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इंडियन आवाज़     25 May 2024 04:26:29      انڈین آواز

‘मुल्ला मुलायम’ नहीं बनना चाहते अखिलेश यादव

(Last Updated On: )

शबीहुल हसन नकवी / लखनऊ!

akhilesh-new-sp-chiefमुसलमानों के मफादात में काम करने की वजह से उनकी संघी मुखालिफीन उन पर ‘मुल्ला मुलायम’ या ‘मौलाना’ कह कर तंज कसा करते थे। समाजवादी पार्टी पर कब्जा करने के बाद जब वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने 22 जनवरी को अपना एलक्शन मेनीफेस्टो जारी किया तो उसमें मुस्लिम मफादात गायब थे। इस बारे मंे कुछ लोगों ने तंज करते हुए कहा कि अखिलेश यादव अपने वालिद की तरह ‘मुल्ला’ या ‘मौलाना’ नहीं बनना चाहते। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि वह अपनी तस्वीर मुसलमानों की हिमायत वाली नहीं बनानाय चाहते ताकि कट्टर हिन्दू (यादव) वोटरों को समाजवादी पार्टी से दूर जाने से रोका जाए। लेकिन उनकी इस हरकत की वजह से मुसलमान उनसे दूर हो जाएगा जिसका खमियाजा उन्हें असम्बली एलक्शन के दौरान भुगतना पडे़गा।

पिछले असम्बली एलक्शन के दौरान समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों को 18 फीसद रिजर्वेशन देने का वादा किया था। चूंकि यह वादा तब मुलायम सिंह यादव ने किया था तो मुसलमानों ने उनपर एतबार किया और 39 से 45 फीसद मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी को मिले थे और पार्टी ने मुकम्मल अक्सरियत के साथ सूबे में सरकार बना ली थी। इसके बाद 2014 के एलक्शन मेनीफेस्टो में भी मुसलमानों को पीएसी और पुलिस मंेे 15 फीसद रिजर्वेशन देने का वादा किया था। मुसलमानों ने इस बार भी समाजवादी पार्टी को वोट दिया लेकिन समाजवादी पार्टी का ‘यादव’ वोट बीजेपी में चला गया। खबर है कि लोक सभा एलक्शन में मिली पार्टी को करारी शिकस्त के लिए जो जायजा (समीक्षा) मीटिंग हुई उसमें अखिलेश के रामगोपाल यादव जैसे कुछ मुस्लिम मुखालिफ लीडरों ने कहा कि चूंकि समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों की भलाई के प्रोग्रामों का इतना जोर-शोर से प्रचार किया कि ‘यादव’ वोट नाराज हो गया और बीजेपी में चला गया। इस तरह अखिलेश यादव को यह समझाया गया कि उनके वालिद की ‘मुल्ला’ या ‘मौलाना’ वाली तस्वीर (छवि) उनके (अखिलेश के) लिए नुक्सानदेह साबित हो सकती है। यही वजह थी कि मेनीफेस्टो जारी करते वक्त अखिलेश यादव ने मंच से मुसलमानों के लिए अलग से कोई वादा नहीं किया।

वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने मेनीफेस्टो जारी करते वक्त अपनी तकरीर में औरतों, लड़कियांे, स्टूडेंट्स, नौजवानों, गरीबों, किसानों और कारोबारियों तक यानि हर तबके का जिक्र किया लेकिन उनका सबसे मजबूत वोटर मुसलमान इस बार उनके मेनीफेस्टो और तकरीर दोनों जगह नदारद था। पिछली बार की तरह इस बार के मेनीफेस्टो में न तो मुस्लिम रिजर्वेशन की बात की गई थी न ही दहशतगर्दी के इल्जाम में पकड़े गए बेकसूर मुस्लिम नौजवानों की रिहाई का कोई वादा था। उर्दू तालीम या मदरसों को लेकर भी कोई वादा नहीं था। मुस्लिम नौजवानों के हुकूक की लड़ाई लड़ रही तंजीम रिहाई मंच ने अखिलेश पर मुस्लिम मुद्दों से पीछे हटने का इल्जाम लगाया है। जबकि सियासत के माहिरीन का कहना है कि अखिलेश अपने वालिद की ‘मुल्ला’ या ‘मौलाना’ की तस्वीर (छवि) से बाहर निकलना चाहते हैं और यह मैसेज देने की कोशिश में हैं कि समाजवादी पार्टी सभी की भलाई के लिए काम करेेगी। इस कोशिशा के फायदे और नुक्सान दोनों हैं। लेकिन यूपी एलक्शन के मद्देनजर नुक्सान ज्यादा नजर आ रहा है।

