता संग्राम भी कहते हैं. इजराइली फोर्सेज ने तब करीब 7.50 लाख फिलिस्तीनियों को बेदखल कर दिया था और उन्हें पड़ोसी देशों में पनाह लेनी पड़ी. इस जंग के बाद फिलिस्तीन का ज्यादातर हिस्सा इजराइल के कब्जे में आ गया.

पूरे विवाद की जड़ में जेरुसलम कैसे?

दरअसल, 1948 की जंग में फिलिस्‍तीन का बड़ा हिस्‍सा इजराइल के कब्‍जे में आ चुका था. 1949 में एक आर्मीस्‍टाइस लाइन खींची गई, जिसमें फिलिस्‍तीन के दो क्षेत्र बने- वेस्‍ट बैंक और गाजा. गाजा को गाजा पट्टी भी कहा जाता है और यहां करीब 20 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं. वहीं वेस्ट बैंक इजराइल के पूर्व में स्थित है, जहां करीब 30 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम, अरब हैं. वेस्ट बैंक में कई यहूदी पवित्र स्थल हैं, जहां हर साल हजारों तीर्थयात्री आते हैं. एक तरह से जेरूसलम को दो हिस्सों में बांटा गया. पश्चिमी हिस्सा इजराइल के कंट्रोल में और पूर्वी हिस्सा फिलिस्तीन के कंट्रोल में और यरुशलम शहर को दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजधानी बताने और जता रहे हैं. मतलब यह कि जेरुसलम विवादित क्षेत्रों के केंद्र में है, जिसको लेकर दोनों देशों के बीच शुरू से ही ठनी हुई है. इजराइली यहूदी और फिलिस्तीनी अरब, दोनों की पहचान, संस्‍कृति और इतिहास जेरुसलम से जुड़ी हुई है. दोनों ही इस पर अपना दावा जताते हैं. यहां की अल-अक्‍सा मस्जिद, जिसे यूनेस्‍को ने विश्व धरोहर घोषित कर रखा है, दोनों के लिए बेहद अहम और पवित्र है. इस पवित्र स्‍थल को यहूदी ‘टेंपल माउंट’ बताते हैं, जबकि मुसलमानों के लिए ये ‘अल-हराम अल शरीफ’ है. यहां मौजूद ‘डोम ऑफ द रॉक’ को यहूदी धर्म में सबसे पवित्र धर्म स्थल कहा गया है, लेकिन इससे पैगंबर मोहम्मद का जुड़ाव होने के कारण मुसलमान भी इसे उतना ही अपना मानते हैं. इस परिसर का मैनेजमेंट जॉर्डन का वक्फ करता है, लेकिन सुरक्षा इंतजामों पर इजराइल का अधिकार है. अल-अक्सा मस्जिद परिसर को लेकर लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद होता आ रहा है. दो साल पहले 2021 में यहां 11 दिनों तक खूनी संघर्ष चला था, जिसमें कई जानें गई थीं. कहते हैं कि यहां मुस्लिम नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन गैर-मुस्लिमों को यहां किसी तरह की इबादत करने पर पाबंदी लगी है. पिछले दिनों यहूदी फसल उत्‍सव ‘सुक्‍कोट’ के दौरान यहूदियों और इजराइली कार्यकर्ताओं ने यहां का दौरा किया था तो हमास ने इसकी निंदा की थी. हमास का आरोप था कि यहूदियों ने यथास्थिति समझौते का उल्‍लंघन कर यहां प्रार्थना की थी.

हमास का जन्म: कब क्यों और कैसे?

