Last Updated on March 27, 2026 12:02 am by INDIAN AWAAZ

Aafreen Hussain
जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 करीब आ रहा है, राज्य की राजनीति में एक सवाल लगातार गूंज रहा है—आखिर असल में मजबूत स्थिति किसकी है? क्या सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अभी भी अपनी नेता ममता बनर्जी की लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत के सहारे बढ़त बनाए हुए है? क्या भारतीय जनता पार्टी अपनी बदली हुई स्थानीय रणनीति के साथ बंगाल में फिर से मजबूत चुनौती देने की कोशिश कर रही है? या फिर विपक्ष इतना बिखरा हुआ है कि उसकी कमजोरी ही सत्तारूढ़ दल के लिए लाभदायक साबित हो रही है?
हाल की राजनीतिक गतिविधियों से यह साफ है कि मुकाबला जरूर कड़ा है, लेकिन राजनीतिक संतुलन अभी भी कुछ प्रमुख खिलाड़ियों के इर्द-गिर्द ही घूमता नजर आता है। सत्ता विरोधी माहौल की चर्चा के बावजूद तृणमूल कांग्रेस अभी भी राज्य-भर में सबसे मजबूत संगठनात्मक ढांचा रखने वाली पार्टी दिखती है। पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन में पीढ़ीगत बदलाव की कोशिश की है, युवा चेहरों को आगे लाया है और अपनी छवि को नया रूप देने का प्रयास किया है, जबकि नेतृत्व का केंद्र अभी भी ममता बनर्जी ही हैं।
इस चुनाव को और दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी स्वयं भवानीपुर सीट से एक हाई-प्रोफाइल मुकाबले में उतर रही हैं, जहां उनका सामना भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी से बताया जा रहा है। इससे चुनाव का स्वरूप और अधिक व्यक्तित्व-केंद्रित दिखाई देने लगा है। ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है—अगर तृणमूल कांग्रेस वास्तव में इतनी कमजोर हो चुकी है, तो विपक्ष की लगभग हर रणनीति ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है?
दूसरी ओर भाजपा खुद को मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के रूप में पेश कर रही है, लेकिन उसे दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है—एक तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ और दूसरी अपनी पिछली रणनीतियों के बोझ से। पहले पार्टी पर बाहरी नेताओं और शीर्ष-स्तरीय प्रचार पर अधिक निर्भर रहने के आरोप लगे थे। अब खबरें हैं कि भाजपा स्थानीय नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को ज्यादा महत्व देने की कोशिश कर रही है। यह रणनीति व्यावहारिक लग सकती है, लेकिन इससे एक और सवाल पैदा होता है—अगर भाजपा वर्षों से बंगाल में सत्ता के करीब होने का दावा करती रही है, तो वह अब भी “नई रणनीति” की बात क्यों कर रही है?
इधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) लगातार भाजपा और तृणमूल दोनों के खिलाफ राजनीतिक बयान दे रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या उनके पास बूथ स्तर पर उतनी ताकत बची है कि वे अपने राजनीतिक संदेश को सीटों में बदल सकें? कुछ शहरी वर्ग, छात्र और पारंपरिक वाम समर्थक अभी भी उनके साथ दिखाई देते हैं, लेकिन क्या वे वास्तव में चुनावी मुकाबले को दिशा दे रहे हैं, या केवल टिप्पणी कर रहे हैं?
चुनावी माहौल में एक और महत्वपूर्ण पहलू प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था का है। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले, केंद्रीय बलों की तैनाती और चुनावी निगरानी की सख्त व्यवस्था यह दिखाती है कि बंगाल अब भी एक अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक मैदान बना हुआ है। इससे एक और प्रश्न उठता है—लगातार टकराव और ध्रुवीकरण का यह माहौल आखिर किसके लिए ज्यादा फायदेमंद है: मतदाताओं के लिए या उन राजनीतिक दलों के लिए जो इसी माहौल में अपनी राजनीति मजबूत करते हैं?
मौजूदा हालात में देखा जाए तो संगठनात्मक ताकत के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस अभी भी सबसे मजबूत दिखाई देती है, जबकि भाजपा ही वह विपक्षी दल है जो राज्य के बड़े हिस्सों में उसे गंभीर चुनौती दे सकता है। कांग्रेस और वाम दल कुछ क्षेत्रों में प्रभाव डाल सकते हैं, लेकिन फिलहाल उनके पास उतनी राज्यव्यापी गति नजर नहीं आती जितनी शीर्ष दो दलों के पास है।
यही इस चुनाव की सबसे बड़ी विडंबना भी है—क्या बंगाल वास्तव में बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रहा है, या फिर यह वही पुरानी लड़ाई है जिसमें छोटे दल भाषण देते रह जाते हैं और असली राजनीतिक टकराव तृणमूल और भाजपा के बीच ही होता है?
राजनीतिक दृष्टि से फिलहाल तस्वीर अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देती है। संरचनात्मक रूप से तृणमूल कांग्रेस सबसे मजबूत है। चुनौती देने वालों में भाजपा सबसे आगे है। कांग्रेस और वाम दल विचारधारात्मक बहस में अधिक सक्रिय हैं, लेकिन चुनावी गति के मामले में पीछे दिखाई देते हैं। ऐसे में अंतिम सवाल यही उठता है—अगर विपक्ष को सचमुच लगता है कि ममता बनर्जी कमजोर हो चुकी हैं, तो फिर वह अब भी इतना बिखरा हुआ और प्रतिक्रियात्मक क्यों दिखता है?
क्योंकि चुनावों में नाराजगी सुर्खियां जरूर बनाती है, लेकिन बूथ जीतने के लिए संगठन चाहिए। और बंगाल की राजनीति में इतिहास अभी भी बूथों पर ही तय होता है।
