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अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में, ग़ाज़ा युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन.

UN Photo/Evan Schneider

अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में, ग़ाज़ा युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन.

संयुक्त राष्ट्र में मत व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर विशेष रैपोर्टेयर इरीन ख़ान ने कहा है कि ग़ाज़ा पर इसराइल के युद्ध के विरोध में पूरे अमेरिका में खड़े हुए आईवी लीग विश्वविद्यालयों के कुछ प्रमुख लोगों को बर्ख़ास्त करने व छात्रों पर कारर्वाई करने की घटनाओं से, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होते नज़र आ रहे हैं.

विशेष रैपोर्टेयर इरीन ख़ान ने कहा यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा है, “ग़ाज़ा संकट वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वैश्विक संकट बनता जा रहा है. आने वाले समय में इसका बहुत गम्भीर असर होने वाला है.”

ग़ाज़ा में जारी युद्ध का अन्त करने के लिए विश्व के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं. अक्टूबर (2023) में हमास द्वारा इसराइल पर किए गए हमले में 1200 लोग मारे गए, और हिरासत में लिए गए 250 लोगों में से 133 लोग अब भी ग़ाज़ा में बन्दी हैं. 

ग़ाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार अक्टूबर से ग़ाज़ा पट्टी में इसराइल की भीषण बमबारी में 34 हज़ार से अधिक फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं. यूएन एजेंसियों का कहना है कि ग़ाजा के भीतर राहत सामग्री ले जाने पर इसराइल द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, अब क्षेत्र में मानव रचित अकाल पड़ने के हालात बन गए हैं.  

इरीन ख़ान ने बताया कि अमेरिका में जिस तरह शैक्षणिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने का सिलसिला चल रहा है, उससे लोगों द्वारा जारी युद्ध व क़ब्ज़े का विरोध करने के अधिकार का हनन होता है. इसमें कोलम्बिया, हार्वर्ड व येल विश्वविद्यालय जैसे कुछ सर्वोत्कृष्ट व सम्भ्रान्त आईवी लीग कॉलेज शामिल हैं.

उन्होंने कहा, “एक के बाद एक आईवी लीग स्कूलों के प्रमुख लोगों को बर्ख़ास्त किया जा रहा है. इससे स्पष्ट तौर पर, मुद्दे पर राजनैतिक माहौल ‘वो’ और ‘हम’ में बँटकर, ध्रुवीकरण बढ़ता है.

मत व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर विशेष रैपोर्टेयर, इरीन ख़ान.

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राजनैतिक विचार व नफ़रत भरी भाषा के बीच अन्तर पर भ्रम

विरोध प्रदर्शनों में दोनों पक्षों की तरफ़ से बढ़ती नफ़रत भरी भाषा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि यह भी ज़रूरी है कि लोगों को अपने राजनैतिक विचार अभिव्यक्त करने की आज़ादी हो. 

इरीन ख़ान ने बताया कि कई विरोध प्रदर्शनों में तो इस बात को लेकर भ्रम की स्थिति थी कि नफ़रत भरी भाषा और हिंसा उकसाने व इसराइल की स्थिति व क़ब्ज़े या जिस तरह से वो इस युद्ध का संचालन कर रहा है, उसे लेकर भिन्न दृष्टिकोण में क्या अन्तर हैं.

उन्होंने कहा, “न्यायसंगत भाषा की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश अमेरिका में जो देखने को मिल रहा है, वो उन्माद है.” 

इसराइल की आलोचना “पूर्णत: वैध”

उन्होंने कहा कि यहूदी-विरोध व इस्लामोफ़ोबिया पर रोक लगानी चाहिए, और नफ़रत भरी भाषा अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करती है. 

उन्होंने कहा, “लेकिन उसे एक देश व राजनैतिक ईकाई के तौर पर इसराइल की आलोचना से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए. अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत इसराइल की आलोचना करना वैध होगा.”

उन्होने बताया कि विशेष रेपोर्टेयरों ने, पहले ही सोशल मीडिया पर फ़लस्तीन समर्थकों के ख़िलाफ़ व्याप्त पूर्वाग्रहों की पहचान कर ली थी. 

उन्होंने कहा, ”हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए.” 

विशेष रैपोर्टेयर इरीन ख़ान ने कहा कि यह मौलिक अधिकार, लोकतंत्र, विकास, संघर्षों के समाधान व दीर्घकालिक शान्ति स्थापना के लिए ज़रूरी है.”

उन्होंने कहा, “अगर हम राजनैतिक कारणों से इसका त्याग करके, मुद्दे का राजनैतिकरण करते हैं और, स्वतंत्रता के अधिकार को दरकिनार करते हैं.”

“शान्तिपूर्ण तरीक़े से सभा करने के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को कमज़ोर करने का प्रयास करते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि हम ऐसी ग़लती कर रहे हैं जिसका हमें ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा.”

विशेष रैपोर्टेयर और मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त अन्य विशेषज्ञ, संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते, और किसी भी सरकार या संस्थान का हिस्सा नहीं होते. वे अपनी व्यक्तिगत क्षमता में सेवा करते हैं और इसके लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र से कोई वित्तीय भुगतान नहीं किया जाता.

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