1970 के दशक में फिलिस्‍तीन ने अपने हक के लिए आवाजें उठानी शुरू की. यासिर अराफात की अगुवाई वाले ‘फतह’ जैसे संगठनों ने फिलिस्‍तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) बनाकर इसका नेतृत्‍व किया. इजरायल पर हमले भी किए. करीब 2 दशक तक रह-रह कर लड़ाइयां चलती रहीं. 1993 में PLO और इजरायल के बीच ओस्‍लो शांति समझौता हुआ. दोनों ने एक-दूसरे से शांति का वादा किया. इस बीच 1987 में फिलिस्तीनी विद्रोह के दौरान हमास यानी हरकत अल-मुकावामा अल-इस्‍लामिया का उभार हुआ. इसकी स्‍थापना शेख अहमद यासीन ने की जो 12 साल की उम्र से ही व्‍हील चेयर पर रहा. एक साल बाद हमास ने अपना चार्टर पब्लिश किया, जिसमें इजरायल को मिटाकर फिलिस्‍तीन में एक इस्‍लामी समाज की स्‍थापना की कसम खाई. आखिर हमास ने इजराइल को लेकर इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया? जबकि हमास के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि इजराइल को जब लगा कि कूटनीतिक स्तर पर वह फिलिस्तीन की फतह के सामने कमजोर पड़ रहा है, तो उसने 1987 में हरकत अल-मुकवामा अल-इस्लामिया यानी हमास को उदारवादी फिलिस्तीन नेताओं के विरोध में खड़ा कर दिया था. तब फंडिंग भी की गई थी. इजराइल के एक पूर्व जनरल यित्जाक सेजेव का बाद में एक बयान भी आया था जिसमें उन्होंने कहा था, ”जहर से जहर मारने की यह नीति इजराइल की एक ऐतिहासिक गलती थी. इजराइली सरकार ने हमास के लिए बजट भी दिया था जिसका अफसोस हमें आज भी है.” दरअसल, 1993 में पीएलओ नेता यासिर अराफात और इजराइल के प्रधानमंत्री यित्जाक रॉबिन ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए जिसे ओस्लो शांति समझौता कहते हैं. इसके तहत पीएलओ ने हिंसा और चरमपंथ का रास्ता छोड़ने का वादा किया. इजराइल ने भी शांति का वादा किया. इसी समझौते के बाद फिलिस्तीन नेशनल अथॉरिटी का गठन हुआ जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीनी लोगों की नुमाइंदगी करता है. लेकिन हमास को ये समझौता रास नहीं आया और वह इजराइल के खिलाफ अपनी गतिविधियों को अंजाम देने लगा. बस फिर क्या था. 1997 में अमेरिका ने हमास को आतंकी संगठन घोषित कर दिया, जिसे ब्रिटेन और अन्‍य देशों ने भी स्‍वीकृति दी. 2000 के दशक की शुरुआत में दूसरे इंतिफादा (विद्रोह) के दौरान हमास का आंदोलन हिंसक रूप में सामने आया और फिर वह इसी रूप में बढ़ता चला गया. साल 2005 में इजराइल ने गाजा पट्टी पर अपना कब्जा छोड़ दिया जिसके बाद गाजा पट्टी हमास के कंट्रोल में आ गया. इसके उलट वेस्ट बैंक पर फिलिस्तीनी नेशनल अथॉरिटी का शासन है.

आखिर हमास को कौन करता है फंडिंग?

हमास के पीछे कौन की बात हम आगे करेंगे. पहले इसके स्ट्रक्चर की बात कर लेते हैं. इसमें एक पोलित ब्यूरो है. 15 सदस्यों की इस बॉडी के मुखिया हैं इस्माइल हानियेह. शूरा काउंसिल नाम की सुझाव देने वाली बॉडी इस पोलित ब्यूरो को चुनती है. हमास की अपनी सरकार भी है जिसके पीएम हैं इसाम अल दालिस. मंत्रालय, लोकल अथॉरिटीज और सिक्योरिटी फोर्सेस पर पीएम का नियंत्रण होता है. हमास की राजनीतिक कमान फिलहार इस्माइल हानियेह के हाथों में है जिसे वह कतर की राजधानी दोहा से ऑपरेट करते हैं. कहा जाता है कि हमास के कुछ लोग तुर्की से भी काम करते हैं. गाजा में रोजाना के मामलों की देखरेख इजराइल की जेलों में 22 साल बिताने वाले याह्या सिनवर करते हैं जो पहले हमास के मिलिट्री विंग के चीफ थे. हमास की मिलिट्री विंग की कमान मारवान इसा और मोहम्मद दर्इफ के पास है. इस मिलिशिया के फाउंडर सालेह सेहादेह को इजराइली सेना ने 2002 में मार गिराया था. 2004 में इजराइल ने हमास के संस्थापक यासीन को मार दिया. सलेह अल-अरूरी फिलहाल हमास की लेबनान ब्रांच और वेस्ट बैंक की लीडरशिप संभालते हैं. मेशाल के पास डायस्पोरा ऑफिस और सलामेह कटवी को कैद में हमास के सदस्यों के मामलों के लिए चुना गया है.

