Last Updated on March 25, 2026 4:16 pm by INDIAN AWAAZ

प्रवीण कुमार
बिहार की सियासत में हाल के दिनों में तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janata Dal) को लेकर कई तरह की अफवाहें सियासी हवाओं में तैर रही हैं। इफ्तार पार्टी जैसे परंपरागत आयोजन का 36 वर्षों के इतिहास में पहली बार न होना, विधानसभा चुनाव में हार के बाद नेतृत्व की चुप्पी और इंडिया ब्लॉक का घटक होने के बावजूद केरल जैसे दक्षिणी राज्य में चुनाव लड़ने की तैयारी- ये सभी घटनाएं मिलकर एक जटिल राजनीतिक तस्वीर पेश करती हैं। स्वाभाविक सी बात है कि इन घटनाओं को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म हो चला है कि तेजस्वी अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कहीं मोदी-शाह की बीजेपी से तो नहीं निर्देशित हो रहे हैं? हालांकि इसका कोई ठोस आधार सामने नहीं आया है, लिहाजा किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इनके व्यापक राजनीतिक संदर्भ को समझना जरूरी है।
सबसे पहले बात करते हैं इफ्तार पार्टी के आयोजन से जुड़े तथ्यों की। मालूम हो कि लालू यादव की आरजेडी के लिए यह सिर्फ एक सामाजिक या धार्मिक कार्यक्रम नहीं रहा है, बल्कि उसकी पारंपरिक “मुस्लिम-यादव (MY)” राजनीतिक धुरी का प्रतीक भी रहा है। ऐसे में इसका अचानक से बंद हो जाना कई तरह के संकेत देता है। इसे एक ओर राजनीतिक पुनर्संयोजन के रूप में देखा जा सकता है, जहां पार्टी अपनी छवि को एक विशेष सामाजिक समूह तक सीमित रहने से बाहर निकालकर व्यापक मतदाता आधार तक फैलाना चाहती है। दूसरी ओर, यह भी संभव है कि पार्टी ध्रुवीकरण की राजनीति से बचने के लिए उन प्रतीकों से दूरी बना रही हो, जिन्हें विरोधी दल “तुष्टिकरण” के रूप में प्रचारित करते रहे हैं।
हालिया विधानसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता न मिलना भी इस बदलाव की पृष्ठभूमि में एक अहम फैक्टर माना जा रहा है। चुनावी हार के बाद नेताओं का सार्वजनिक रूप से कम सक्रिय होना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। तेजस्वी की चुप्पी को यदि सतही तौर पर देखा जाए तो इसे नेतृत्व की निष्क्रियता या अनिश्चितता के रूप में व्याख्यायित कर सकते हैं। लेकिन एक दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि हो सकता है यह एक रणनीतिक विराम हो। एक ऐसा समय जब पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे, चुनावी रणनीति और जनसंपर्क के तौर-तरीकों का पुनर्मूल्यांकन कर रही हो।
इसी क्रम में केरल में चुनाव लड़ने की तैयारी को भी देखा जाना चाहिए। आरजेडी परंपरागत रूप से बिहार-केंद्रित पार्टी रही है और उसका प्रभाव क्षेत्र काफी सीमित रहा है। ऐसे में दक्षिण भारत के एक ऐसे राज्य में जहां इंडिया ब्लॉक की पार्टियां मसलन एलडीएफ हो या यूडीएफ, चुनाव में कदम रखने की योजना प्रथम दृष्टया असामान्य प्रतीत होती है। हालांकि इसे सिर्फ अवसरवाद कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। यह कदम पार्टी की राष्ट्रीय पहचान बनाने की आकांक्षा का संकेत भी हो सकता है। मालूम हो कि केरल में बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय, विशेषकर बिहारी प्रवासी मजदूर मौजूद हैं, जो एक संभावित राजनीतिक आधार बन सकते हैं। साथ ही, यह एक प्रयोग भी हो सकता है, जिसके माध्यम से पार्टी अपने संगठनात्मक विस्तार की संभावनाएं तलाश रही हो। हालांकि तेजस्वी यादव को यह भी मालूम होना चाहिए कि केरल की राजनीति पहले से ही लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे मजबूत गठबंधनों के बीच सघन प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र है, जहां किसी नए दल के लिए जगह बनाना आसान ही नहीं नामुमकिन है।
इन सभी घटनाक्रमों के बीच सबसे विवादास्पद सवाल यह उभरता है कि क्या यह सब कुछ किसी बड़े “राजनीतिक समझौते” की ओर तो इशारा नहीं कर रहा है। कुछ विश्लेषकों और राजनीतिक विरोधियों द्वारा यह आरोप लगाया जा रहा है कि तेजस्वी यादव ने अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के मामलों से राहत पाने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ अंदरखाने कोई समझौता कर लिया है और इस जोड़ी के इशारे पर तेजस्वी ने चुनाव बाद से चुप्पी साध रखी है, इफ्तार के पारंपरिक आयोजन से दूरी बना ली और केरल में बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव लड़ने पहुंच गए हों।
हालांकि, इस प्रकार के दावों को लेकर अब तक कोई ठोस और सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है। ऐसे भी भारतीय राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप एक सामान्य प्रक्रिया है और अक्सर राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या पूर्वाग्रहों के आधार पर की जाती है। यह भी सही है कि जांच एजेंसियों की सक्रियता और विपक्षी नेताओं पर बढ़ते दबाव ने ऐसे संदेहों को जन्म दिया है, लेकिन हर राजनीतिक निर्णय को किसी “गुप्त सौदे” से जोड़ देना उसके राजनीतिक विश्लेषण की गंभीरता को कम करता है।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह एक संक्रमण काल का संकेत देता है। लालू प्रसाद यादव के दौर में स्थापित मुस्लिम-यादव समीकरण ने आरजेडी को लंबे समय तक राजनीतिक मजबूती दी, लेकिन बदलते सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक माहौल में सिर्फ इस समीकरण के सहारे आगे बढ़ना मुश्किल होता जा रहा है। आज का मतदाता, खासकर युवा वर्ग रोजगार, विकास, शिक्षा और शासन की गुणवत्ता जैसे मुद्दों को अधिक प्राथमिकता देता है। ऐसे में तेजस्वी यादव के सामने चुनौती यह है कि वे पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखते हुए एक व्यापक और समावेशी राजनीतिक पटकथा तैयार करें।
इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतांत्रिक राजनीति में संकेतों का महत्व बड़ा होता है, लेकिन जब उसकी व्याख्या की जाती है तो इसमें संयम और तथ्यों का संतुलन जरूरी है। तेजस्वी यादव और आरजेडी के हालिया कदमों को फिलहाल एक व्यापक रणनीतिक पुनर्संरचना के रूप में ही देखना अधिक तर्कसम्मत होगा, न कि किसी अप्रमाणित राजनीतिक समझौते के रूप में। हालांकि राजनीति में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता है। लिहाजा आने वाले समय में तेजस्वी के राजनीतिक रुख, उनके वक्तव्यों और चुनावी प्रदर्शन से ही यह साफ हो पाएगा कि यह बदलाव अस्थायी है या किसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
