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इंडियन आवाज़     19 Jul 2018 09:05:07      انڈین آواز
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राजस्थान के मुस्लिम समाज को फिर से सिविल सेवा मे आने का विकल्प ढूंढ़ना होगा

muslims-Rajasthan
अशफाक कायमखानी / जयपुर

हालाकि राजस्थान के मुस्लिम समुदाय की सरकारी सेवा मे भागीदारी नई शदी शुरु होने के बाद से लेकर अब तक पहले के मुकाबले दिन ब दिन निचे की तरफ तेजी के साथ लूढकती जा रही है। जबकि इसके विपरीत समुदाय को पहले के मुकाबले शेक्षणिक व आर्थिक रुप पोजीटीव मजबूती मिली है।
राजस्थान के मुस्लिम समुदाय मे विशेष रुप से इस तरफ जागरुक व जुझारु समझने जाने वाली क्रषक मिजाज वाली कायमखानी बीरादरी की इस तरफ अब तक की गई कोशिशो का रजल्ट भी ढाक के तीन पात आये है। हालाकि कायमखानीयो का पिछले 16-17 साल मे पहले के मुकाबले आर्थिक हालात मे तेजी के साथ पोजीटीव इजाफा होने के बावजूद उनका राजस्थान सिविल सेवा परीक्षा के रजल्ट मे उनके पहले के मुकाबले काफी गिरावट आती देखी गई है। अगर RAS-RPS के लेकर हम जरा गोर करे तो-2001 मे RPS बने छोटी बेरी के नाजीम अली खान के बाद कोई भी कायमखानी RPS अभी तक नही बन पाया है। दुसरी तरफ झुंझूनु के सलीम खान के RAS बनने के बाद कोई अन्य कायमखानी परीक्षा के मार्फत अभी तक RAS नही बन पाये है।
उपरोक्त विषयो को पुरे मुस्लिम समुदाय के हिसाब से पिछले 15-16 सालो के गुजरे समय पर नजर डाले तो 2005-06 मे अबू बक्र व अबू सुफीयान चोहान 2011 मे सलीम खान व उनकी पत्नी सना सिद्दिकी एवं अंजुम ताहिर शमा के चयनीत होने से पहले 2010 मे हाकम खान मेव व नसीम खान फिर 2014 मे शीराज अली जैदी RAS केडर के चयनीत होने के अलावा 2000-2001 मे नाजीम अली खान के बाद 2011 मे शाहना खानम व अब नूर मोहम्मद राठोड़ परीक्षा के मार्फत केवल तीन RPS नई शदी मे चयनीत हो पाये है। इसके साथ ही मरहुम अजरा परवीन पहले RPS व फिर 2001 मे RAS के लिये चयनीत हो पाई थी। लेकिन दो साल पहले अजरा परवीन की एक ऐक्सीडेंट मे इंतेकाल होने से स्टेट का एक होनहार अधिकारी चला गया।

कुल मिलाकर यह है कि जब जब भी राजस्थान सिविल सेवा भर्ती परीक्षा होती है तो उसमे काफी कम संख्या मे मुस्लिम समुदाय के कंडिडेटस वो भी निरासा के भाव के पनपने के चलते भाग्य अजमाते नजर आ रहे है। जबकि उनको होने वाली इस त्रिस्तरीय हर परीक्षा मे हर स्तर पर कठिन परिश्रम करके कामयाबी का परचम लहराने का टारगेट रखना होना चाहिये। जिस कसोटी पर वो कहा ठहर पाते है यह तो वो जाने लेकिन उनको हर हालत मे होसला तो बनाकर हालात साजगार बनाने के प्रयत्न तो करने ही होगे। दुसरी तरफ मुस्लिम बच्चो के लिये उक्त तरह की सभी मुकाबलाती परीक्षाओ की तैयारी के लिये शायद 1985-2000 तक जयपुर के मोती डुंगरी रोड़ पर नानाजी की हवेली मे रिहायसी तोर पर कोचिंग का शानदार इंतेजाम हुवा करता था। जिस कोचिंग से तत्तकालीन समय मे हमारे लिये अच्छे व उत्साह वर्धक परीणाम निकल कर आ रहे थे। उसके बाद वो सिस्टम पता नही क्यो धारासाई हो गया। आज उस तरह के फिर से सिस्टम डवलप होने की समुदाय मे सख्त जरुरत महसूस की जाने लगी है।

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