मेनीफेस्टो मेें मुसलमानों को तरजीह ने देेने का सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि मुस्लिम वोट उनके पास से छिटक कर बीएसपी के खेमे में जा सकते हैं। अभी तक समाजवादी पार्टीस की जीत के लिए मुस्लिम-यादव फार्मूला काम कर रहा था। जबकि बीएसपी सुप्रीमो की भी कोशिश है कि अगर दलितों के साथ वह मुस्लिम वोट हासिल करने में कामयाब रही तो 2007 का कारनामा फिर दोहरा सकती हैं। यही वजह है कि बीएसपी सुप्र्रीमो मायावती मुस्लिम तबके को मुसलसल यह पैगाम दे रही हैं कि उनके मफादात की हिफाजत सिर्फ बीएसपी कर सकती है। क्योंकि समाजवादी पार्टी अंदरूनी टकराव का शिकार है और अखिलेश पर मुस्लिम मुखालिफ होने का इल्जाम खुद मुलायम सिंह यादव लगा चुके हैं। जबकि बीएसपी मुसलमानों की हमदर्द है और उन्हें सियासत में बड़ी हिस्सेदारी देने के लिए तैयार है इसीलिए उसने सबसे ज्यादा 97 मुसलमानों को टिकट देकर एलक्शन मैदान में उतारा है। मेनीफेस्टो में मुसलमानों को नजरअंदाज करने के नतीजे में मुस्लिम वोट बीएसपी में जा सकते हैं। जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी को हार का भी सामना करना पड़ सकता है। जबकि मेनीफेस्टो में मुसलमानों को नजरअंदाज करने के पीछे सियासत के जानकार अखिलेश की दूरअंदेशी बता रहे हैं। उनका कहना है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद मुुस्लिम वोट पूरी तरह समाजवादी पार्टी से अलग नहीं होगा और यादव वोट मजबूती से जुड़ेगा साथ ही चूंकि अखिलेश की तस्वीर मुस्लिम परस्त सियासतदां की नहीं है तो बहुत मुमकिन है कि बीजेपी के नाराज वोटर समाजवादी पार्टी को वोट दे दें।

इसके अलावा अपनी तस्वीर मुस्लिम परस्त सियासतदां की ना बनाने के पीछे की एक वजह सियासी माहिरीन यह बता रहे हैं कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी को कौमी सतह पर मजबूत करने का इरादा रखते हैं। दरअस्ल मुलायम सिंह यादव हो या फिर लालू प्रसाद यादव, यह दोनों लीडर अपनी-अपनी रियासतों यानि उत्तर प्रदेश और बिहार में तो खासे मकबूल हैं मगर चूंकि इन दोनों लीडरान पर मुस्लिमपरस्त होने का ठप्पा लगा है लिहाजा वह अपने प्रदेशा के बाहर खुद इतना मकबूल नहीं होसके कि अपनी पार्टी को फायदा पहुचा पाते। अब अखिलेश यादव ने चूंकि तरक्की को अपना एजेण्डा बनाया है और तरक्की केग इस एजेंडे में हर तबके को शामिल करनेका इरादा जाहिर किया है उसमें उन्हें सभी तबकों की हिमायत मिल सकती है। अगर अखिलेश इसी एजेडे पर चलते हुए यूपी में कामयाबी हासिल कर लेते हैं तो प्रदेश के बाहर भी समाजवादी पार्टी को ताकतवर बना सकते हैं। लेकिन फिलहाल उनके जरिए मुसलमानों को नजरअंदाज करने से समाजवादी पार्टी को नुक्सान और बीएसपी को फायदा होता नजर आ रहा है।

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