जहां तक हमास को मिलने वाली फंडिंग की बात है तो चूंकि अमेरिका और यूरोप ने हमास को एक आतंकी संगठन घोषित किया है इसलिए इसे उस तरह से आधिकारिक फंडिंग नहीं मिलती जैसे वेस्ट बैंक में पीएलए को मिलती है. लेकिन फिलिस्तीनी प्रवासियों और फारस की खाड़ी के प्राइवेट दानदाताओं ने इस उग्रवादी आंदोलन को ज्यादातर फंडिंग की है. कुछ इस्लामिक चैरिटी ने हमास समर्थित ग्रुप्स को पैसा दिया है. इस वक्त हमास के सबसे बड़े मददगारों में ईरान शामिल है. वह पैसा, हथियार और ट्रेनिंग सब दे रहा है. एक अनुमान के मुताबिक, ईरान हमास को सालान करीब 100 मिलियन डॉलर यानी करीब 830 करोड़ रुपये की मदद देता है. तुर्की केवल राजनीतिक रूप से हमास का समर्थन करने की बात करता है लेकिन उस पर भी हमास के उग्रवादी गतिविधियों को फंडिंग करने का आरोप लगाया जाता है. हमास शरिया कानूनों के हिसाब से सरकार चलाता है और उसके कानून बेहद कठोर हैं. यहां महिलाओं के पहनावे से लेकर लिंग भेद को बढ़ावा देने वाले कानून बनाए गए हैं. निगरानी समूह फ्रीडम हाउस के मुताबिक सरकार की फंडिंग और संचालन को लेकर हमास के पास कोई प्रभावी सिस्टम नहीं है. हमास इजराइल का मुकाबला हथियारों से करने की बात करता है और इस तरीके को गाजा के लोगों का भी समर्थन उसे हासिल है. 2006 में हमास ने इजराइल के एक सैनिक गिलाद शलित को किडनैप कर लिया था. इसके बदले में इजराइल को एक हजार फिलिस्तीनी कैदी छोड़ने पड़े थे. 2021 में हमास ने इजराइल पर करीब 4000 राकेट दागे थे. इसके बाद इजराइल ने भी पलटवार किया था और करीब 11 दिनों तक कार्रवाई चली थी. एक बार फिर 7 अक्टूबर को हमास ने इजराइल पर 5000 से ज्यादा रॉकेट दागे और कई तरफ से हमला करने के बाद इजराइल-हमास के बीच जंग तेज हो गई है. मार-काट जारी है. गाजा पट्टी को इजराइल ने तबाह कर दिया है, लेकिन अभी भी हमासी लड़ाके हार मानने को राजी नहीं हैं. तो ऐसे में आखिरी सवाल कि आखिर हमास चाहता क्या है? और आगे का रास्ता किस तरफ जाता है?

हमास की ख्वाहिशें और आगे का रास्ता क्या?

असल में इजरायल को खत्‍म कर हमास नया फिलिस्‍तीन बनाना चाहता है. वह इस पूरे इलाके को फिली‍स्‍तीन घोषित कर यहां इस्‍लामी साम्राज्‍य की स्‍थापना करना चाहता है. लेकिन दूसरी ओर इजरायल ने ताजा हमले के बाद हमास को पूरी तरह से खत्‍म करने का संकल्‍प लिया है. संयुक्त सशस्त्र सेना इजरायल रक्षा बल (IDF) के जवान जवाबी कार्रवाई में लगे हैं. लेकिन इस सच को कौन नकार सकता है कि इजरायल और फिलिस्‍तीनी चरमपंथी संगठन हमास के बीच छिड़े इस युद्ध में विजेता तो कोई एक ही होगा. जानकारों की माने तो वह न तो इजरायल होगा और न ही हमास. कई विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल पर अचानक हुए हमले में ईरान की बड़ी भूमिका हो सकती है. ईरान के नेताओं की हमास के समर्थन में प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं. तो विशेषज्ञों का दावा है कि हालिया जंग के पीछे ईरान है और वह अपने मंसूबे में कामयाब भी होता दिख रहा है.

डेनवर यूनिवर्सिटी के कोरबेल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में रिसर्चर एरोन पिलकिंगटन ने अपने आर्टिकल में लिखा है, ‘मध्य पूर्व की राजनीति और सुरक्षा के एक विश्लेषक के रूप में मेरा मानना ​​है कि दोनों पक्षों के हजारों लोग पीड़ित होंगे. लेकिन जब धुआं शांत हो जाएगा, तो केवल एक ही देश के हित पूरे होंगे और वो देश है ईरान.’ कहने का मतलब यह कि युद्ध के कम से कम दो संभावित परिणाम हो सकते हैं और ये दोनों ईरान के पक्ष में हैं. पहला- इजरायल की कठोर प्रतिक्रिया सऊदी अरब और अन्य अरब देशों को अमेरिका समर्थित प्रयासों से अलग कर सकती है. और दूसरा- अगर इजरायल खतरे को खत्म करने के लिए गाजा में आगे बढ़ना जरूरी समझता है तो इससे पूर्वी यरुशलम या वेस्ट बैंक में एक और फिलिस्‍तीनी विद्रोह भड़क सकता है, जिससे इजरायल में अस्थिरता बढ़ेगी.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)