Last Updated on March 25, 2026 12:53 am by INDIAN AWAAZ

अंदलीब अख्तर
नई दिल्ली: भारत ने तपेदिक (Tuberculosis) के खिलाफ जंग में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया का पहला ऐसा वैज्ञानिक अध्ययन (Clinical Study) शुरू किया है, जो टीबी के मानक इलाज (Standard ATT) के साथ आयुर्वेद की प्रभावशीलता की जांच करेगा।
इस ऐतिहासिक पहल की घोषणा करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि टीबी एक ऐसी गंभीर चुनौती है जिसे केवल सरकार या चिकित्सा समुदाय अकेले हल नहीं कर सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए समाज, परिवारों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की सामूहिक भागीदारी अनिवार्य है।
आयुष मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की अनूठी पहल
यह अध्ययन आयुष मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के बीच एक साझा प्रयास है। इस शोध के माध्यम से यह देखा जाएगा कि आयुर्वेद किस तरह टीबी के मरीजों के उपचार में एक ‘सहायक थेरेपी’ (Supportive Therapy) के रूप में काम कर सकता है। डॉ. सिंह ने बताया कि इस शोध के परिणामों को बाद में जीनोमिक अनुसंधान (Genomic Research) के साथ भी जोड़ा जा सकता है, ताकि टीबी के इलाज को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाया जा सके।
सिर्फ संक्रमण का अंत नहीं, पूर्ण स्वास्थ्य है लक्ष्य
इस अवसर पर केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि टीबी का उपचार केवल संक्रमण को खत्म करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मरीज की पूरी रिकवरी सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य मरीज को सिर्फ दवा देना नहीं, बल्कि बेहतर पोषण, तेज रिकवरी और आयुर्वेद के माध्यम से उनके जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) में सुधार करना है।”
प्रमुख बिंदु:
- विश्व में पहली बार: आयुर्वेद को आधुनिक टीबी उपचार के साथ जोड़कर वैज्ञानिक स्तर पर परखा जा रहा है।
- बहुआयामी दृष्टिकोण: संस्थागत सीमाओं से ऊपर उठकर पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों का मिलन।
- सामाजिक भागीदारी: डॉ. जितेंद्र सिंह ने टीबी मुक्त भारत के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और परिवारों की सक्रियता को महत्वपूर्ण बताया।
यह कदम भारत के ‘टीबी मुक्त भारत’ अभियान को नई दिशा देने वाला साबित होगा, जहाँ प्राचीन आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान एक साथ मिलकर काम करेंगे।
