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इंडियन आवाज़     12 Aug 2020 05:40:18      انڈین آواز

‘निजीकरण’ की राह पर चल पड़ी भारतीय रेल !

प्रवीण कुमार

अंदेशा तो पहले से ही था, लेकिन अब वह पूरी तरह से होने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं भारतीय रेल के निजीकरण की। मुझे याद है 22 नवंबर 2019 शुक्रवार का वो दिन जब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि रेलवे भारत और देशवासियों की संपत्ति है और आगे भी रहेगी। गोयल ने रेलवे के निजीकरण की संभावाओं को खारिज करते हुए तब कहा था कि सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है, बल्कि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए निजी कंपनियों से कॉमर्शियल और ऑन-बोर्ड सेवाओं की आउटसोर्सिंग कर रही है।

मालिकाना हक रेलवे के पास ही रहेगा। हम केवल लाइसेंस दे रहे हैं। हमारे देश की जनता बहुत भोली है। मंत्री जी का संसद में दिया बयान सुन लिया, समझ लिया और मान लिया। लेकिन सरकार कहां मानने वाली। वक्त का इंतजार किया और कोरोना महामारी व लॉकडाउन के दौरान आपदा एक्ट का फायदा उठाते हुए यात्री ट्रेन सेवा के संचालन के लिए पहली बार खुले तौर पर निजी कंपनियों के दरवाजे खोल दिए। इसके तहत देश में 109 गंतव्य मार्गों पर निजी कंपनियां यात्री ट्रेनों का संचालन कर सकेंगी। सरकार का अनुमान है कि इसमें 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश हो सकता है। हालांकि इसकी शुरूआत तो तभी हो गई थी जब आईआरसीटीसी ने सरकारी पटरी पर पहली निजी ट्रेन तेजस का संचालन शुरू किया था।

दरअसल, मोदी सरकार का यह फैसला उस बिबेक देबरॉय समिति की उस रिपोर्ट का हिस्सा है जिसे वर्ष 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिये संसाधन जुटाने और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए सुझाव देने को कहा था। इसका साथ दिया नीति आयोग ने भी। देबरॉय समिति ने वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी जिसमें रेल के डिब्बों तथा इंजन के निजीकरण की बात साफतौर पर कही गई थी। समिति ने कहा था कि रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए एक अलग कंपनी का निर्माण करना चाहिए और ट्रेनों के संचालन का काम निजी हाथों में सौंपा जाना जरूरी है। रेलवे में निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण की जरूरत पर भी समिति ने जोर दिया है। साथ ही नई लाइनों के निर्माण में रेलवे को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी है।

बहुत से लोगों को सरकार का यह फैसला आज अच्छा लग रहा होगा, लेकिन आने वाले वक्त में अच्छे स्कूल और अस्पताल की तरह कहीं आना-जाना भी आपकी जेब से दूर हो जाएगा क्योंकि निजी कंपनियों का एक ही लक्ष्य होता है मुनाफा कमाना और रेलवे में लाभ कमाने का सबसे आसान तरीका होता है यात्री किराये में इजाफा करना जो पिछले पांच साल से सरकार ने अपरोक्ष तौर पर लगातार किया भी। लेकिन जब यह काम निजी कंपनियां करेंगी तो जनता की आवाज और उसका दर्द नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाएगी। क्योंकि निजी कंपनियां अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होती हैं और इनमें जवाबदेही की भारी कमी होती है। उनकी जवाबदेही रेल यात्रियों के प्रति नहीं होगी बल्कि उनकी जेब से वसूली जाने वाली किराया से उनकी कंपनी को कितना मुनाफा पहुंचाना है उसकी चिंता करना महत्वपूर्ण होता है। एक और बात जो काफी महत्वपूर्ण है वह यह है कि रेलवे विशुद्ध तौर पर आम आदमी की जिंदगी को जीता है। सरकार के पास जब तक इसका स्वामित्व है, वह नफा-नुकसान की परवाह किए बिना राष्ट्रव्यापी पहुंच प्रदान करती है लेकिन निजीकरण में यह गुंजाइश खत्म हो जाएगी और उन्हें जिस क्षेत्र से मुनाफा नहीं होगा उस मार्ग पर ट्रेनों का संचालन बंद कर देंगे।

बहरहाल, यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए पहली बार भारतीय रेलवे ने निजी निवेश का रास्ता साफ कर दिया है और सरकार के इस कदम के साथ ही रेलवे का 167 साल का इतिहास बदलने जा रहा है। साल 1853 में भारत में शुरू हुई व्यावसायिक ट्रेन सेवा अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और इसी नेटवर्क के जरिये भारतीय रेलवे प्रतिदिन करीब ढाई करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए उसके पास तकरीबन 13 लाख कर्मचारी हैं। हालांकि वर्ष 2019 में ही लखनऊ से नई दिल्ली के बीच भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत हो गई थी जिसे रेलवे में निजीकरण की दिशा में पहला बड़ा कदम माना गया था, लेकिन आज जब हम कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, देश में आपदा एक्ट लगा हुआ है और इसकी आड़ में सरकार उन सारे एजेंडा को पूरा कर लेना चाहती है जिसपर उसे लगता है कि इसके खिलाफ जनता की आवाज उठ सकती हैं। आखिर भारतीय रेल को देश की लाइफ लाइन जो कहा जाता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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