FreeCurrencyRates.com

इंडियन आवाज़     20 Aug 2017 03:21:15      انڈین آواز
Ad

नहीं रहा मुसलमानों का मसीहा

सैयद शहाबुद्दीन

syed-shahabuddin. 1jpg

By मलिक असगर हाशमी

भगवान विष्णु की मोक्ष और गौतम बुुद्ध की ज्ञान भूमि ‘गया’ होकर गुजरने वाले दिल्ली-कोलकाता रेल खंड से सटा एक मुस्लिम बहुल मुहल्ला है, करीमगंज। उसकी कब्रिस्तान के पिछले गेट के ठीक सामने एक सफेद सी कोठी है ‘कहकशां मंजिल’। यह विदेश सेवा के पूर्व अफसरशाह और मुसलमानों से जुड़े मुद्दे उठाकर सियासत में हलचल मचाने वाले मुस्लिम लीडर स्वर्गीय शहाबुद्दीन का पुश्तैनी मकान है। लड़कपन से अबतक उस बिल्डिंग से सटकर गुजरने वाली सड़क से अनगिनत बार गुजरा हूं, पर कोठी के अंदर या बाहर कभी ऐसी हलचल नहीं देखी जिससे आभास हो कि यह किसी वीआईपी का निवास स्थान है। शहाबुद्दीन साहब को कभी वहां आते-जाते नहीं देखा। वह बिहार के मुस्लिम बहुल किशनगंज संसदीय क्षेत्र से दो बार सांसद रहे। फिर भी उनकी कोठी पर न कभी लालबत्ती लगी गाड़ी देखी और न गाड़ियों का काफिला। कोठी तब भी सन्नाटे में डूबी रहती थी और आज भी रहती है।

सैयद शाहबुद्दीन ने कभी शोशाबाजी पर विश्वास नहीं किया। मगर खामोश रहकर तूफान उठाते रहे। कई बार तो इसकी गूंज देश ही नहीं विदेशों में भी सुनाई पड़ती थी। शुक्रवार को उनके इंतकाल की खबर भी ठहरे पानी में किसी पत्थर से हलचल जैसी थी। बाबारी मस्जिद विध्वंस के बाद एक तरह से उन्होंने खुद को सीमित कर लिया था। मुस्लिम कौम भी उन्हें एक तरह से बिसरा चुकी थी। अंतिम दिनों में उनकी आर्थिक दशा ठीक नहीं होने केे कारण उन्हें अपनी शोध पत्रिका ‘मुस्लिम इंडिया’ बंद करनी पड़ी थी। इसके बाद तो मुसलमानों से बचा-कुचा संपर्क भी टूट सा गया था।

उनका विदेश सेवा में जाना भी चौकाने वाला रहा था। प्रतियोगिता परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावूजद छात्र जीवन में छात्र राजनीति करने के कारण उनकी दावेदारी एक तरह से खारिज कर दी गई थी। तब वह पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। भारतीय विदेश सेवा में चयन होने पर पटना के तत्तकालीन पुलिस अधीक्षक ने जांच रिपोर्ट में उनको लेकर विपरीत टिप्पणी कर दी थी, जिससे उनका विदेश सेवा में जाना लगभग नामुमकिन हो गया था। एक इंटरव्यू में उन्हांेने बताया था कि इस बारे में उनकी फाइल जब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास पहुंची तो उन्होंने व्यक्तिगत दिलचस्पी लेते हुए उनके लिए आईएफएस बनने का रास्ता साफ किया। बाद में शहाबुद्दीन उनके पसंदीदा नौकरशाहों में शुमार होने लगे। तमाम खूबियों में उनकी एक खूबी थी कि वह चुपके से किसी के भी दिल में उतर जाते थे। एक समय मुस्लिम कौम उन्हें अपना रहबर मानने लगी थी। उनसे कुछ सियासी गलतियां नहीं होतीं तो आज वह देश के सबसे बड़े मुस्लिम लीडर होते। इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से उनके निकट संबंध थे। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह भी उन्हें पसंद करते थे। इंदिरा गांधी के इमर्जेंसी के फैसले से प्रभवित होकर जब बिहार के तीन नौकरशाहों के साथ उन्होंने नौकरी छोड़ने का इरादा किया तो वाजपेयी जी ने बहुत समझाया। इंदिरा गांधी भी नहीं चाहती थीं कि वह वीआरएस लें, इसलिए काफी दिनों तक इससे संबंधित फाइल दबाए रखी। शहाबुद्दीन एक इंटरव्यू मंे बताते हैं कि नौकरी छोड़ने पर बिहार के दो मंत्रियों के माध्यम से इंदिरा जी ने उन्हें अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का कुलपति बनने का ऑफर दिया था, जिसे ठुकरा दिया।

