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इंडियन आवाज़     20 Mar 2019 04:41:01      انڈین آواز
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पढ़ना लिखना सीखो ए तकरीरें सुनने वालों

muslims-Rajasthan

शकील अख्तर

डीयू (दिल्ली यूनिवर्सिटी) में पढ़ना हर स्टूडेन्ट का सपना होता है। मगर 90 फीसदी और इससे ज्यादा नंबर लाने वाले छात्र छात्रा भी हमेशा इसमें कामयाब नहीं हो पाते। मगर कुछ समुदायों एससी, एसटी अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले विशेष दर्जे की वजह से उनके बच्चों को कम नंबरों पर एडमिशन मिल जाता है। इसके साथ ही अल्पसंख्यक वर्ग के कुछ समुदायों के स्टूडेंटों को भी कम नंबर पर एडमिशन मिल जाता है। इन अल्पसंख्यक समुदायों में सिख और ईसाई स्टूडेंट आते हैं। मगर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों के बच्चों को कोई रियायत नहीं मिल पाती। क्यों?

आप को यह सब पहेली लग रही होगी। मगर यह सच्चाई है पहेली नहीं! और साथ में मुसलमान के सियासी और समाजी नेतृत्व से उपजी नाकामयाबी भी। आप इस मसले में उलझ रहे हैं मगर इसे समझने से पहले एक छोटे से सच्च वाकये को जान लीजिए। अभी दिल्ली के जानने वाले एक मुस्लिम दोस्त का लड़का डीयू छात्रसंघ के चुनावों के दौरान अपने अन्य दोस्तों के साथ हमसे मिला। हमने जब उससे पूछा कि किस कालेज में एडमिशन लिया तो उसने डीयू से बाहर के एक कालेज का नाम बताया। हमने हैरत से पूछा कि आपके तो 90 परसेन्ट से उपर मार्क आए थे और आपके यह जो दोस्त हैं शायद कह रहे थे कि उनके नंबर कम थे मगर उन्हें तो डीयू में एडमिशन मिल गया। ऐसा कैसे? तब उसने बताया कि डीयू के कालेजों में कुछ अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को क्यों कम नंबरों पर एडमिशन मिल जाता है और क्यों मुस्लिम स्टूडेंट इससे महरूम रह जाते हैं। उसके दोस्तों में ईसाई और सिख लड़कों को कम नंबर पर भी डीयू के कालेज मिल गए थे।

दरअसल डीयू में छह माइनरटी कालेज हैं। इनमें चार सिख माइनरटी कालेज श्री गुरु तेगबहादुर खालसा कालेज, श्री गुरु नानकदेव खालसा कालेज, श्री गुरू गोविन्द सिंह कालेज आफ कामर्स और माता सुंदरी कालेज फार विमन है। जबकि दो क्रिश्चियन माइनरटी कालेज सेंट स्टीफंस और जीसस एंड मेरी कालेज हैं। इन छहों माइनरटी कालेजों में उनके समुदाय के माइनरटी स्टूडेंट्स के लिए 50 प्रतिशत सीटें रिजर्व होती है बाकी सीटें अन्य स्टूडेंटों के लिए होती हैं। जाहिर है कि माइनरटी स्टूडेंटों को इसमें कम प्रतिशत पर भी एडमिशन मिल जाता है जबकि बाकी बच्चों को डीयू द्वारा निकाले ऊंचे कट आफ पर ही काम्पटिशन करना पड़ता है।

अब आती है सबसे दिलचस्प मगर विडंबना पूर्ण बात। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों का डीयू में कोई भी माइनरटी कालेज नहीं है। इसीलिए शिक्षा में पिछड़े मुसलमानों के बच्चों को बहुत अच्छे नंबर लाने के बावजूद उसी केटेगरी में काम्पटिशन करने पड़ता है जहां दूसरे सामान्य वर्ग के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे हैं। यहां प्रसंगवश यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि स्कूली शिक्षा में सिख और ईसाई माइनरटी के बहुत अच्छे स्कूल हैं। जबकि मुसलमान माइनरटी का एक भी अच्छा स्कूल देश की राजधानी में नहीं है।

शिक्षा को पूरी तरह सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। खासतौर से अल्पसंख्यकों की शिक्षा के मामले में। संविधान में जहां दलित, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्ग को शिक्षा में रिजर्वेशन दिया गया है, वहीं अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की भी विशेष छुट दी गई है। संविधान में इसीलिए अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की व्यवस्था की गई है। देश के कई बेहतरीन शिक्षा संस्थान अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचिलत हैं। लेकिन मुस्लिम समुदाय द्वारा चलाए जा रहे शिक्षा संस्थानों की भारी कमी है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों में उस समुदाय के लोगों को एडमिशन के नियमों में छूट मिलती है। साथ ही यह भी बताने की जरूरत नहीं है कि कमजोर सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आए बच्चों के लिए स्कूल कालेज और बाद में उच्च् शिक्षा के लिए अपने समुदाय के शिक्षा संस्थान कितने मददगार होते हैं।

मुसलमानों के शिक्षा संस्थान न होना किसकी नाकामी है? निश्चित ही रूप से मुस्लिम नेतृत्व की जिन्होंने तालीम को कभी भी प्रायरटी नहीं दी। मुसलमानों का राजनीतिक नेतृत्व हो चाहे समाजी या धार्मिक उन्होंने कभी शिक्षा की अहमियत नहीं समझी। आज पूरी दुनिया में शिक्षा सबकी पहली प्राथमिकता है। मगर हिन्दुस्तान के मुसलमानों के नेता इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं।

देश में जहां 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं, वहां मुसलमानों का साक्षरता प्रतिशत केवल 67 है। वैसे यहां यह बताना भी जरूरी होगा कि भारत में साक्षरता का मतलब केवल अपना नाम लिखना पढ़ना होता है जबकि विकसित देशों में साक्षरता का पैमाना बहुत ऊंचा होता है। हमारे यहां साक्षर और शिक्षित के बीच बड़ा फासला होता है। इसलिए मुसलमानों में शिक्षित लोगों की तादाद और कम है।

शिक्षा कम होने से मुसलमानों की नौकरी में हिस्सेदारी भी कम है। 2011 की जनगणना में नौकरी पेशा लोगों के धार्मिक वर्गीकरण को लेकर पिछले दिनों जारी हुए आंकड़ों को तो शायद मुसलमानों के रहनुमाओं ने देखा भी नहीं होगा। नौकरीपेशा लोगों में मुसलमानों की हिस्सेदारी सबसे कम है। केवल 33 फीसदी मुसलमान नौकरी में हैं। जबकि मुस्लिम महिला के केवल 15 प्रतिशत ही नौकरी में हैं। महिलाओं ने पिछले कुछ सालों में अपनी हिस्सेदारी सुधारी है। वे जैन समुदाय की महिलाओं से आगे निकल गईं है। खाली अल्पसंख्यक वर्ग के पैमाने पर देखा जाए तो मुस्लिम महिलाएं सिख महिलाओं की बराबरी पर हैं। लेकिन बहुसंख्यक समुदाय की महिलाओं से बहुत पीछे हैं।

दक्षिण भारत में मुसलमानों के कुछ अच्छे शिक्षा संस्थान हैं। मगर उत्तर भारत खासतौर से दिल्ली में इनका नितांत अभाव है। मुसलमानों के रहनुमाओं को इस पर सोचना होगा। वरना जैसा कि अल्लामा इकबाल ने कहा था कि- न समझोगे तो मिट जाओगे- – -!

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