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इंडियन आवाज़     17 Jan 2019 09:59:40      انڈین آواز
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क्या कांग्रेस देश को बेहतर विकल्प दे पाएगी ?

मुल्क में ये बहस बड़े ज़ोर शोर से छिड़ी हुई है कि देश के राजनीतिक पटल पर संघ के बर्चस्व में कांग्रेस की क्या भूमिका रही है

Congress-BJP-

अब्दुल वाहिद

देश के राजनीतिक पटल पर संघ के बर्चस्व और आगामी लोक सभा चुनावों से पहले सेमी फाइनल समझ कर लड़े जा रहे, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम के विधानसभा चुनावों में काग्रेस प्रमुख राहुल गाँधी की धुआँधार रैलियों के बीच यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या कांग्रेस एक बेहतर विकल्प बन कर उभर पाएगी ? कुछ लोग आशांवित हैं तो कुछ लोग सशंकित। जो लोग आशांवित हैं उनके अपने तर्क है और जो सशंकित हैं उनकी अपनी दलीलें हैं। लेकिन इन सबके बीच जिस मुद्दे पर चर्चा ने ज़ोर पकड़ा है वो है, संघ का वर्तमान उभार और कांग्रेस के अब तक की कार्यप्रणाली, जिसको विश्लेषक संघ के बर्चस्व का कारण समझते हैं। मुल्क में ये बहस बड़े ज़ोर शोर से छिड़ी हुई है कि देश के राजनीतिक पटल पर संघ के बर्चस्व में कांग्रेस की क्या भूमिका रही है। इस बहस को कांग्रेस पार्टी के मुखिया राहुल गाँधी की उस कार्यशैली से भी बल मिला है जिनमे वो मंदिरों और दरगाहों पर माथा टेकने में तत्परता से जुटे हुये हैं। क्या परिवर्तन को प्रकृति का नियम मान कर कांग्रेस पार्टी में आये बदलाओं पर चर्चा बंद कर देनी चाहिये ? अगर नहीं तो फिर इसकी विवेचना ज़रूरी हो जाती है।

इससे पहले कि देश की वर्तमान परिस्थियों मे उसकी कार्यप्रणाली की विवेचना करें, ये ज़रूरी हो जाता है कि आज़ादी के फौरन बाद से लेकर आज की ताज़ा परिस्थितियों पर कांग्रेस में आये वैचारिक परिवर्तन पर भी नजर डाली जाये। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की प्रमुख भूमिका रही है। लेकिन जैसे जैसे आज़ादी का सपना साकार होने के करीब पंहुचता गया, कांग्रेस के लीडरों में महात्वाकांक्षा भी ज़ोर पकड़ने लगी। हालांकि ये स्वाभाविक है, लेकिन अति महात्वाकांक्षा न सिर्फ व्यक्ति विशेष बल्कि किसी समूह को भी सवार्थपरता, संकीर्णता यहाँ तक ईर्ष्या तक मे ढकेल देने का कारण बनती है। इतिहास इस तरह की घटनाओं से अटा पड़ा है।

काँग्रेस पर सबसे बड़ा सवाल जो देश के बंटवारे के बारे में पूछा जाना चाहिये था। उसकी कोई हिम्मत अभी तक नहीं जुटा पाया और जिस सफाई से कांग्रेस ने बंटवारे का सारा दोष मुस्लिम लीग और मुहम्मद अली जिन्नाह और अंग्रेजों के सर मंढ कर सत्तासुख भोगती रही है उस पर सवाल अति आवश्यक है। क्योंकि आज देश धार्मिक उंमाद के जिस वीभस्त स्वरूप को झेल रहा है उसकी जड़ें कांग्रेस पार्टी के नीति निर्धारकों के उजले चेहरों के अंदर हैं। जिसका अभी तक पटाक्षेप नहीं हुआ है।

जब महात्मा गाँधी,मौलाना आज़ाद, सरोजिनी नायडू, और न जाने कितने लोग बंटवारे के विरोधी थे तो आखिर जवाहर लाल नेहरू ने बंटवारे का समर्थन कैसे कर दिया। क्या जिन्नाह इतने ताकतवर हो गये थे कि वो महात्मा गाँधी और मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व जो कि न सिर्फ मौलाना आज़ाद बल्कि दारुल उलूम देवबंद की भी जिसपर गहरी छाप थी उसे टक्कर दे पाते। आखिर भूमिहारों या मुसलमान ज़मींदारों के बल पर खड़ी मुस्लिम लीग जो कि पहला चुनाव भी बुरी तरह हार गयी थी यहां तक कि मुसलमानों की बड़ी आबादी ने भी मुस्लिम लीग को नकार दिया था और उसके बजाये कांग्रेस का समर्थन किया था आखिर नेहरू और पटेल ने कैसे हार मान ली। क्या इस पर सवाल नहीं होना चाहिये।