सत्तर के दशक में देश की सियासत में मुस्लिम नेतृत्व का अकाल सा था। यानी तब भी आज जैसी स्थिति थी। यह बात उस वक्त शहाबुद्दीन साहब को कचोट गई। उन्हें लगा कि संविधान के दायरे में रहकर यदि संसद में आवाज बुलंद नहीं की गई तो देश का मुस्लिम वर्ग समस्याओं में खोकर रह जाएगा। वह दौर पाकिस्तान-बांग्लादेश के बटंवारे का था। पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों के मन-मतिष्क में यह बैठाने की साजिश रच रहा था कि भारतीय मुसलमानों का कल्याण तभी संभव है जब हिंदुस्तान मंें एक और पाकिस्तान की नींव डाली जाए। जनता पार्टी के दरवाजे भारतीय राजनीति में प्रवेश करने वाले शहाबुद्दीन ने सबसे पहले इस भ्रम को दूर किया। उन्हांेने मुसलमानों को हक-हकूक केलिए संघर्ष करना सिखाया। तीन बार सांसद रहते उन्हें मुसलमानों से मुतल्लिक कई गंभीर समस्याएं उठाईं जिसके आगे सरकारों को झुकना पड़ा। तीसरी बार लोकसभा चुनाव में वह वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर से हर गए। अकबर पार्टियों को लेकर निष्ठा बदलते रहे हैं। आज वह भारतीय जनता पार्टी की सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं।

शहाबुद्दीन ने कभी आपनी आस्था नहीं बदली और न ही उसूलों से समझौता किया। इसपर टिके रहने के कारण ही उन्होंने एमर्जेंसी के दिनों में इंदिरा गांधी की मुखालफत का झंडा बुलंद किया और बाबरी मस्जिद विध्वंस मसले पर अटल बिहारी वाजपेयी को घेरने से पीछ नहीं हटे। शाह बानो केस में उन्होंने राजीव गांधी के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोला कि उन्हें अपना निर्णय वापस लेना पड़ गया था। इस्लाम की गहरी समझ रखने वाले शाहाबुद्दी वह पहले शख्स थे जिन्हांेने सलमान रुश्दी की विवादास्पद पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सिज’ को लेकर इतनी मुखरता दिखाई कि ईरान, पाकिस्तान, बांग्लादेश यहां तक कि यूरोपीय देशों में भी पुस्तक प्रतिबंधित कर दी गई।

बीस वर्षों के विदेश सेवा में करीब तीन वर्ष वह सउदी अरब में रहे। इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक की स्थापना में उनका अहम रोल रहा है। बिहार के गया जिले के हरिदास सेमिनरी स्कूल के दिनों के सहपाठी एक पूर्व कुलपति अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि छात्र जीवन में उन्होंने शहाबुद्दीन जैसा ब्रिलियंट स्टूडेंट नहीं देखा। हर विषय में अव्वल। जो करते माप तौल और गहन अध्ययन के बाद। शहाबुद्दीन ने राजनीति भी ऐसी ही की। इसका कभी अनुचित लाभ नहीं उठाया। सेवानिवृति के बाद कुछ पाने की लालसा में अफसरशाह हमेशा सत्ता के करीब रहते हैं। शहाबुद्दीन उनसे अलग थे। उनको जानने वाले मानते हैं कि यदि उन्हांेने अपने सिद्धांतों से समझौता किया होता तो राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति की सूची मंें आज उनका भी नाम शुमार होता। राजनीतिक गलियारे और अफसरशाही में उनकी खासी पकड़ थी।

