Last Updated on April 12, 2026 1:15 pm by INDIAN AWAAZ

इस्लामाबाद में हुई यह लंबी वार्ता भले ही किसी समझौते पर खत्म नहीं हुई, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच मतभेद गहरे हैं। अब सबकी नजरें ईरान की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि आगे बातचीत किस दिशा में जाएगी।

AMN / WEB DESK

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली लंबी वार्ता बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हो गई। दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन परमाणु कार्यक्रम को लेकर मतभेद दूर नहीं हो सके।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने वार्ता के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बातचीत “सार्थक” रही, लेकिन किसी समझौते तक नहीं पहुंचा जा सका। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका की मुख्य मांग यह थी कि ईरान दीर्घकालिक और स्पष्ट रूप से यह प्रतिबद्धता दे कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही ऐसी क्षमता हासिल करेगा जिससे वह तेजी से परमाणु हथियार बना सके।

अमेरिका की ‘अंतिम पेशकश’

वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपनी “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ पेशकश” ईरान के सामने रख दी है और अब वह तेहरान के जवाब का इंतजार कर रहा है। उन्होंने कहा,
“हमने अपनी लाल रेखाएं स्पष्ट कर दी हैं—किन बातों पर हम समझौता कर सकते हैं और किन पर नहीं। लेकिन ईरान ने हमारे प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।”

उन्होंने यह भी कहा कि यह गतिरोध अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

पाकिस्तान की भूमिका की सराहना

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल मुनिर की मेजबानी की सराहना करते हुए कहा कि वार्ता में जो भी कमी रही, वह पाकिस्तान की वजह से नहीं थी। “पाकिस्तान ने दोनों पक्षों के बीच दूरी कम करने के लिए शानदार प्रयास किए,” उन्होंने कहा।

परमाणु मुद्दा बना सबसे बड़ा विवाद

वेंस ने बताया कि अमेरिका की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान न केवल अभी बल्कि भविष्य में भी परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में कोई कदम न उठाए।
उन्होंने कहा, “हम एक ठोस और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता चाहते हैं, जो हमें अभी तक नहीं मिली है।”

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ईरान की परमाणु संवर्धन सुविधाएं पहले ही काफी हद तक नष्ट हो चुकी हैं, लेकिन भरोसे की कमी अभी भी बनी हुई है।

ईरान का पक्ष: कुछ सहमति, लेकिन बड़े मतभेद

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने कहा कि कुछ मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन 2-3 महत्वपूर्ण विषयों पर मतभेद कायम रहे। उन्होंने बताया कि यह वार्ता पिछले एक वर्ष की सबसे लंबी वार्ता थी, जो लगभग 24-25 घंटे तक चली। बकाई ने कहा,
“वार्ता ऐसे माहौल में हुई जहां अविश्वास और संदेह का माहौल था, इसलिए एक ही बैठक में समझौते की उम्मीद नहीं थी।”

कई जटिल मुद्दों पर चर्चा

ईरानी पक्ष के अनुसार, बातचीत में परमाणु कार्यक्रम के अलावा कई अन्य जटिल मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जिनमें शामिल हैं:

  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य
  • आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना
  • युद्ध क्षतिपूर्ति
  • क्षेत्रीय संघर्ष का अंत

बकाई ने कहा कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका “अच्छी नीयत” से आगे बढ़े और ईरान के वैध अधिकारों को स्वीकार करे।

‘एक बैठक में समझौते की उम्मीद नहीं’

ईरानी प्रवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि इतनी जटिल समस्याओं का समाधान एक ही दौर की बातचीत में संभव नहीं है। उन्होंने कहा, “किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि एक ही बैठक में समझौता हो जाएगा।”

हालांकि वार्ता बेनतीजा रही, दोनों पक्षों ने संकेत दिए हैं कि संवाद की प्रक्रिया जारी रहेगी। बकाई ने कहा कि कूटनीति राष्ट्रीय हितों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और इसे जारी रखा जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच यह गतिरोध पश्चिम एशिया में तनाव को और बढ़ा सकता है, खासकर ऐसे समय में जब हालिया संघर्षों के बाद क्षेत्र में पहले से ही अस्थिरता बनी हुई है।

इस्लामाबाद में हुई यह लंबी वार्ता भले ही किसी समझौते पर खत्म नहीं हुई, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच मतभेद गहरे हैं। अब सबकी नजरें ईरान की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि आगे बातचीत किस दिशा में जाएगी।