तो फिर आखिर इनकी वो कौन सी महात्वाकांक्षा थी जिसको महात्मा गाँधी भांप गये थे और आज़ादी के बाद कांग्रेस पार्टी को भंग करने का सुझाव दिया था। ये महात्वाकांक्षा ज़ाहिर हुई आने वाले दिनों मे। आज़ाद भारत के रूप में कांग्रेस को एक नवजात शिशु की भांति देश मिला था।ये अलग बात है कि वह नव जात शिशु घायल अवस्था में था। विभाजन के ज़ख्मों से कराह रहा था। लेकिन इन सबके बावजूद जिस प्रकार से उसका उपचार किया जाना था क्या ऐसा हो पाया। जिसकी उन्नति और विकास को एक नया आकार दिया जा सकता था। बेहतर तरीके से गढ़ा जा सकता था। लेकिन कांग्रेस ने क्या किया। अगर सामाजिक स्तर पर देखें तो बंटवारे का वो दंश जो 1947 में लगा था देश आज भी उबर नहीं पाया है। धार्मिक विद्वेष की खाई दिन ब दिन चौड़ी होती दिखाई दे रही है। जिस हिंदू-मुस्लिम एकता के बल पर अंग्रेज़ी शासन का खात्मा किया गया था वो आज छिन्न भिन्न हो रही है। सामाजिक चेतना की जगह धार्मिक कट्टरवाद ने ले ली है। क्या इन सब मुद्दों पर कांग्रेस की जवाबदारी नहीं बनती। भारत एक विविधता वाला देश है जहाँ विश्व के सभी धर्मों का बसेरा है। कहने को तो कांग्रेस ने सेक्युलर देश का नारा बुलंद किया था। लेकिन क्या कभी इसका निर्वहन भी किया गया। नेहरू भले ही धर्मनिपेक्षता के बहुत बड़े पैरोकार रहे हों, लेकिन उनकी पार्टी के कई बड़े नेताओं की सहानुभूति सांप्रदायिक तत्वों के साथ रही। नेहरू मंत्रिमंडल के कई सदस्य जैसे मेहरचंद खन्ना और कन्हैयालाल मुंशी और 1950 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास करते थे I और तो और भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी नेहरू के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य थेI साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद किए गए एक अध्ययन में ये पाया गया कि कन्हैयालाल मुंशी के उपन्यासों की लोकप्रियता ने जिसका सार सोमनाथ के मंदिर पर महमूद गज़नी का हमला था, राज्य में हिंदुत्व की भावना को बढ़ावा दिया।

यहाँ तक कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत भी संघ की विचारधारा से प्रभावित थे। उत्तर प्रदेश के गृह सचिव रहे राजेश्वर दयाल अपनी आत्मकथा ‘अ लाइफ़ ऑफ़ आवर टाइम्स’ में लिखते हैं, “जब मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में गुरु गोलवलकर की भूमिका का सबूत पंतजी के सामने रखा तो उन्होंने न सिर्फ़ गोलवलकर को गिरफ़्तार करवाने से इनकार किया, बल्कि उन्हें इस बारे में बता भी दिया और गोलवलकर तुरंत प्रदेश से बाहर चले गए.”

दूसरी मिसाल जबलपुर की है। कहते हैं कि आज़ादी के बाद भारत का पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर में हुआ था जहाँ उस समय कांग्रेस की सरकार थी। नेहरू इससे बहुत आहत हुए थे और जब वो दंगो के बाद भोपाल गए थे तो उन्होंने अपनी ही पार्टी वालों पर तंज़ कसा था कि वो दंगों के दौरान अपने घरों में छिपे क्यों बैठे रहे?

कांग्रेस ने ही हिंदू प्रतीक के ‘वंदे मातरम’ को स्वतंत्रता सेनानियों का गीत बनाया, जिसे बंकिम चंद्र चटोपाद्याय के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में हिंदू विद्रोहियों को मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ गाते हुए दिखाया गया है.

साल 1962 के चीन युद्ध में संघ के कार्यकर्ताओं ने सिविल डिफ़ेंस के काम को अपने हाथों में ले लिया था, जिससे ख़ुश हो कर कांग्रेस सरकार ने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को भाग लेने का अवसर दिया था.