आज उन जैसा कोई मुस्लिम लीडर नहीं है। अभी इसकी घोर आवश्यकता है। कहने को कई पार्टियों में मुस्लिम लीडर हैं, पर उनका अपने कौम के प्रति वह जज्बा नहीं , जो शहाबुद्दीन का था। पार्टियों की सियासत करने वाले मुस्लिम नेता अपनी कौम की समस्या उठाने में हिचकते हैं। शहाबुद्दी ने उनसे उलट थे। हमेशा कौम की राजनीति की,जियके चलते हमेशाा आलोचनाआंे में घिरे रहे, इसके बावजूद कभी पीछे नहीं हटे और न ही कौम के नाम पर समझौता किया। मुसलमानों को समझना होगा कि उनका आत्मनिर्भर और शिक्षित होना बेहद जरूरी है। मुस्लिम मुशावरात के अध्यक्ष रहते सैयद शहाबुद्दीन ने कई अदारों का दायित्व संभालते अपनी कौम को यह समझाने की हमेशा कोशिश की।

उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया है। गल्फ देशों पर पकड़ रखने के कारण उनकी वजह से कई भारतीय मुस्लिम अदारों को विदेशी आर्थिक मदद मिलती रही है। अब ऐसा कोई नजर नहीं आता। अयोध्या का जिन बोतल से निकाल कर मुसलमानों को फिर अंधे कंुएं में धकेलने का षड़यंत्र हो रहा है। असली मुददों से ध्यान भटकाने को कभी तलाक तो कभी समान नागरिकता, बढ़ती आबादी और लव जेहाद का मुददा उठाकर वातावरण में उबाल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। कुछ लोग पाकिस्तान से निष्कासित पत्रकार तारेक फतेह को आगे कर इसे हवा दे रहे हैं। शाहाबुद्दीन जैसा काबिल ही फतेह का मुंह बंद रखने की सलाहियत रखता था, पर यहां भी बीस करोड़ की मुस्लिम आबादी के हाथ तंग हैं। जब कौम को शाहाबुद्दीन की आवश्यकता थी तो वह दास्तां कहते-कहते सो गए।

Leave a Reply

You have to agree to the comment policy.

Ad

NEWS IN HINDI

कलिंग-उत्कल रेल हादसा: 50 यात्रियों की मौत का अंदेशा

AMN / मुजफ्फरनगर सिस्टम और रेलवे की घोर लाप ...

यू पी में बड़ा ट्रेन हादसा 20 के मरने की खबर , कई घायल

WEB DESK / AMN उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में बड़ ...

कार्ति चिदंबरम को सुप्रीम कोर्ट ने दिए कड़े निर्देश

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेसी नेता पी च ...

जेडी-यू NDA एनडीए में होगा शामिल

सभी की निगाहें  aaj  पटना में होने वाली जेडी ...

Ad
Ad
Ad

SPORTS

Ghosh-Sathiyan set up clash with top seeds in final of Bulgaria Open

The Indian pair of Soumyajit Ghosh and G Sathiyan has entered the men's doubles final of the Seamaster 2017 IT ...

Sports Ministry drops para-sports coach Satyanarayana from Dronacharya awardees list

The Sports Ministry has dropped para-sports coach Satyanarayana from the list of this year's Dronacharya award ...

Ad

Archive

August 2017
M T W T F S S
« Jul    
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
28293031  

OPEN HOUSE

Mallya case: India gives fresh set of documents to UK

AMN India has given a fresh set of papers to the UK in the extradition case of businessman Vijay Mallya. Ex ...

@Powered By: Logicsart