Rahul_Gandhiयहाँ पर इन सब बातों का मक़सद सिर्फ यह है कि लोगों को पता चले कि धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी भी हिंदुत्व से अछूती नहीं रही है। कुछ विश्लेषक तो यहाँ तक मानते हैं कि वो तब तक लगातार सत्ता में रही जब तक हिंदू वोट उसके साथ रहाI जब कट्टर हिंदू संगठनों को लगा कि कांग्रेस ने उनके हितों पर ध्यान देना कम कर दिया है तो उन्होंने उसका साथ छोड़ दिया और उसका विकल्प तलाशने लगे।

पचास के दशक से ले कर सत्तर के दशक तक हिंदू वोटों पर कांग्रेस का एकक्षत्र राज रहा जिसकी वजह से उसे सत्ता हासिल करने में कोई गंभीर चुनौती नहीं मिली।यहाँ तक कि इमरजेंसी के बाद भी संघ का कांग्रेस से मोहभंग नहीं हुआ। जब तक संघ को लगा कि कांग्रेस के सहारे वो परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज रहेगी उसने उसका साथ दिय, और 90 के दशक में भाजपा द्वारा बाबरी मस्जिद विवाद को बढ़ता देख अपनी महात्वाकांक्षा भाजपा की ओर मोड़ लिया।

आजकल राहुल गाँधी दरगाहों और मंदिरों की जो खाक छानते फिर रहे हैं उस पर टिप्णी की जाने लगी है कि क्या विकास अब मंदिरों और दरगाहों में माथा टेक देगा। लगता तो ऐसा ही है। कांग्रेस नेतृत्व शायद ये भूल रहा है कि आस्था के जिस पिच पर राहुल गाँधी खेलने की कोशश कर रहें हैं, भाजपा उस पिच पर उन्हें दौड़ा दौड़ा कर मारेगी। लेकिन सत्तासुख ही जब अंतिम लक्ष्य हो तो फिर सामाजिक सरोकार बेमानी हो जाते हैं।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य यह है कि कांग्रेस एक तरह से हारी हुई बाज़ी लड़ रही है। लेकिन उसके वाबजूद ये क्षेत्रीय पार्टियों से ताल मेल नहीं बिठा पा रही है। ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से भी डरी हुयी हैं। उनको अपना अस्तित्व ही गाँधी परिवार के आभामंडल में समाहित होता दिखाई देता हैं, जिससे वह सशंकित हैं। चाहे जेपी आंदोलन हो या कोई और आंदोलन कांग्रेस का जा रवैया रहा वो बर्चस्ववादी रहा। कहीं जातिवाद या क्षेत्रवाद के नाम पर क्षत्रप गढ़नें हों या धार्मिक तुष्टिकरण, कांग्रेस ने फूट डालो और शासन करो कि हर उस नीति का अक्षरशः पालन किया जिससे देश में सामाजिक खाई जो विभाजन के कारण पैदा हुई थी निरंतर बढ़ती ही रही। और इस तरह के सवालों को बल मिला कि देश वास्तव में स्वतंत्र भी हुआ था या सिर्फ ये सत्ता हस्तांतरण मात्र था।

देश का एक बड़ा तब्का, चाहे वो दलित हो, आदिवासी हो या अन्य समुदाय आज भी शोषण झेल रहा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी कांग्रेस सरकारों के चेहरे को बेनकाब करती है कि किस प्रकार मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्ड खेलकर कांग्रेस ने देश के एक बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को उबारने के बजाये गर्त में ही ढकेला है।

कांग्रेस ने क्षेत्रीय स्तर पर भी नेतृत्व को नहीं ऊभरने दिया संभवतः इस डर से कि कहीं गाँधी परिवार के आभामंडल को चुनौती न झेलनी पड़ जाये। चाहे ममता बनर्जी का मामला हो या शरद पवार का ये सारे तथ्य बताते हैं कि क्षेत्रीय नेतृत्व के उभार से गाँधी परिवार और उनकी चाटुकार मंडली किस कदर व्याकुल रहती है और मज़े की बात ये कि भाजपा को हराने के लिये कांग्रेस नेतृत्व महा गठबंधन की बात भी करता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मायावती और अखिलेख ने कांग्रेस से हाथ छुढ़ाते हुये दूसरे दलों से जो हाथ मिलाया है वो इस ओर इशारा करता है कि कांग्रेस का दंभ अभी टूटा नहीं है। तो क्या इसी तरह कांग्रेस मोदी सरकार से दो- दो हाथ करेगी। वर्तमान परिस्थितियों मे तो ये लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व दिशाहीन है। कई मुद्दे मिले जिनपर मोदी सरकार को घेरा जा सकता था लेकिन कांग्रेस भी साफ्ट हिंदुत्व की और अग्रसर है। अब असमंजस भरी पार्टी को देश का नेतृत्व थमाना समझ से परे है। वक्त का तकाज़ा है कि कांग्रेस अपना पक्ष स्पष्ट करे। सामाजिक आंदोलन तो कांग्रेस ने कभी चलाया नहीं। सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के बल पर इसने सत्ता हासिल की थी। और दशकों तक इसी का श्रेय लेकर राज किया है। अब सामाजिक मुद्दों पर भी कांग्रेस से जबाव तलबी का समय आ गया है। आशा की जानी चाहिये कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस पर मंथन करेगा। जिससे कि कांग्रेस पार्टी का फिर से सर्वप्रिय पार्टी बन कर उभरने की मार्ग प्रशस्त हो।

लेखक, डी ए वी विश्वविद्दालय, जालंधर, पंजाब में शोधार्थी हैं।

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